Wednesday, September 11, 2013

टूटता नहीं ये जादू


होंठ उसके जब भी लपकता हूं, गर्दन से गुज़रता हूं
इरादे दरकने लगते हैं, लहू बहकने लगते हैं।
मन जैसा कैसा ऊपर नीचे को होने लगता है।

दिल होता है किसी चील की माफिक चोंच में दबा कर उसे
उड़ जाऊं, इफरात समय निकाल, नितांत अकेलेपन में शिकार करूं
नस नस चटका दूं उसकी, अपनी रीढ़ की हड्डियां तोडूं

नहीं ही पूरा हो पता पक्षियों का सा ये ख्वाब तो
गली के मुहाने पर झपट्टा मार कर पकड़ लेता हूं उसे
निचले होंठ को अपने दांतों से महीन महीन कुतर देता हूं
दोनों गालों पर अनार उगा देता हूं
किसी दुख का बदला लेता हूं
जाने कैसी संगति है मेरी, कैसा मनोविज्ञान है
बिछड़ने से पहले कर डालो सब तकलीफ कम रहा करेगी
वह कहती -
एक मिनट रूको, जाना तो है घर ही वापस
बस ज़रा लिपस्टिक लगा लूं

/एक मिनट का अंतराल, जिसमें-
बारी बारी से ऊपरी और निचले होंठ पर लिपस्टिक फिसलता है (मन होता मेरा मैं ही अपने होंठों से वो लाली मिला दूं)/

क्षण भर में बदल जाती वो
मैं नहीं बदल पाया सदियों में

हर पल में लगती वो खींचती हुई
टूटता नहीं कभी ये भोर का-सा जादू! 

3 comments:

  1. क्षण भर में बदल जाती वो
    मैं नहीं बदल पाया सदियों में

    हर पल में लगती वो खींचती हुई
    टूटता नहीं कभी ये भोर का जादू!

    Bahut khoob Sir:-)

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  2. वाह, जो शब्द लिखे ना जा सके आज तक, वे यहाँ लिखे देखे..

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