Monday, September 28, 2015

जोड़े की आवाज़


कभी कभी दिमाग की नसों का धड़कना भी सुनाई देती है। घड़ी की टिक टिक की तरह बजती हुई। एक शांत शोर। सर्दी की एक शांत सुबह की तरह जब किसी अभौतिक बात पर सोच सकें। कि जैसे धूप में कुर्सी लगा कर बैठे हों और हाथ पर एक तितली मर्जी से आकर बैठ जाए। बिरंगी तितली। अपनी हर सांस के साथ पंखों को खोले और बंद करे। पंख जब खुले तो किसी कविता की किताब की जिल्द लगे। उनपर बनाने वाले की उम्दा कशीदाकारी हो। गोल गोल हाईलाटेड घेरे, साड़ी की काली किनारी, और थोड़ा ऊपर कभी नीला रंग घुलते तो कभी पीला... तो कभी रंगों में में कई रंग...। एक सपनीला संसार। जैसे पॉलिस करके खुद के रोज़ अपने घर से निकलती हो। अपने ऊपर की लिपस्टिक को और गाढ़ा करके लगाती हो। कभी जो हमारे उंगलियों को छू जाए एक कच्चा रंग हमारे हाथ पर रह जाए। उसका सिग्नेचर’.....  छूअन ऐसी जैसे किसी मेमने के कान.... कुछ चीज़ें सुभाव से ही हमारे मन को निर्मल बनाती हैं.....

कुछ के पंख ऐसे होतें हैं जैसे सफेदी जा रही दीवार पर बैठी हो। उसकी तंद्रा भंग हुई हो वो उड़ने के लिए अपने पंखों का गत्ता खोली ही हो कि उस पर सफेदी के छींटे पड़ गए हों।

कुछ के पंख ऐसे होते हैं - जैसे करारा कागज़ी दुपट्टा। हम अपने उंगली से उसका टटकापन महसूस कर सकते हैं। जैसे महबूबा के साथ साथ चल रहे हों... और उससे आधे इंच पीछे भी हों। और ऐसे में उसका दुप्ट्टा अपने दो उंगलियों में ढ़ील देते हुए ऐसे लपेटा हुआ हो, जिससे उनको कहीं से भी कसावट या खिंचाव पता न चले।

मैं इन दिनों उसी तितली के रंगों में गुम रहता हूं। वो उड़ कर चली गई है। लेकिन उस सुग्गा नाक वाली तितली के सुग्गापंखी दुपट्टे का रंग मुझपर छूट गया है। कभी भी फुर्सत में जब मैं जब उस रंग को छेड़ता हूं तो वह और फैलती है। जैसे धमकाती हो कि जैसा है रहने दो ज़रा भी और छूआ तो ये देखो मैं अपने डैने खोल रही हूं - उड़ जाने को।

1 comment:

  1. http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html
    ये तुम थे? कि हो?

    चीजों को सूक्ष्मता से देखना बरकरार है...उनसे जिन्दगी के बारीक ताने बाने को जोड़ना भी. तुम्हारे लौट आने का मौसम कुछ देर ठहरे ऐसी उम्मीद करने को जी चाहता है.

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