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बुझता नहीं धुआँ




प्रस्तुतकर्ता सागर पर Tuesday, March, 16, 2010

Comments

  1. सागर...अथाह...अनंत...अबूझ.
    गहराई जहां रौशनी की किरण भी न पहुंचे ऐसा कुछ है जो तुम में करवटें लेता रहता है.

    सागर साहब...सलाम!

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  2. स्पीचलैस..

    देवकी की आंठ्वी संतान... क्या बात है जानी..!

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  3. गुरु बैठे तो हम भी ऑफिस में है ! पर आज भटक नहीं पा रहे.

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  4. संवेदनशील रचना।

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  5. दुनिया चार पैसे के लिए मर रही है और हम यहाँ चार लम्हे के लिए
    अपना हीं ज्ञान हडकंप मचाता है
    मेरे मन में आते विचार देवकी की आठवी संतान क्यूँ नहीं हो जाते...
    सही है.. और अंतिम वाला तो एकदम सोंच से परे

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  6. 'सोचालय'- सोच कर रखा है भाई नाम !
    अद्भुत ! सोच कहीं आ सकती है, कहीं से आ सकती है ।
    अपने लिये कहूं -
    "आ नो भद्रा क्रतवो यन्तु विश्वतः..."
    यहां से भी !

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  7. जैसे किसी खुदाई में मिली पत्थर पे खुदी या फिर किसी लेखक की अनछपी रचना हो कोई..
    लिखे शब्दों पे फेरी लकीर अजीब सी मनोस्थिति बनाती है.(सभी लोग मिट जायेंगे)
    आपकी सुपरिचित सम्मोहक शैली में लिखी शानदार रचना.
    बढ़िया अभिवियक्ति बधाई

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  8. न खाते गेंहूँ, न निकलते खुल्द से बाहर
    जो खाते हजरते-आदम ये बेसनी रोटी
    :-)

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  9. ऑफिस में बस कीजिए उतना सा ही काम, नौकरी चलती रहे ,शरीर करे आराम!

    :) कमाल है साहब..जवाबदेही तो बनती है..लगता है रेगुलर करवा करके ही छोडेगे आप..

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  10. आशा है ऐसे कई उड़ते हुए पन्ने ब्लॉग पर आ गिरेंगे !

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  11. जब तुम्हारी बातेँ मेरी बातेँ होती हैँ तो यह कविता है. जब यह मेरी बातेँ नहीँ होती तो पहेली.

    सत्या

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  12. बहुत सुन्दर! राइटिंग भी बुरी नहीं है भैये! जय हो!

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