Skip to main content

नेकलाइन- दो

मेट्रो की चौकोर खिड़की से बाहर शाम और रात का मिलना देखा जा सकता था। कभी कभी अंधेरे के बीच खड़े पेड़ और अंधेरा होने की मुहर लगा जाते। गाड़ी तेज़ी से फिसलती जाती और बाहर ट्रैफिक पर एथलीट की तरह रूकी गाडि़यां हरी बत्ती की हवाई फायरिंग का इंतज़ार कर रहे होते।

कुछ झगड़े कभी खत्म नहीं होते। हमारा आपस में झगड़ा कभी शुरू ही नहीं हुआ। वे झगड़े जो कभी लड़े नहीं गए, अंदर बहुत झगड़ता है। मैं अंदर ही अंदर उससे अब भी झगड़ लेता हूं। कभी वहां से शुरू करता हूं जहां से सब असहमति भर हुई थी। कभी वहां से जहां विवाद की गुंजाइश थी। कभी उसकी आंखों के ऐतराज़ से ही। कभी उसके बायीं भवहों के तिरछे होकर ऊपर उठने भर से ही तो कभी फोन पर किसी से बात करते हुए थर्ड पर्सन के रेफरेंस के मार्फत ही। मेट्रो जब प्रगति मैदान से मंडी हाऊस के लिए अंडर ग्राउंड हुई तो लगा तो हम भी अपने अतीत के सुरंग में जाने लगे। सफर हमेशा किसी के याद में ही ज्यादा बीतती है। और ऐसे में उसके ठीक सामने पकड़ा गया मैं हम दोनों को भीड़ के बीच अकेला कर गई थी।

वो आज भी उतनी ही साहसी है। जिन जिंदा सवालों के साथ वो मुझे घूरे जा रही थी उससे तो भीड़ में से कई लोग हमारे रिश्ते के बारे में जान चुके होंगे। 

जो रिश्ता खत्म हो गया अमूमन उससे मिलने की इच्छा मर जाती है। शायद वे रिश्ते खत्म नहीं होते। प्रेम में हम जेनेरश भी होते हैं और तह में कहीं जाकर प्रतिशोधी भी। हमारा प्रेम मुरझा गया था। उसकी सांसे तेज़ चल रही थी जिससे शर्ट के नीचे स्फटिक की घूमती मोतियाँ दिखाई दे जाती।  कान के झुमके अब भी उसके बालों के बीच फंस गए से लगते थे। 

क्या कहा था मैंने -
‘‘सिर्फ पूर्ण प्रेम। इससे कम मुझे कुछ नहीं चाहिए। सात गद्दों के बीच एक बाल भी नहीं। एकदम गुदगुदे गाल और भरे भरे उभार। और इससे कुछ भी कम तो गेट लॉस्ट। दरवाज़ा उधर है।’’

दरवाज़ा उधर ही रहा, बस वो नहीं रही। अक्सर ही जिस शाम मुझे पीने का इच्छा दोपहर से ही बलवती होने लगती है उससे झगड़े की दर भी बढ़ती जाती है। मैं अपने संवाद भी बोलता हूं और उसकी शैली और भाव भंगिमा से परिचित उसके भी, कि अभी अगर वो सचमुच यहां होती तो यही कहती। कल्पनाशीलता के किसी मोड़ पर जाकर शून्यता उभर आती है कि मैंने यह जबाव बहुत बेहतर दिया और शायद यह अकाट्य होता।

मगर क्या कहा था उसने -

कुछ भी तो नहीं.

(...जारी)

Comments

Post a Comment

Post a 'Comment'

Popular posts from this blog

उसने दिल पर चीरा लगाकर उसमें अपने होंठों का प्राणवान चुम्बन के बिरवे रोप दिए।

सौ तड़कती रातें हैं फिर एक मिलन का दिन है। एक हज़ार बद्दुआएं हैं, फिर नेमत की एक घनघोर बारिश है। बारिश कम है जीवन में, प्यास अधिक। इतनी अधिक कि कई बार बारिश के दिन भी प्यास नहीं बुझती। लगातार लगती प्यास हमें मारती है, पत्थर बनाती है। सूखे प्यास का नमी भरा एहसास बारिश वाले दिन ही होता है। दरअसल आज जब मेरी प्यास बुझ रही थी तब मुझे अपने प्यासे होने का सही अर्थ संदर्भ सहित समझ में आया। xxx उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो एक ढाढस सा लगा जैसे कोई एक सक्षम व्यक्ति कारगर उपाय बता रहा हो। वो अनपढ़ जाने किस तरह की शिक्षित है कि वह मुझ जैसे अहंकारी में भी कृतज्ञता का भाव पैदा कर देती है। xxx हमने बहुत कोशिश की एक होने की। लेकिन इसी प्रयास में हमारा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि हमें एक दूसरे की जरूरत हमेशा रहेगी और हम अधूरे ही रहेंगे। यहां तक कि जिस जिस चुंबन में हमने अपने आप को पूरा समेट कर एक दूसरे में उड़ेल दिया, वहीं वहीं हमें अपने विकलांगता का एहसास हुआ। xxx कोई मां बाहर अपने बच्चे को मार रही है। बच्चा ज़ोर ज़ोर से किकियाए जा रहा है। मां गुस्से में उसे और धुन देती है। बच्चे

कुछ खयाल

चाय के कप से भाप उठ रही है। एक गर्म गर्म तरल मिश्रण जो अभी अभी केतली से उतार कर इस कप में छानी गई है, यह एक प्रतीक्षा है, अकुलाहट है और मिलन भी। गले लगने से ठीक पहले की कसमसाहट। वे बातें जो कई गुनाहों को पीछे छोड़ कर भी हम कर जाते हैं। हमारे हस्ताक्षर हमेशा अस्पष्ट होते हैं जिन्हें हर कोई नहीं पढ़ सकता। जो इक्के दुक्के पढ़ सकते हैं वे जानते हैं कि हम उम्र और इस सामान्य जीवन से परे हैं। कई जगहों पर हम छूट गए हुए होते हैं। दरअसल हम कहीं कोई सामान नहीं भूलते, सामान की शक्ल में अपनी कुछ पहचान छोड़ आते हैं। इस रूप में हम न जाने कितनी बार और कहां कहां छूटते हैं। इन्हीं छूटी हुई चीज़ों के बारे में जब हम याद करते हैं तो हमें एक फीका सा बेस्वाद अफसोस हमें हर बार संघनित कर जाता है। तब हमें हमारी उम्र याद आती है। गांव का एक कमरे की याद आती है और हमारा रूप उसी कमरे की दीवार सा लगता है, जिस कमरे में बार बार चूल्हा जला है और दीवारों के माथे पर धुंए की हल्की काली परत फैल फैल कर और फैल गई है। कहीं कहीं एक सामान से दूसरे सामान के बीच मकड़ी का महीन महीन जाला भी दिखता है जो इसी ख्याल की तरह रह रह की हिलता हुआ

मूक सिनेमा का दौर

दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियां   महाराष्ट्र   तक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता में   हीरालाल सेन और जमशेद जी मदन   भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में   प्रदर्शित   होकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों में   प्रदर्शित   करें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारा   निर्देशित   फिल्म ' बिल्म मंगल '   तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहला   प्रदर्शन   नवम्बर , 1919 में हुआ।   जमदेश जी मदन ( 1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।   वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंने   कलकत्ता का पहला सिनेमाघर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस   बनाया। यह सिनेमाघर आ