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उससे कहो कि आकर मुझसे लड़े


उसकी कोई खबर नहीं लगती। सूचना प्राद्यौगिकी के अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस रहने वाली के बारे में अब कहीं कोई जिंदा जानकारी नहीं है। चंद कतरे उसकी आवाज़ के अपनी जिंदगी में इक जगह सकेर रखा है। वहीं उसे थोड़ा बहुत पा लिया करता हूं। एक पोस्टकार्ड है, गहरे आसमानी काग़ज़ पर उसकी बचपने में लिखी कुछ सतरें हैं। एक फिल्म में काम करना भी। उसके अक्षर आंगन में ढुलकते लोटे जैसे लगते हैं। 

उसे कहां कहां नहीं ढूंढ़ता। कनुप्रिया की किताब में, इज़ाडोरा डंकन के जीवन में, आंखों से बोलती किसी म्यूजिकल ब्लैक एंड ह्वाईट फिल्म में जहां दृश्यों के बीच तेज़ पियानो बजता है। मैं उसे खोजता हूं सखुए के पेड़ों के बीच, बदहवाशी के घोंड़ों के बीच, नींद और सपने के जोड़ों के बीच, अपनों से घिरे गैरों के बीच, सेंट ऑफ़ अ वुमेन के डांसिंग सीन के बीच, ज़हन में बॉस से डांट खाते खौफ के रील के बीच, जैसे मुझे अपने शहर का गंगा किनारे बहता गंदला नाला भी पसंद है वह भी मुझे उतनी ही अज़ीज है।

भीड़ भरे हाट से थैला भर सब्जी खरीदने से कभी नहीं ऊबा मैं, शाम ढ़ले काठ की नाव से गंगा में डूबा मैं, दूर रहकर भी वो पड़ोसन की तरह ही लगती, क्या था जो इतना याद आता, सताता। जीवन गर्क करता, वर्तमान नर्क करता।

मेरा खुदऐतमाद मर गया है। अपने ही दिल के अंदर एक खोखल सा महसूस होता है। शदीद तनहाई से सींचा जाता, बरगद की तरह फैलता एक विशालकाय वृक्ष। उसे हर जगह तलाशता हूं। उसकी सरौते जैसी उँगलियों का लम्स फिर से जिंदा कैसे हो.


अब कहां की दानाई अब के कैसे बिसात
तुम भी छेड़ लो तुम्हें भी करार आ जाए

आदमी में ही यकीन था या कि उजाले में
क्या लगते थे तुम्हारे जो दुबारा तवील बोसे दिए

रंगीं पैरहन एक हसीं गुलिस्तां सा लगता रहा
तुमको चुनना साइड इफेक्ट लेकर भी आता रहा

इक उम्र ही तो गुज़ारी है, जानता हूं मैं अपने बदन को
तू मुझको वहां से छू जहां से मैं अनजान हूं अबके


उसको चाहिए कि आकर मुझसे लड़े।  

Comments

  1. कल 15/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  2. इक उम्र ही तो गुज़ारी है, जानता हूं मैं अपने बदन को
    तू मुझको वहां से छू जहां से मैं अनजान हूं अबके

    बहुत ही खूबसूरत एहसास . वाह!
    कैसे लिख लेते हो सागर साब

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  3. थी कौन. कैसा होना था. उतने भर से होना हो जाता है.
    और चले जाना किसको कहते हैं?

    थी कोई, समंदर को उलीच कर खाली कर देने वाली.इतने सारे नमक को एक कतरा आंसू में समेट सकने वाली. थी कोई किनारे के बालू में लिखती थी तुम्हारा नाम.सा.ग.र. थी कोई कहती थी अधूरा राग हो तुम, एक अक्षर और होता तो कमसे कम पूरा गा सकती तुम्हें.

    कितना थी? उतना जितना आसमान के आखिरी छोर पर होता है समंदर. जितना इन्द्रधनुष को चाहिए होती है बारिश.हादसे से गुज़र जाने के बाद सीने में अटकी हुयी सांस इतनी? अक्षर अक्षर कागज़ में लिख सको उतनी?

    कैसे जानते हो कि थी भी कभी? अगर कभी थी वाकई तो आज भी है...और कभी थी ही नहीं तो चले जाना क्या होता है?

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