Thursday, July 16, 2015

खगोलवेत्ता के सर पर गड़ा तंबू



यह एक खोया हुआ दिन है और तमाम रास्ते तुम्हारी तरफ जा रहे हैं। 

मैं एक सैलानी हूं। तुम्हारे साम्राज्य में आया हूं। अपने पीठ पर बस्ता लटकाए, हाथ में पानी का एक बोलत किए। तुम्हारी अकूत सुंदरता पर मोहित हूं। बनाने वाले ने तुममें नैर्सगिक सौंदर्य बख्शा है। पहाड़, जंगल, नदी, झरना, विस्तार, ढ़लान, सपाट मैदानी भूभाग, एक अप्रतिम शांति जैसे सारे शोर चुप हों। जैसे मन की सारी उलझनों का जवाब मिल गया हो। मेरे अंदर से सारी उलझनें जैसे निकल कर इसी जंगल में बिला गई हो। मैं प्रकृतिस्थ हूं। एक प्रकार से समाधिस्थ। आंखों के आगे इस ढ़लुवा ज़मीन पर छोटे छोटे हरे पेड़ देखता हूं तो लगता है जैसे मेरे अंदर से करूणा की एक ब्रह्मपुत्र फूट रही है। जैसे सारी दुनिया में इस नदी का विस्तार होना चाहिए। जैसे सारी चीज़ें मुझमें ही समाहित हैं। 

इस तरह किसी का हाथ थामे शौकिया किसी बूढ़े सा टग रहा हूं जिसे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं, बस साथ होने का एहसास होना चाहिए। अंदर से अकेले को भी साथ का यह संबल चाहिए। तुम्हारी पनाह में घूमते घूमते यह डिमांड और सप्लाई जैसा कुछ मामला है। 

खो गए लोगों की याद में 
1.
पेड़ तुम्हारी तरह हंसता है। झब्बा झब्बा सा। फुग्गा बन जाता है। एक छोटे घने हरियाले झाड़ी में जैसे ऊदबिलाव आ घुसता है और अंदर ही अंदर बवाल काटता है। हमारी आंखें एक अनजाने से रोमांच में चमकती रहती हैं और मन में यह ख्याल आता रहता है वो जाने अंदर क्या कर रहा होगा। बड़े बड़े स्तनों वाली किसी परिपक्व महिला की तरह जिसने बिना ब्लाउज़ के अपने बदन पर साड़ी बांधी हो। हंसी तुम्हारे अंदर घुस कर जाने कहां कहां जाती है, पेट हंसता है या तुम्हारी आंखें, भवें, दांत, गाल और कभी कभी तो पूरा बदन ही। लगता है हंसता तो सिर्फ पेट ही है बाकी पर सिर्फ रिफ्लेक्शन आते हैं। मैं वो एक जोरदार, भरपूर हंसी बनकर तुम्हारे अंदर उतरना चाहता हूं जो तुम्हारे शरीर के सभी ऊत्तकों को झिंझोर दे। मुझमें एक हंसी के रूप में इतना वेग हो कि तुम्हारे बाल कंधे पर छितरा जाए, तुम्हारे पैरोंके पंजों को थोड़ी देर के लिए स्पंजी कर दे। तुम पुलक पुलक हंसो और तुम्हारे शरीर का एक एक अणु प्रकाशित हो उठे। शरीर का अंग-अंग मुस्काना या लजाना होता है!
2.
तुम नाचती हो तो ऐसा लगता है जैसे कुछ कहने की कोशिश में हो। सुख, दुःख, विषाद, प्रेम, उन्माद, सांझा, अंतरंग, व्यक्तिगत इन सब के कहने के बाद भी जो बच जाता है, जो हमें बूढ़ा बनाता है। नाचना पुर्ननवा होना है। जब तुम शुरू होती हो तुम्हारी छाया उतरने लगती है। कंधे पर के बादल दांए बांए होते हुए वो बयान देते हैं जो तुमने कभी न करना चाहा था। नाचना एक सहमति है जैसे कोई बच्चा कबूलता है - क्या करूं, हो गया। 
आधी रात एक दूसरे से लगकर रोने जैसा। नाचना रोने की पुकार को सुनना संभव बनाती है। मेरे श्रवण शक्ति को मजबूत बनाती है।

मैं तुम्हारे साथ नाचना चाहता हूं। उन्माद में नहीं, जलावन की जलती आंच पर आहिस्ते आहिस्ते। सांस की धीमी लौ की तरह। मोमबत्ती के पूरी तरह लग कर फर्श में मिल जाने की तरह।

मन का भारीपन जो हर कुछ दिनों पर जम आता है हमारे भीतर। शरीर के रेशे रेशे में तर हो जाऊं, तुम्हारे पसीने, रक्त, अस्थिमज्जा और वीर्य का तत्व बन जाऊं तो समझो कुछ बन सका।

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