Friday, February 7, 2014

महक सांवला रंग रखती है।


बात 2005 की है। फाल्गुन का ही महीना चल रहा था। खेत में सरसों झूमते थे। धूप नहीं भी होती तो लगता धूप के छाया की हल्की पीली पतली परत की चादर खेत में अपना शामियाना डाले रहती। इन दिनों हवा बावरी होनी शुरू हुई थी। हवा नीम के पेड़ पर उसके पत्तों के झुटपुटे में हमला करती... अंदर समाकर अंधड़ गोल होकर घूमती। एक अंधड़ सा उठता और और फिर उसी में गुम होकर खो जाती। स्वेटर का मौसम खत्म हुआ जाता था। हवा में ताज़गी थी मगर कहीं से भी ठंड नहीं लगती थी।

फिलहाल शाम के पौने सात बजे थे। अंधेरा था। रोशनी के नाम पर करीब बीस मीटर की दूरी पर एक मकान के छज्जे पर लगी चालीस वाट की नियॉन बल्ब का हल्का पीला प्रकाश था। 

महक मेरे सामने कुछ कदमों की दूरी पर आदतन क्रॉस लेग्स की मुद्रा में हल्के तिरछे होकर प्लास्टिक पाइप से बुनी कुर्सी के घेरे में फूल के मानिंद हौले से रखी हुई थी। नारंगी रंग के शॉर्ट कुरते में एक सांवली लड़की जिसका गला वी आकार में कटा हुआ था। हल्के नीले रंग के लांग स्कर्ट में लिपटी.... जब हवा चलती तो जैसे स्कर्ट पूरी तरह उसके पैर से लिपट कर पनाह मांगती..... और तब मुझे उसकी टांगों की लंबाई का सही सही अंदाज़ लग पाता था।
महक को देखते रहने की भूख मुझमें हमेशा से थी। बस मन नहीं भरता था। 

उन दिनों मैं उसे जी भर देखता और वापसी में घर लौटते वक्त देखे और महसूस किए गए उसके रूप के पूरे विवरण को मन ही मन दोहराता था। लेकिन अगली सुबह होते ही वे सारी डिटेल्स जो रटकर याद किए गए थे, भूलने लगता। जो थोड़ी बहुत धंुधली सी याद बनी रहती उस पर भी संदेह होने लगता। इसे मिटाने के लिए उस शाम को फिर मैं उसे नए सिरे से देखना शुरू करता और तब मैं कन्फर्म होना शुरू करता कि महक का रंग सांवला है। इस एक वाक्य को याद रखने के लिए मैंने एक बार सिगरेट के डिबिया पर भी लिख लिया था कि महक सांवला रंग रखती है। लेकिन वे दिन ही कुछ अजीब थे। और घर आकर कई बार उस एक लाइन को अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर, आठवीं में पढ़ने वाले विद्यार्थी की तरह पालथी मार कर पीठ आगे पीछे करता हुआ ज़ोर जो़र से बोलकर रटता था।
उस शाम जब बल्ब की हल्की पीली रोशनी अंधेरे से अपना जंग लड़ रही थी मैंने गौर किया कि उसने कंधे के नीचे उसने कभी बाल बढ़ाए ही नहीं। जब मैंने कहा - सुनो तो तो हल्के से मेरी ओर तिरछी हुई। गले में पड़ी उसकी सिल्वर चेन किसी खास कोण पर आकर चमक उठी। उसकी तत्काल गवाही में मैंने कहा कि बाल तुम्हें उतने ही चाहिए जितने में तुम उसे झटक कर हमपर बिजली गिरा सको। उसने थोड़ा सगह होकर कहा - क्या मतलब ?
मैंने कहा - खेलने की एक लगातार आदत। एक बीच की एक ऐसी कड़ी जो ज्यादा परेशान न करने के नाम पर व्यस्त रखे।

वह खिलखिला कर हंस पड़ी। यह उसकी पहली प्रतिक्रिया थी। अंधेरे में मुझे सिर्फ उसकी हंसी की आवाज़ साफ साफ सुनाई पड़ी। मैं हंसी को महसूस भी कर सका। इसका गवाही भी उसके गले में पड़े चेन ने दी थी जब वो उसकी खिलखिलाहट पर जुगलबंदी करते हुए उसी कोण पर चमकती जा रही थी। 

मगर सच कई तरह के होते हैं। मेरे बोले गए इस सच ने उसे दूसरे तरह से छुआ था। यह कमेंट उसे साज श्रृंगार के हिसाब से चुभा भी था और कहीं गहरे पैठ कर उसे भीतर तक गुदगुदा भी गया था। 

मुझे आभास हुआ कि वह दोबारा से हंसते हुए अबकी अपना सर नीचे की ओर ले गई है और कुछ सेकेंड बाद फिर अपने बालों को समेटते हुए ऊपर उठी है। अबकी उसकी आंखों में ढेर सारी गीली शरारत थी और पकड़ लिए जाने की हंसी। उसने झट अपनी कलाई से हेयर बैंड खोल कर खीझ में मेरे चेहरे पर फेंकी। बैंड मेरे ठुड्डी पर लगी और एक ज़मीन पर एक चक्कर लगाकर लुढ़क गई।

मैंने कहा - मैंने तुम्हें पकड़ लिया है और यह हेयर बैंड मारने वाली घटना बस अपनी झेंप को मिटाने के लिए की गई एक बदले की कार्रवाई है....

उसका कुरता हर जगह से हिलता रहा। वी आकार वाली जगह से, नीचे कोरो के पास से, पीछे कंधे के पास लगे टेलर के चिप्पी के पास से, और उभारों के बीच के खाली जगह से। जाने वो कहां से छूआ गई थी कि मैं उसके पूरे बदन का मोमेंटम महसूस कर पा रहा था। वो हिलती रही थी। ऐसा कई बार रोते हुए भी होता है जब गले से आवाज़ नहीं निकलती मगर पीठ और छाती के सारे तंतु हिलने लगते हैं, हिलते रहते हैं। मैं उसे तब भी पूरी तरह नहीं देख पा रहा था मगर इस समय जब वो अंधेरे में भी सामने थी मुझे अपने कल्पना से काम चलाना पड़ रहा था।

कुछ रिश्ते अपने शिल्प में कविता की तरह होते हैं। सेंसुअस और इंटेस भी मगर अपनी अपनी राह पर कायम, अपनी डिग्निटी बनाए हुए चलते हैं। 

हमारे बातचीत में यही एक दीवार थी कि न उठ कर कभी मेरे पास आई, न मैं उठकर कभी उसके पास ही गया।
एक समझदारी होती है कि उन्हें पता होता है कि केले के चिकने तने वाली उन जवान और सांवली टांगों के बीच हथेली रखकर गर्माहट पाने का मुकाबला और कोई विकल्प नहीं कर सकता।

2014 के इस फाल्गुन में महक को देखने भर की भूख आज भी जागी है और उसकी याद आज कॉफी की दूसरी घूंट गले से नीचे उतारते हुए मनी प्लांट को देखते हुए पर आई है।

.... सहसा कॉफी और उसकी महक सांवली हो गई है।

2 comments:

  1. aaj bahut dino baad ana hua blog per.

    bahut gazab ka likha hai sagarji.. poora padh lene tak bandhe rakkha.. Bahut Badhiya. :-)

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  2. सागर जी क्या पकड़ है आपकी भाषा पर
    रोचक !! :)

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