Monday, September 2, 2013

नेकलाइन- दो

मेट्रो की चौकोर खिड़की से बाहर शाम और रात का मिलना देखा जा सकता था। कभी कभी अंधेरे के बीच खड़े पेड़ और अंधेरा होने की मुहर लगा जाते। गाड़ी तेज़ी से फिसलती जाती और बाहर ट्रैफिक पर एथलीट की तरह रूकी गाडि़यां हरी बत्ती की हवाई फायरिंग का इंतज़ार कर रहे होते।

कुछ झगड़े कभी खत्म नहीं होते। हमारा आपस में झगड़ा कभी शुरू ही नहीं हुआ। वे झगड़े जो कभी लड़े नहीं गए, अंदर बहुत झगड़ता है। मैं अंदर ही अंदर उससे अब भी झगड़ लेता हूं। कभी वहां से शुरू करता हूं जहां से सब असहमति भर हुई थी। कभी वहां से जहां विवाद की गुंजाइश थी। कभी उसकी आंखों के ऐतराज़ से ही। कभी उसके बायीं भवहों के तिरछे होकर ऊपर उठने भर से ही तो कभी फोन पर किसी से बात करते हुए थर्ड पर्सन के रेफरेंस के मार्फत ही। मेट्रो जब प्रगति मैदान से मंडी हाऊस के लिए अंडर ग्राउंड हुई तो लगा तो हम भी अपने अतीत के सुरंग में जाने लगे। सफर हमेशा किसी के याद में ही ज्यादा बीतती है। और ऐसे में उसके ठीक सामने पकड़ा गया मैं हम दोनों को भीड़ के बीच अकेला कर गई थी।

वो आज भी उतनी ही साहसी है। जिन जिंदा सवालों के साथ वो मुझे घूरे जा रही थी उससे तो भीड़ में से कई लोग हमारे रिश्ते के बारे में जान चुके होंगे। 

जो रिश्ता खत्म हो गया अमूमन उससे मिलने की इच्छा मर जाती है। शायद वे रिश्ते खत्म नहीं होते। प्रेम में हम जेनेरश भी होते हैं और तह में कहीं जाकर प्रतिशोधी भी। हमारा प्रेम मुरझा गया था। उसकी सांसे तेज़ चल रही थी जिससे शर्ट के नीचे स्फटिक की घूमती मोतियाँ दिखाई दे जाती।  कान के झुमके अब भी उसके बालों के बीच फंस गए से लगते थे। 

क्या कहा था मैंने -
‘‘सिर्फ पूर्ण प्रेम। इससे कम मुझे कुछ नहीं चाहिए। सात गद्दों के बीच एक बाल भी नहीं। एकदम गुदगुदे गाल और भरे भरे उभार। और इससे कुछ भी कम तो गेट लॉस्ट। दरवाज़ा उधर है।’’

दरवाज़ा उधर ही रहा, बस वो नहीं रही। अक्सर ही जिस शाम मुझे पीने का इच्छा दोपहर से ही बलवती होने लगती है उससे झगड़े की दर भी बढ़ती जाती है। मैं अपने संवाद भी बोलता हूं और उसकी शैली और भाव भंगिमा से परिचित उसके भी, कि अभी अगर वो सचमुच यहां होती तो यही कहती। कल्पनाशीलता के किसी मोड़ पर जाकर शून्यता उभर आती है कि मैंने यह जबाव बहुत बेहतर दिया और शायद यह अकाट्य होता।

मगर क्या कहा था उसने -

कुछ भी तो नहीं.

(...जारी)

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