Tuesday, September 2, 2014

वो शहर में है। मैं उसकी गुरुता में....



ये एक अजीब सा दिन है। हैरानी नहीं कि साल के कुछ दिन अजीब से होते हैं। कभी कोप भवन में घुसकर बिला वजह ज़ार-ज़ार रोने का दिन होता है। कभी बिना मतलब यहां वहां घूमने का। कभी सारी नैतिकता अनैतिकताओं का चोला उतारकर किसी के साथ कुछ भी कर लेने का, कभी कूट कर इस तरह मालिश करवाने का कि बदन का रोआं रोआं रूई के फाहे सी हवा में तैरते हुए रूक-रूक कर ज़मीं की तरफ आए। कभी बारिश में गलथ कर भीगने के बाद एकदम जमी हुई शिकंजी पीने का, फिर भी गीले कपड़े पहने रहने का और चिकन सूप छोड़कर आइसक्रीम खाने का। 

आज का दिन अजीब, कुछ अजीब वजहों से है। वो सुबह से ही मेरे शहर में है। एक मीटिंग के सिलसिले में आई हुई। मैं उसके ख्याल में गुम हूं। अब तक टेलीफोन पर एक दिलकश आवाज़ जो कई बार दृश्य में बदली है। जिसकी रूक-रूक कर बोलने में कई बार उसका परेशान होना उभरा है। जिससे मुझे उसके माथे पर पड़ रहे बल का पता चला। कभी मेरी एक चुंबन की इल्तज़ा को जिसने इग्नोर करते हुए अपनी लट झटकी है। कभी किसी बात में जिसकी बहुत लाड़ था। आधी रात किसी लम्हें में कमज़ोर होकर जिसने मेरी बाहों पर अपना सर रखा है। कभी बहुत ठहर ठहर कर, समझा समझा कर जो बोलती है। और कभी कभी तो बोल भी नहीं पाती लेकिन जिसके द्वारा उच्चारित अक्षरों के बीच के अंतराल उसके बोले जाने वाले शब्दों से ज्यादा बोलते हैं। वो जो एक मोम का बदन है, तमाम जज्बातों का शीशा है, वो सुबह से इस शहर में है। 

मैं सोचता हूं कि क्या क्या कुछ कर रही होगी वो। भागकर मेट्रो पकड़ रही होगी। फाइलें संभाल रही होगी। टैक्सी का दरवाज़ा बंद कर रही होगी। किसी कैंटीन में बैठ कर उत्तपम ऑर्डर किया होगा उसने। गाड़ी के शीशे से अगर उसे कोई दिख जाता होगा तो लगता होगा कहीं वो मैं तो नहीं। मेरे चेहरे को याद कर सामने वाले अपरिचित चेहरे में समानता ढूंढ़ने लगती होगी। दिल की धड़कन थोड़ी सी जाग जाती होगी। सोचने लगती होगी अगर इस आदमी की हाईट थोड़ी छोटी कर दी जाए, आंखें गहरी और नशीली हो जाए तो यह सागर हो सकता है। कई बार तो लगता होगा, हो न हो ये वही है, क्या पता इतने दिनों में बदल गया होगा। 

कुछ रिश्ते अपने में इतने उलझाव लेकर आते हैं कि हमें अरसे तक पता नहीं चलता कि आखिर हमें उसका करना क्या है। टेलीफोन पर की कुछ आवाज़ों से रिश्ते भी उसकी तरह हवा में टंगे रहते हैं। ये बेतार रिश्ता है। इसमें कई बार मिलने की इच्छा नहीं होती। और कई बार तो ये दिल होता है हम उसे ऐसी जगह से देखें जहां से वो मुझे न देख पाए। प्रेम के ये दांव पेंच सुखद है।

सारा दिन हम एक ही शहर में यहां वहां भटक रहे हैं। वो सचिवालय में है तो मैं दफ्तर में। अब वो लोधी रोड पर है तो मैं बंगाली मार्केट में। अब वो कनॉट प्लेस आने को है तो मैं निज़ामुद्दीन के रास्ते में हूं। हम दोनों एक ही दिन में चूहे बिल्ली का खेल खेल रहे हैं। 

आज सुबह धूप भी अच्छी खिली थी। बर्फ जैसे सफेद बादलों के पीछे से सूरज चमक रहा था। फिर धूप-छांव का खेल चलने लगा। फिर छांव ही छांव थी। तब बादल ही बादल आए। फिर बारिश ही बारिश हुई। दिल्ली की चमकती हुई सड़कों पर नीम के पत्तों के मार्फत होती बारिश.....

आबे हयात बरस रहा है मियां! आबे-हयात। 

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