Tuesday, May 11, 2010

दीदी का खत...



बिसरे ज़ख्मों पर नमक जैसे मेरे प्रिय बेटे,

तुम्हारा पिछला खत पढकर यह संबोधन दिया है जिसमें तुमने घर की याद के बाबत बात पूछी है.

नितांत एकाकी क्षणों में घर की याद आ जाती है. जैसे सूप में आपने आँखें फटकते हुए, फटे हुए ढूध का खो़या खाने में नमकीन आंसू का जायका तलाशते हुए या चावल चढाने से पहले उसे चुनते हुए हुए आनाज और कंकड के फर्क पर शंकित होते हुए... फिर अपनी पत्थर होती आँखों को कोसते हुए...

अबकी साल भी आम के पेड़ में मंजर खूब आया है और सांझ ढाले उनसे कच्चे आम की खुशबु घर के याद के तरह आनी शुरू हो गयी है... अब यह कमबख्त रात भर परेशान करेगी.

तुम्हारे घरवालों ने मुझे कहाँ ब्याह दिया, हरामी ने जिंदगी खराब कर दी. ससुराल जेल की चाहरदीवारी लगती है और मैं सजायाफ्ता कैदी सी.

मैंने ना ही कोई विवादास्पद बयान दिया, कोई विद्रोही तेवर वाली किताब ही लिखी है. कोई सियासी मुजरिम हूँ जो मुझे ससुराल में नज़रबंद रखा गया है.

मैं क्यों अपने घर से निर्वासित जीवन जी रही हूँ ? कहीं यह तुम दोनों दोनों पक्षों की मिलीभगत तो नहीं ??? मर्द तो दोनों जगह कोमन ही होते हैं ना ???

टेशन से छूटने वाली गाडी में भी उतना ईंधन नहीं होगा जितना भावुक ज्वलनशील पदार्थ एक ब्याही औरत के पास होता है... फिर भी रेल है कि आगे बढ़ ही जाती है पर मैं ???

भैया अपनी जिंदगी में सो कैसा फंसा है जो बाईस साल में कभी खुशी से मिलने नहीं आया और बाबूजी ने कोई चिठ्ठी नहीं लिखी.

तुम्हारे बाप को मेरे बेटे की फिकर नहीं है; वो यह भी नहीं जानते कि इस जून में उसने इंटर पास कर लिया है पर मुझे तुम्हारी याद आती है. मेरे दुश्मन बेटे, मैं उम्मीद करूँ तुमसे कि तुम इस परम्परा को तोडेगे और बूढी होती अपनी दीदी से मिलने आओगे!

अंत में, सुना है तुम्हारे बहन की भी शादी होने वाली है, और तुम उससे बहुत प्यार करने का दंभ भी भरते हो ? तो क्या मुझे जैसे को तैसा' वाली शाप देने की जरुरत है ??? 

लिखना

तुम्हारी अभागी दीदी

अंजन
*****



note : हमलोग पिताजी की बहन को दीदी बुलाते हैं.



अबके बरस 
भेज 
भैया को बाबुल... (फिल्म : बंदिनी)



13 comments:

  1. फिर इस बार एक जादू लाये हो जानी.. तुम आदमी चाहे कितने ही घटिया हो पर लिखते बढ़िया हो.. :)

    सोचालय.. अपने नाम को सार्थक करता ब्लॉग बनता जा रहा है.. मनन करने को बाध्य करते शब्द.. सोचने को विवश करती पोस्ट्स.. रेल वाली बात दिल ले गयी..

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  2. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. @ संजय भास्कर जी,
    कभी कुछ अलग भी लिख दिया करें ... कम से कम शब्दों का हेरफेर ही कर दिया करें

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  4. Aapke posts pad kar hindi patrika "Vaagarth" ki yaad aa jati hai.

    :) agar same comment duhrana hoto shabdon ke herfer karna yaad rakhoonga

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  5. Achha kiya jo ant me bata diya ki,bua ko deedi kaha jata hai...mai kuchh der samajh nahi pa rahi thi,ki,khat kisne,kise likha hai!
    Khair! Peshkash bahut achhee hai..

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  6. bahut marmik aankhein nam ho gayi...kitna kasht hua aapki didi ko...

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  7. हमारे भारतीय परिवेश में अभी भी रिश्ते बचे हुए है,बुआ के उलाहनो को चिट्ठी की खो चुकी विधा में अच्छे से समेटा है आपने.पंजाबी में कहते है..ਧੀ ਨਿਸਰੀ ਭੂਆ ਵਿਸਰੀ.

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  8. bhaai ....gazab karte ho .....har seen kisi film ki tarh jahan me ghoomane laga ....maarmik chitran !

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  9. कुछ ऐसे भी खत हैं जो लिखे नहीं गए, बस आंसुओं से गालों पर लफ्ज़ से उभरते रहे, धुंधलाते मिटते रहे.

    "टेशन से छूटने वाली गाडी में भी उतना ईंधन नहीं होगा जितना भावुक ज्वलनशील पदार्थ एक ब्याही औरत के पास होता है... फिर भी रेल है कि आगे बढ़ ही जाती है पर मैं ???"

    पढ़ कर कितनी ब्याही और बिन ब्याही औरतों की रूह काँप जाती है,आखिर सच को देखना आसान तो नहीं होता है.देखा, सुना सच, सपनों में डराता सच...और एक दिन जिंदगी बनता सच. लिखने को यूँ तो बहुत कुछ लिख सकती हूँ...

    मगर यूँ ही...कि और भी गम हैं ज़माने में...

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  10. भई आपकी इस पोस्ट से तादात्म्य स्थापित नही कर सका..कथ्य स्तर पर मुझे काफ़ी कमजोर लगी..पत्र की भाषा व शैली पात्रानुकूल नही लगी..और बिंब-विधान पत्र मे अंतर्निहित स्थाई वेदना के स्वाभाविक संप्रेषण मे कहीं से बाधा डालते से प्रतीत हुए..लेखक का जो प्रयास प्रमुख पात्र के दैन्य, पीड़ा और उससे जनित कटुता मिश्रित रोष और आत्मवंचना को और गहराई से उकेरने मे हो सकता था..वह प्रयास शैली को रसात्मक और बौद्धिक बनाने मे व्यय हुआ लगता है..रचना का संक्षिप्तीकरण भी इसके क्षितिज को सीमित करता है..

    ..और निरंतर तीन-तीन प्रश्नवाचक चिह्नों का प्रयोग सोद्देश्य है या कुछ और..???

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  11. औफिस मे हूँ ........... रुलाओगे क्या........

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  12. अपूर्व जैसे शब्द तो नही है मेरे पास समझाने के लिये :)
    पर तुम्हे पढना अच्छा लगता है लेकिन मै भी पकड नही पाया सही से.. शायद कुछ मिस कर रहा हू.. :(

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