Monday, January 20, 2014

नदी में बंसी डालकर हमारे हौसले न तौलो

मैं बूढ़ा हो रहा हूं। इस बात की तसदीक कई लोगों ने की है। शायद अब ऊंचा सुनने लगा हूं। आज सुबह से सीने में बायीं तरफ दर्द हो रहा है। कृषि वसंत के स्पोट्स जो मैंने लिखे हैं, इसके लैवेंजेस की आज रिकॉर्डिंग हो रही है। स्क्रिप्ट अनुवाद करने वाले वाइस ओवर आर्टिस्ट तरह तरह के शब्दों को समझने के लिए मेरे पास आ रहे हैं। मैं डर जाता हूं। इतनी जिम्मेदारी से कभी काम नहीं किया और ये सब आखिरकार ब्रॉडकास्ट और टेलीकास्ट का मामला है। मैं गुमनाम होकर काम करने में यकीन करता हूं। एक मास्टर स्पाॅट लिख दिया, उसके पैसे मिल जाएं, बस।

 लेकिन ये गली आगे जाकर चैड़ी होती जाती है तब होंठ सूखने लगते हैं। जिम्मेदारी से भागने वालों में से हूं इसलिए इन सब कामों की जवाबदेही अपने ऊपर नहीं लेना चाहता। इससे उम्मीदें बढ़ती हैं और उन्हें पूरा करने में लग जाता हूं। सबकी आंखों का तारा बन जाता हूं। लोग मुझमें एक नया रूप देखने लगते हैं। तब लगता है वे मुझे रि-डिस्कवर कर रहे हैं। उनकी आंखों में अपने लिए एक इज्ज़त, खुद को लेकर एक हैरत अंदाज देखने लगता हूं। फिर एक दौर ऐसा भी आता है जब एक निहायत छोटी मगर बड़ी गलती कर जाता हूं..... और इस तरह खुद को एक बेहद सामान्य आदमी परिभाषित करता हूं। मगर तब तक देर, बहुत देर जाती है।

जब काम अपू्रव होता है तो लगता है शायद मुझे यही करना था। कई बार लगता है कि ये मेरा फील्ड नहीं था मैं इस पेशे में धकेल दिया गया हूं। एरिया के सर्किल इंस्पेक्टर की तरह या फिर टैक्स का काम करने वाले जूनियर एडवोकेट की तरह जहां एक समय के बाद यह तय करने की सुध नहीं रहती कि क्या कहां से आ रहा है। बस एक मकसद किसी को खाली हाथ मत लौटने दो। 


मन में इतनी बातें जमा हो जाती हैं कि कई बार छाती लहरने लगता है। एक समतल, धिप रहा इस्त्री लगता है कई बार लगता है उस पर पहना गया शर्ट उसकी आंच जल उठा है। जब कभी कुछ कहीं, मन की लिखने लगता हूं तो जैसे दृश्यों की उल्टी करने लगता हूं। मेरे कुछ बचपन के दोस्त कहते हैं कि मेरी जवानी आई ही नहीं, बचपन के बाद मैं बूढ़ा हो गया। मगर मैं जानता हूं कि मेरी बुढ़ापे की उम्र लंबी है। यह सब लिखते हुए पीठ पूरी तरह पसीने से भीग गई है और किसी बूढी औरत की कमर का दर्द बनकर नीचे उतरने लगी है। 


प्यार में कैसे कोई बर्बाद होता है किसी को उसकी केस स्टडी करनी हो तो मैं उसका नायाब नमूना हूं।
उसके सिग्नेचर में एक अक्षर मेरा भी है। मेरी जिंदगी का वॉलपेपर भी वो और स्क्रीनसेवर भी। इस इतवार तीन फिल्में देखी। एक रूका हुआ फैसला, आई एम और देर रात विमल राय वाली देवदास। फिल्म पर कहने को बहुत कुछ है मगर क्यों मुझे उदासी इतनी खींचती, क्यों मैं तेज़ी से गर्त में जाने की महारथ रखता हूं, क्यों तकलीफ, हर सुख पर अंत में भारी पड़ जाता है, क्यों हर सफलता पर कैमरे की फ्लैश और कचाक होती है मगर असफलताओं पर कोई बाइट नहीं होती? 

बहरहाल आसमान अब भी नीला है जिसमें उड़ते हुए पतंग पर चील भी गोते मार रहा है। जिंदगी जा रही है और हमारा इस पर कोई वश नहीं है। फिलहाल प्रेम और उसका लक्ष्य क्या है? तो अर्जुन का अचूक निशाना जिसके विष बुझे तीर आपके मछली जैसे हृदय की आंख में धंसने पर डिजोल्व हो जाता है और इसके बाद आप जो कहते रहे हैं वो मुझे सुनाई नहीं देता। 

4 comments:

  1. जब कभी कुछ रिक्त सा दिखता हो, समय छूटने की हानि बड़ी लगने लगती है।

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  2. मनुष्य को व्यक्तित्व के विविध आयाम को जानने का प्रयास अवश्य करना चाहिये क्योंकि जीवन में अनन्त संभावनायें हैं ।

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  3. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/01/blog-post_21.html

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  4. बहरहाल आसमान अब भी नीला है जिसमें उड़ते हुए पतंग पर चील भी गोते मार रहा है। जिंदगी जा रही है और हमारा इस पर कोई वश नहीं है।
    absolutely!

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