Tuesday, October 28, 2014

एक बस दिल में अब यही ख्याल आता है



कूथता हूं कराहता रहता हूं
खुद को शरापता रहता हूं
दिल मेरा मुझको लानतें भेजता रहता है
बरामदे में पड़ा किसी बूढ़े सा खांसता रहता है
जबकि ये जानता हूं कि लिख सकना अब बस अपने लिए है
ये एक हस्तमैथुन करने की आदत सी है
दिन निकलते रहते हैं बोझ बढ़ता जाता है 
कोफ्त पलता जाता है खुद पर शक बढ़ता जाता है 
न लिख पाना हस्तमैथुन न कर पाने से भी ज्यादा बड़ी खीझ है

हां, पहले लगता था एक नदी भर रो सकता हूं 
सबका और किसी एक का भी हो सकता हूं
आज लगता है मेरी आंखें एक नदी भर सोख सकती है
एहसास से बालातर हूं
मैं सबसे बेखबर हूं
आज न किसी का रहगुज़र
और न किसी का रहबर हूं

रात आ ही जाती है दिन भी हो ही जाते हैं
कैलेण्डर पर साल महीनों के पन्ने बदल ही जाते हैं
मगर दिल है कि मेरा पत्थर हुआ जाता है
बेग़ैरत, खुदगर्ज और कमतर हुआ जाता है

राह आगे अब न कोई दिखाई देती है
मुझको मेरी ही रूलाई नहीं सुनाई देती है 
वक्त की यह कैसी व्यंजना है
मैं जो भी करना चाहूं कब मना है
पांव बढाता हूं न पीछे खैंच पाता हूं 
अब तो करूं या न करूं ये भी न सोचता हूं
ज़िंदगी उधार की लगती थी तो नियम से चुकाते थे
तलवों में गर्मी उफनती थी गरज कर जोश से गाते थे

शिकायतें किसी से रहीं नहीं क्या करूं
मैं किस लिए जीऊं, मरूं, क्या लड़ूं
उठा था, उठ कर कुछ कदम ही अभी चला था
मैं अपनी पूरी ताकत से दीवार से टकरा गया था
दीवार ने कहां मैंने तो खुद को ही गिराया है
सामने की दुनिया कहां तमाशाबीन है 
मेरे लिए अब खुद उठना तौहीन है 

अब न मरने पर भी जवाल आता है
आंखें अब इस कदर सूनी हैं कि 
हल्की सर्दी की इस सांझ में पहाड़ों के धुंध में मिल जाने को होता है
एक बस दिल में अब यही ख्याल आता है 

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