Monday, September 23, 2013

सुषुम पानी से कहाँ बुझती प्यास

वे कैसी मनःस्थितियां हुआ करती थी। समझाना तो बहुत चाहते थे मगर शब्द नहीं मिलते थे। अचानक से हकबका से जाते थे । अंग्रेजी की टीचर हुआ करती थीं। सात बजे सुबह सामुहिक प्रार्थना चल रहा होता था। हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें। और मन विजय नहीं बल्कि परास्त सा हो चुका था। आज सोचता हूं तो अंग्रेजी टीचर देर रात तक पढ़ती होंगी जभी प्रार्थना में जम्हाई ले रही होती थीं। लेकिन तब लगता था कि उनके पति ने उन्हें सोने नहीं दिया होगा। आखिर क्या कुछ करती रही होंगी इतनी रात तक? तब थोड़ी देर के लिए वे हमारे मन में बेवफा सी हो जातीं। दिल करता हाथ पकड़ कर कोने में ले जाऊं और समझाऊं, आपका पति आपसे उम्मीदें रखता है, आपको चूमता है, मैं कुछ नहीं कर पाता। उसके बनिस्पत मेरा प्यार ज्यादा सच्चा है। आप उसे मार नहीं सकतीं। जबकि मुझे अपने घरेलू झगड़े याद करके भी दस छड़ी ज्यादा मार सकती हैं। मैं कुछ हो सा गया है। आपको लेकर मैं रोता हूं, दोस्तों से बचता हूं। जब आप विलियम वर्डस्वर्थ और जाॅन कीट्स की किसी कविता का मर्म समझाती हैं तो शिद्दत से महसूसता हूं कि अभी तो मेरे पास आपकी समझ को छूने की काबिलयित नहीं है लेकिन शायद मैं आपसे प्रेमपूर्वक यह शास्त्रार्थ करने के लिए ही जन्मा हूं। मेरे लिए, बस मेरे लिए अपनी उम्र रोक लीजिए, मैं जल्द ही आपकी बराबरी आयु और विद्या में करने लगूंगा।

छी आप कैसे उस दिन शनिवार को हाफ डे में पारदर्शी ब्लाउज़ पहन कर आ गई थीं। मेरे सारे क्लासमेट आंखें मार कर कह रहे थे देख बड़ी शौकीन है मैम। अंदर ब्लू रंग का पहनकर आई है। और भी बहुत कुछ। वो सब सुनकर मैंने पहली बार अपने दिल को सिकुड़ता महसूस किया था। टीस की जोंक मेरे धमनी में उतर आई थी। कभी कभी आप पर भी गुस्सा आता था मगर जैसे ही आपको देखता दिल होता कि मैं आपसे माफी मांगू कि मुझे कुछ हो गया है, आप परेशान न हों, मैं जल्दी ठीक हो जाऊंगा। अजीब अजीब तर्क मन में आते। आप संगीत की कक्षा में अपनी सैंडिल उतार कर अंदर जातीं तो मैं उन्हें चोरी चोरी छूता। मुझे लगता मेरे अंदर कोई बोझ है जो अब आराम पा रहा है।

यह संयोग ही था कि हमारी कक्षा में लंच से पहले पांचवीं क्लास आप लेती थीं। लंच में मैं चुपचाप उसी कुर्सी को बेंच के पास खिसका कर अपनी टिफिन खोल लेता था। मैं अपने अंदर तब धीरे धीरे कुछ बदलाव महसूस करता, कनपटी से पसीने की धार लुढ़कने लगती, मेरा शरीर आपमें ढ़लने लगता। आप बना मैं बेंच के उस तरफ खुद को देखता और जानबूझ कर अपने लिए सहानूभूति बटोरने की कोशिश करता। मैं सोचता कि आपने जानबूझकर मेरे माथे पर आज अपना हाथ फेरा है और अन्य विद्यार्थियों के बनिस्पत आप मेरे लिए थोड़ी बायस्ड हैं। मैं कुर्सी को पूरी तरह छेंक कर बैठने की कोशिश करता मुझे वे कुर्सी खास आपके बदन के स्पर्श से एक विशेष तरह की गर्माहट भरी लगती। मेरे मन को यह सोचकर बड़ा आराम मिलता कि कुर्सी के इस हत्थे पर हां यही आपकी तराशी हुई बांहें अभी कुछ देर पहले तक थी। पलट कर रखी गई किताब के उन पन्नों के अक्षर मुझे काग़जों में हल्के हल्के तैरते हुए लगते। लगता तालाब में जैसे कोई बत्तख डोल रहा हो। किताब के पन्ने बुखार में हल्के दहकते हुए महसूस होते। और एक दिन जब उस पर जल्दी में कोई और बैठ गया तो उस दिन मैंने छुट्टी के बाद छुपकर मैंने आधी ईंट का पूरा टूकड़ा उसके माथे पे दे मारा था।

उन दिनों रात को अपने घर पर टेबुल लैंप की रोशनी में अंग्रजी की कविताओं के पन्ने फाड़ मुंह में ठूंस कर बेआवाज़ रोता था। जिस रात मैं जितना रोता अगली सुबह आप मुझे उतनी ही धुली हुई मिलती। मुझे आप फिर थोड़ी से बेवफा लगती. मुझे इसमें कोई कनेक्शन लगा। इसलिए मैंने खुद को तकलीफ देना शुरू कर दिया। धीरे धीरे मैं आपकी कक्षाओं में भी रोने लगा।

ज़ारी


1 comment:

  1. रुके हुए को जारी कहते हैं?

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