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दो कौड़ी के दो ड्राफ्ट ख्याल



हालांकि मुझे रेखागणित में कभी दिलचस्पी नहीं रही लेकिन फिर भी बस्ते में एक कम्पास बॉक्स का रहना लाज़मी था। यह अनुशासन के लिए नहीं था क्योंकि मुझे कभी उसकी फिकर ही नहीं रही अलबत्ता कम्पास बॉक्स के अंदर एक तह मोटे गत्ते का बिछाकर तब के गुप्त कोड, तब के मासूम लव लेटर जिसमें बहुत रोने-रूलाने और कसमों वादों के बाद एक चुम्मी पर आकर बात रूकती थी। और तुर्रा ये कि तब चुंबन के आगे कुछ नहीं जानते थे। सोच नहीं चलती थी। और अब..... चुंबन से आगे ही सोचते हैं। उससे कम सोच नहीं पाते। 
तब कम्पास बस्ते का सबसे कीमती हिस्सा होता था क्योंकि कई बार इसमें नेपाली, भूटानी, बांग्लादेशी टका और सिक्के होते थे जिनका कोई इस्तेमाल नहीं था लेकिन जाने क्या था उस उम्र में कि इसे देखने भर से दिल को तसल्ली मिलती थी। उन करेंसी पर वो अनचीन्हे अक्षर, अपने देश की मुद्रा से अलग तरह के रंग, वे डाक-टिकटें.... उफ्फ वो उम्र जब कोई मुहावरे में कहता था-दिल्ली बहुत दूर है। तो पलटकर पूछ बैठते थे- कितने प्रकाशवर्ष दूर! 

***

मेटरलिस्टिक मैं कभी नहीं रहा। शायद यही वजह है कि शहर में ये चीज़ें मुझे जरूरत के बाद बोझा लगने लगती है। यही कारण है कि अब गांव जाता हूं तो पैर में हवाई चप्पल डालने के बाद बस और कुछ नहीं चाहिए होता है। और राह चलते यह सोचकर मुस्कुराता हूं कि कितनी शांति है न? न कदम कदम पर पर्स की जरूरत और न फोन की घनघनाहट। 

मेटरलिस्टिक आज भी नहीं हूं। आखिर महंगे फोन, कैमरा, गजेट्स लेकर भी क्या खोजते हैं उस पर - आखिरकार आदमी ही न। बिना संपर्कों के तो फोन चाहे एप्पल का हो या ऑरेंज का या टोमैटो का। होगा तो एक डब्बा ही न।

संपर्क साधने के आज इतने तरीके हैं - एसएमएस, ई-मेल, ऑरकुट, वाइबर, लाइन, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, गूगल प्लस, वी चैट, ह्वाट्सऐप। आदमी को आदमी के करीब लाने की कोशिश में बाज़ार बनाते ये तकनीक....। मरते और पत्थर हो रहे दिलों के बीच रोज़ तकनीक का एक नया साफ्टवेयर खड़ा हो जाता है लेकिन प्यार..... प्यार तो शिफ्ट हो रहा है।

मैं गलत हूं तो मुझे सही कीजिए। जिस तरह की दुनिया अब बनती जा रही है आपको नहीं लगता कि आने वाले दिनों में विजुअल्स भी अपनी अहमियत खो देंगे? दृश्य के साथ हो रहे इतने प्रयोग ही तो कहीं हमें कहीं संवेदनहीन नहीं बना रही ? कैमरे के साथ हो रही ऐसी अभ्यस्तता! गोया जिंदगी की हर धड़कन को ही कैमरे पर लाने की कोशिश की जा रही है। हम न जाने क्या देख लेना चाहते हैं। हम न जाने क्या पा लेना चाहते हैं।

कान में हेडफोन लगाकर तेज़ संगीत सुनते हुए अपने सर झटकने में हमें पता नहीं चलता कि मेट्रो में बगल की सीट पर बैठा आदमी अचानक से बेहोश हो गया। कारण तो दूर की बात है। दरअसल उस गीत को सुनते हुए हम ऐसी प्रतिति देना चाहते हैं जैसे हम सबसे ज्यादा अलमस्त, फक्कड़ और बिंदास हैं लेकिन उसकी कई शर्तें हैं। क्या इसे अपने में मगन होना कह सकते हैं? क्या अपने में मगन होने का अर्थ बदल गया है? हम किसी चीज़ में मगन होते हैं, अपने में कहां? हमें इस तरह किसी चीज़ में मगन देखकर हमसे कोई पानी की बोतल चाहकर भी मांगने की जहमत नहीं उठाता। हमने आंखें पढ़ना इतना कम क्यों कर दिया? हम सबको यही संदेश देना चाहते हैं न कि कोई हमसे कोई मदद न मांगे, सभी हमसे दूर रहें? लेकिन हमें जरूरत हो तो सभी उपलब्ध रहे। वरना हमें शिकायत हो जाती है। हम न जाने कहां जा रहे हैं। इस ‘न जाने कहां’ को इन्जॉय कीजिए । 

Comments

  1. कल 21/सितंबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  2. कम से कम पहले के साथ तो तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। दूसरा वाला मेरे जादा करीब है, पर दिल के करीब नहीं। पहले वाला; कभी ख़ुद के पास कॅम्पस वाला बक्सा नहीं था, न हमारे स्कूल में लड़कियाँ थीं, इसलिए शायद प्यार करने से डरते रहे.. उसे वहाँ कभी नहीं पढ़ पाये। गणित तो ख़ैर तब से लेकर आज तक बिगड़ा हुआ है। पर अब प्यार पर कुछ-कुछ कह देते हैं, हम भी।

    लगता है कुछ अधिक व्यस्तता है, इसलिए पिछली बार भी होटल में लड़की की आँखों को और नहीं पढ़ पाये होगे। पढ़ लेते तो हम भी थोड़ा बहुत 'फ़र्स्ट हैंड' ज्ञान प जाते।

    ऐसे आते हो तो अच्छा लगता है, आते रहो। चाहे जैसे भी आना है।

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  3. Aapka lekh damdaar hai... Aaj ghar me guest bhi aa jayein to sab apne wtsaaap. Aur facebook me mashgool hote. Hain unhe jyada samay nhi dete... ..hakikat se door ho gaye hain internet phn ki lat me hum sab!!

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  4. इसे पढ़ना, तुम्हारी कवि कह गया है वाली कविताओं की याद आती है इस लड़़के को पढ़ कर।
    "और सनद रहेगा कि -
    यथार्थ के समक्ष हमेशा जीवित रहते है स्वप्न
    भविष्य के एक सिरे को थामे रखती हैं स्मृतियाँ
    और
    समाजशास्त्र से कंधे मिलकर खड़ी हो सकती है
    एक छोटी सी कविता."

    http://the-blue-clue.blogspot.in/2014/09/blog-post.html

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  5. बिना संपर्कों के तो फोन चाहे एप्पल का हो या ऑरेंज का या टोमैटो का। होगा तो एक डब्बा ही न। और संपर्क आदमी का आदमी से हो तो अचछा है ना बनिस्बत कि फोन का फोन से।

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  6. लतखोर हो तुम। अगला पोस्ट का मुहुरत निकलवाओगे?

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  7. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/10/2014-4.html

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  8. आखिर महंगे फोन, कैमरा, गजेट्स लेकर भी क्या खोजते हैं उस पर - आखिरकार आदमी ही न। बिना संपर्कों के तो फोन चाहे एप्पल का हो या ऑरेंज का या टोमैटो का। होगा तो एक डब्बा ही न।
    ..सच कहा आपने ...

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी है और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - सोमवार- 20/10/2014 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः 37
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें,

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