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सुषुम पानी से कहाँ बुझती प्यास- दो



जिस रात मैं जितना रोता अगली सुबह आप मुझे उतनी ही धुली हुई मिलती। मुझे आप फिर थोड़ी से बेवफा लगती. मुझे इसमें कोई कनेक्शन लगा। इसलिए मैंने खुद को तकलीफ देना शुरू कर दिया। धीरे धीरे मैं आपकी कक्षाओं में भी रोने लगा।
 

कितना कुछ समझा पाती है एक शिक्षिका भी? उतना ही जितना किताब बताता है और उसमें मिला अपना अनुभव। लेकिन ये एंडलेस है। चार लाइन फिर उसमें हम भी जोड़ते हैं। मुझे बहुत जोर का आवेगा जब दिल होता अपनी सीट से उठूं और जाकर एकदम से आपकी कलाई पकड़ लूं और कक्षा से बाहर बरामदे में, किसी खंभे के कोने में ले जाकर आपको कह दूं। और जब कह चूकूं तो चेतना इतनी शून्य हो जाए जैसे साइकिल की घंटी की बज चुकी ‘न्’ रहती है। फिर होश लौटे तो पता लगे कि मैंने जो कहा वो अटपटायी जबान में कुछ और था। ऐसे हिम्मत करके वही का वही कह पाने का मौका आखिर कितनी बार आता है।

किस्मत में लिखी ही थी नाकामी
कभी चुप रह कर पछताए, कभी बोल कर

सर्दियों की वो क्लास याद है जब काली साड़ी पर आप मरून रेशमी शाॅल लिपटा कर आई थीं? चैथी कक्षा तक आंचल से शाॅल पूरी तरह उलझ चुका था। आपने खीझ कर उसे अपने से अलग किया और आपके हाथ से वो फिसल कर नीचे मेरे पैर पर गिर पड़ा था। एक गरमाई लगी थी मुझे। एक विशुद्ध गंध। मैं जिससे चाहना रखता हूं। मैंने अचानक से कहा था - ज्यादा रेशमी क्या है। आपने शाॅल उठाकर पूछा था -what did you say?
और सकपका कर मैं - nothing mam

रात को बिस्तर पर जाकर मुझे अजब सी कमजोरी होती। वो बेआवाज़ रोना होता। मुझे अपने अंदर हर वक्त कुछ टूटता हुआ सा लगता। बेचैनी का आलम यूं था कि जब मैं करवट लेता तो लगता छाती के चूरे हो गए हैं और फेफड़े के पिंजड़ों में दरार आ गई है, वे बजते हुए से लगते जैसे कोई कबाड़ी वाला अपनी साइकिल पर इतवार को उबर-खाबड़ सड़क पर किसी झंखाड़ हो चुकी साइकिल को लिए चला रहा रहा है। उसे पुर्जे पुर्जे हिल हिल कर बज रहे होते हैं। धुंआधार बारिश की शाम एक किकियाती हुई आवाज़ जब किसी गर्भवती कुतिया को सीढ़ी के नीचे से भगा दिया जाए।

कक्षा में जब आप कविताओं को दृश्यों में घटित कर रही होंती, मैं एक उदात्त प्रेम का साक्षात्कार कर रहा होता। कविताओं को जीना, कविता में कही गई बात को साऊंड आॅफ म्यूजिक की अभिनेत्री की तरह उतार कर कुछ देर के लिए आप हमें कुलीन परिवार का फें्रच बना देती जो अब मृत्युपर्यंत जीवन का गौरव गान करेगा। ऐसा लगता आपने मेरे दिल की भुरभुरी मिट्टी में खुरपी लगाकर कोई बीज बोया है और अपने नर्म नर्म थपकी से बिठा रही हो। वे हाथ, वे उंगलियां जो डेस्क पर पड़ते, किताबों को पकड़ते, जो हल्के मांसल भी थे, हल्के सख्त भी, हल्के गरमाई लिए भी रहती। जो आपकी बांहों के रंग से मैच नहीं करते, मगर जब यह लगता कि यह आपकी ही जिस्म का हिस्सा है तो मेरी देह में एक झुरझुरी दौड़ जाती। तब कई तस्वीर सिर्फ इसलिए सुंदर हो जाती उससे आपका कोई न कोई वास्ता निकल आता।

वे क्या चीज़ होती है जब हमारे लिए असीम प्यार भी एक दिन गैर जरूरी हो जाता है और हमें लगने लगता है कि हम अब इसके बिना भी रह लेंगे। फिर वो क्या चीज़ होती है जब हमें लगता है कि अब इसे हटा दिया जाना ही बेहतर है? क्या ये आत्मविश्वास है? जिन चीज़ों को हम नसों में कभी दौड़ता महसूस करते हैं कैसे वो पराई हो जाने के बाद भी हमें स्वीकार करना ही पड़ता है। हम क्या हमेशा ही एक नई दुनिया बसाना चाहते हैं? क्या सचमुच ही हम इतने आत्मकेंद्रित होते हैं कि आखिरकार हमें अपनी ही इच्छा प्यारी लगती है? जो चीज़ें निजी जीवन में महत्वहीन हो जाती हैं क्या वे हमारी नफरत होती हैं?

मुझे हर वो चीज़, हर वो लोग जो आपसे रिश्ता रखते जादुई लगते। आपकी छोटी बेटी जब  वो आपके कंधे पकड़ कर खेल रही होती तो मुझे लगता कितना आराम मिलता होगा उसे जो इस कंधे को छू सकने के काबिल हैं। लगता प्यार कर लेने का नाम है, जी लेने को कहते हैं। उसके जीवन में आने से आए बदलाव या फिर कैसा महसूस करते हैं यह कह कर चूम लेने को कहते हैं। मैं प्यार में हाथ काटने, सांस छोड़ कर नदी में अपनी इच्छा के कई सेकेण्ड बाद तक डुबकी मारने, भूखे रहने की बात नहीं करूंगा। फिर भी एक चीज़ थी जो आपको स्पर्श करने के लिए भी प्रेरित करता था और हस्तमैथुन से भी दूर रखता था। एक जिद्दी कच्चा बीजू आम जो बैठी में आधा धंस कर भी दो फांक होने से इंकार करता है।

प्रेम हमारी जिंदगी में ऐसे ही धंसता है जिसे हम बहुत हद तो पूरी तरह जी भर पाने का दावा कर सकते हैं मगर जी नहीं सकते। जहां कुछ बाहरी मार लगती ही लगती है।

आज ज़ाहिर है आप मुझे राब्ता करेंगी तो मेरे कहे से प्रभावित हो सकेंगी। आप मेरे बारे में कोई भी राय रखें लेकिन मेरी कही बात कम से कम आपके मन में सवालों का तूफान उठाएगी, एक क्षण को सोचने का मौका देगी।


तब लगता आप ऐजलेस रहेंगी। मेरी चाहत पर वक्त की धूल नहीं जमेगी। मैं आपको अपनी हथेली में सुबह के ताज़ी ओस की बूंद की तरह थरथराता हुआ जीवित रख लूंगा।

ज़ारी

Comments

  1. bahut khoob!! aapka padhna hamesha hi sukundaar rahta hai. thanks

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  2. कहाँ हो तुम?
    जहाँ भी हो...लौट आओ बस.

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