Thursday, May 28, 2015

पतली लकीर की सिसकी



रूम पर की दीवार घड़ी रूक गई है। नौ बजकर पचास मिनट और चालीस सेकेण्ड हुए हैं। और यहीं पर घड़ी रूक गई है। सबसे बड़ी सूई चालीस और इकतालीसवें सेकेण्ड के दरम्यार थिरक रही है। एक हांफती हुई स्पंदन। एक बची हुई सांस। एक खत्म होने की ओर दस्तक। एक पूंछ कटी छिपकली की पूंछ जो बस थोड़ी देर में थम जाएगी।

जिंदगी भी यहीं आकर रूक गई है। पैर बढ़ते तो हैं तो लेकिन कोई कदम नहीं ले पाते। इस घड़ी को देखता हूं तो अपने जीवन से बहुत मैच करती है। अव्वल तो एक ही हिस्से में घंटे, मिनट और सेकेण्ड की सूई है। और दूसरी तरफ सपाट मरूस्थल। एक हिस्से में कुछ हैपनिंग। दूसरी ओर निचाट अकेलापन। दरअसल होता क्या है कि हमारे जीवन की घड़ी में भी सभी सूईयां किसी न किसी वक्त एक दूसरे से मिल जाती हैं। बस तभी हमें जिंदा होने का एहसास होता है। उन वक्तों में अपनापन होता है। और बाकी वक्तों में अधूरापन। और बाकी वक्तों में सूनापन। और बाकी वक्तों में खुद से अजनबीपन। और बाकी बचे वक्तों में हम मरते जाते हैं। शनैः शनैः....

3 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. आपकी इस पोस्ट को शनिवार, ३० मई, २०१५ की बुलेटिन - "सोशल मीडिया आशिक़" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद।

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  3. ye dheemi maut kitne hee mar rahe hain

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