Tuesday, October 5, 2010

क्यों टटोलूं तेरी नब्ज़ मैं ?

राधा-कृष्ण की एक मूर्ति जिसमें कृष्ण खड़े बांसुरी बजा रहे  हैं.राधा का सर कृष्ण के काँधे पर है. पीछे एक गाय है. 


(दृश्य टूटता है)


कई गायें खेतों में चरने लगी हैं. राधा अपना सर कृष्ण के काँधे से उठा कर देखती है ... दिन ढलने को है. पिछले ही पल तो कंधे पर सर रखा था तब तो सवेरा था. अगर काफी देर हुआ तो मेरे गर्दन में दर्द होना चाहिए था लेकिन नहीं हो रहा. कृष्ण, राधा की मग्नता टूटा देख अपनी उंगलियों से बांसुरी के छिद्रों की तस्दीक करते हैं. पीछे गाय अपना सिर हिलाते हुए रंभाती है, उसके गले की घंटी बज उठती है. इसी हलचल में अपने झाड़ू जैसी पूंछ पटकती है और जंभाई तोड़ने के बहाने आखिरकार अपने सूप जैसे कान जोर-जोर से हिला कर हवा पैदा करती है.. फलक बड़ा हो जाता है. पृष्ठभूमि में सुदूर तक मकई के खेत नज़र आते हैं. प्रेम और संगीत के गोद में दिन बीत जाता है.

... मैं महारास की बात नहीं करूँगा पर वो द्वापर था.

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दीदी के शादी की तैयारियां जोरों पर हैं. पूरे घर में सामान की उठापटक चल रही है. पूरा घर मेहमानों से  भरा है. आँगन का चापाकल लगभग दिन भर चलता है और हर बार उसमें से ग्रीस कम होने के कारण लोहे की आवाज़ आती है. एक महीने से काम करते करते पापा ऐसे थके हैं जैसे सुधा की शादी में चंदर थका था.

एक पहचानी की गंध का पीछा करते हुए भंसा घर जाता हूँ जहां गोबर से लीपे चूल्हे पर रोटी सेंकी जा रही है. उसकी महक से आकर्षित होता हुआ मैं भाभी से रोटी मांगता हूँ. भाभी फिर वही सवाल पूछती है हमसे शादी करोगे ? फिर वर्जित अगों पर गुंथा हुआ आटा लगा देती है... मेरी खीझ पर पूरा घर खिलखिला कर हँसता है.


दोपहर का सूरज ऊँचा चढ जाता है और उसकी आंच चूल्हे में समा जाती है. रोटियां तेज पकने लगती है. दीदी की सहेलियां कोहबर गाना शुरू करती है तो आँगन में लगा गेंहू का अम्बार बरबस बताता है की ज़मीन से जुडना क्या होता है और किसान होने का गर्व किसे कहते हैं. (पर क्षमा करना बाबा, यह गर्व अब आप अपने तक ही रखें, पाठक भी इस बात को तत्कालीन सन्दर्भ में ही लें)

ज़िन्दगी स्वस्थ धडकन के साथ तेज़ी से धडकती है.

... मैं सिंकते रोटी के धुंएं से अपनी संबंधों की बात नहीं करूँगा पर वो मेरे बचपन था.

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जब से सिन्हा को गोलंबर पर गोली मारी गई है, पूरा दल हताशा से भरा है. युनिवर्सिटी में पढाई कम राजनीति ज्यादा हो गई है. हर विद्यार्थी छात्र आंदोलन का सदस्य कम, गुप्तचर विभाग का मेम्बर ज्यादा लगता है. गंगा किनारे दरभंगा हाउस की सीढ़ियों पर बैठा मैं महसूस कर रहा हूँ 'लोकतन्त्र में राजनीति को स्वस्थ जड़ बनाने के चक्कर में राजनीति फल में तब्दील हो गई है.'

सेकेंड ईयर वाली परमजीत खाना लेकर आती ही होगी और वह समय भी दूर नहीं जब खिलाते वक्त आगे की योजनाये पूछेगी और हमें हमारी जिम्मेदारियों को याद दिलाना नहीं भूलेगी.

ये वे दिन हैं जब आसमान में खिले चाँद, तारे और उल्का पिंड तक गवाह हैं कि मैं पिस्तौल और गुलाब के बीच करवटें लेता हूँ और दोनों को सहलाने में मेरी हथेली के पोर जीवन सार्थक होने का एहसास कराते हैं. (कृपया ध्यान दें केंद्रीय मकसद गुलाब है जो पिस्तौल से होकर जाता है)

... मैं भविष्य की बात नहीं करूँगा पर वे मेरे जवानी के दिन थे.

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किसी दीवार में पतली सी दरार थी. स्टूडियो में पानी घुस आया है. तारें संपर्कहीन हो बेतरतीबी से ज़मीन पर फैले हैं. उनके बीच से गुजरते हुए हर बार वो पांव में उलझते हैं. स्पीकर त्योरियां चढ़ाये हुए एक दोस्त जैसा लगता है जिससे  अनबन हो चुकी है. सिर के पीछे का पंखा नाराज़ हो एक ही तरफ मुंह लटकाए/घुमाए चल रहा है. सामने की दीवाल घडी तीन बजकर पैतीस मिनट बजा रही है. सुईयों के खिसकने से टिक टिक की आवाज़ नहीं आ रही. रुके हुए पल में समय का बहाव तेज हो चला है. सुईयां स्मूथली अपनी परिधि पर घूमे जा रही है. यह वो जगह है जहां से मैं सब कुछ देख सकता हूँ.

... इस बार, मैं सबकी बात करूँगा, पता नहीं ये मेरे कौन से दिन हैं.

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12 comments:

  1. बड़ी बड़ी बाते ना करते हुए भी बड़ी बात कह दी इस बार.. सोचालय का खास स्टाइल है हर बार कुछ नया और इस बार वही हुआ है.. खासकर राधा कृष्ण वाले सीन में.. जबरदस्त है!! कल्पना की उत्कृष्टता है.. फिर भाभी का मजाक और बाद इसके गुलाब और बन्दूक बड़ा जबरदस्त ख्याल है..

    अंत ऊपर दी गयी हाईप से थोडा कम है पर ये वास्तविकता है इसे एक्सेप्ट करने में भी बुरे नहीं..

    ओवर ऑल सोचालय का जायका बरकरार है..!!!! इस बार उंगलिया चाट रहा हूँ..

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  2. लाजवाब पोस्ट ..परत दर परत हर दृश्य का अपना ही रंग

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  3. श्श्श्श ! चुप रहो !
    दूर पूरब पर हल्की सी रोशनी है, जो चम्पई रंग से मटमैले नारंगी रंग में बदल रही है... पूरा आसमान चूल्हे के धुएं सा धुआँसा... तारे धीरे-धीरे धुंधले हो रहे हैं इस धुएं में...झींगुर की आवाजें चिड़ियों की आवाजों में बदल रही हैं. कुछ ही पलों में सूरज निकल आएगा...
    ... ये तुम्हारा भविष्य है...!
    ...आमीन !

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  4. दृश्य बदलते, दृश्य ढलते,
    उठाते कुछ भाव आँख मलते।

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  5. जानदार और शानदार

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  6. पक्का बुढ़ापे के दिन होंगे यह...मौन, वीतरागी..मगर नजर इधर निशाना उधर टाइप्स! ;-)

    सुंदर भोर से सुनहले भविष्य के लिये हमारा भी ’आमीन’!!

    ...बढ़िया प्रस्तुति..जीवन चार युगों जैसा लगता है...जैसे जिंदगी की गाड़ी साइकिल, आटो, ट्रक और रेलगाड़ी के अलग-अलग चार पहियों पर चलती दिखायी दी हो..हर पहिये का अपना अंदाज अपनी रफ़्तार होती है..जिंदगी को उसी रफ़्तार से लब मिलाने पड़ते हैं..

    ..और हमने तो पोस्ट का मजा (चोरी के)चम्मच से लिया..सो उंगलियाँ चाटने की नौबत नही आयी...:-)

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  7. Aisa lag raha tha,jaise parde pe koyi drushy dekh rahe hain,aur frame badalti rahti hai...har badalti frame ke saath naya drushy drugochar hota chala jata hai!Wah!

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  8. शानदार........ऐसी हरकतों में तुम ओर निखरते हो......इस बार उर्दू से तुम्हारी मोहब्बत देख तसल्ली हुई....एक ओर बिगड़ा हुआ बुरी सोह्ब़त में आ गया........

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  9. युग आते हैं और युग जाएँ,
    बीती हुई यादों के पल नहीं जाएँ...

    बदलते युग और बदलते दृश्य... द्वापर का दृश्य तो बस कमाल है :)

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  10. पता नहीं जवानी है या बुढ़ापा मगर है..पोस्ट दमदार है....

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  11. एक अरसे बाद चंदर और सुधा लौटे आपकी रचना में...:)
    बिनती दिखाई नहीं दी कहीं...:)

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