Monday, October 25, 2010

इनकार



...और घोड़े ने यकायक अगले दोनों पैर उठाये और वापस वहीँ का वहीँ रख  दिया. जो बाल उसकी गर्दन पर लहरा रहे थे उनमें सुस्ती आ गयी. पैर नीचे करते ही उसने अनिक्षा से अपना मुंह फेर लिया. फिर क्या था एक इंच भी टस से मस नहीं. एकदम से से चुप्पी साध लिया, जंकर सा ब्रेक लगना भी नहीं के घिसट के थोडा आगे चले गए. यों के जैसे बेतहाशा दौड़ते हुए किसी ने बड़ी गहरी खाई सामने प्लांट कर दी हो. दोनों पैरों के खुर पड़ने से ज़मीं चोटिल जरूर हो गयी  पर रुकना - एकदम फुल स्टॉप की तरह. तत्क्षण. गज़ब का सामंजस्य. और संयम.

वेग से दौड़ते घोड़े पर उन्मत्त घुड़सवार ने आगे चलने के लिए क्या कुछ नहीं किया. उकसाने वाली आवाज़े निकाली. अपनी भार से घोड़े को यों उत्साहित करने की कोशिश की जैसे बचपन में गिल्ली डंडा खेलते वक़्त गिल्ली से नीचे हलकी सी ज़मीन में जगह बने जाती है ताकि गिल्ली को डंडे से हवा में लहराया जा सके. इस असफल प्रयास से उबकर उसे माँ -बहन से अलंकृत गालियाँ दी गयीं गोया घोडा उसके सारे शब्दों के भावार्थ समझ रहा हो. हालांकि घोडा घुड़सवार के स्पर्श, बोल और आँखों की भाषा से वाकिफ था.

पुचकारने का सिलसिला भी चला तो चाबुक ने भी दरियादिली दिखाते हुए जम कर उसके जिस्म को प्यार किया. इस प्यार से उसके शरीर पर कई लम्बी लम्बी धारियां निकल आयीं. एकदम ताज़ा, लाल-भूरे रंग में. जिस्म गोरा नहीं था अतः नील पड़ने की सम्भावना क्षीण थी. घोडा ने चाबुक योँ खाई मानो पेशेवर मार खाने वाला हो. इस दौरान रकाब से पांव निकल घुड़सवार ने उसके पेट, गले और पैर और जिस्म से जोड़ पर भी ताकत आजमाई.

घोडा कोई बात कहना चाहता था. तीव्र गति से दौड़ने से उसके नथुने सूज रहे थे, उथल पुथल से नाक से पसीने के रूप में कुछ फेन सा निकल रहा था... (नहीं नहीं. घोडा स्वस्थ था. फेन से कोई और मतलब ना निकालिए)  घुड़सवार को उससे कोई लेना -देना ना था. वो तो सैर करना चाहता था. प्यार तो अस्तबल में होता है या सैर के बाद पर काम के वक्त घोड़े का यूँ कदम पीछे खिंच लेना अपमानजनक था. मूड पर पानी फिरने जैसा. हवाखोरी के नशे में व्यवधान पड़ना था. ऐसे में गुस्सा प्यार पर हावी हो गया. सो सवार ने खल खिंच लेने की धमकी देते हुए भरपूर ताकत लगाकर कुछ चाबुक बरसाए. हाँफते हुए थोडा सा सोचा भी क्या यह वही घोड़ा है  जिसकी तंदरुस्ती पर फ़िदा हुए थे ? जिसके आँखों में जूनून की हद तक नशा समाया था ? जिसे दुलार करते तो भी वो मुझसे आँख मिलाने की हिम्मत नहीं कर पाता था ? 

तो इतना तो पक्का था इस राह और आगे बढ़ने से अनिक्षा दर्शाने पर घोड़ा कुछ कहना जरूर चाहता था. 

घोडा क्या कहना चाहता था मुझे भी नहीं मालूम.  मैं जानवरों की भाषा नहीं जानता. जिंदगी में इतना सकारात्मक भी नहीं की मुझे घुडसवार कहा जा सके क्योंकि इंसान के तौर पर मैं भी घोड़ा ही हूँ और मेरी सवारी भी कोई और करता है.

इसी तरह दौड़ते - हाँफते कुछ गली के मुहाने पर मैं भी कदम खींच लेता हूँ. चाबुक पड़ती जाती है मार खाए जाता हूँ.

4 comments:

  1. ओर जिंदगी फिर अगली सुबह हाथ में हंटर लिए....नए दिन के उगने की घोषणा करती है.....

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  2. हमे तो यह अपनी आत्मकथा लगती है।

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  3. मुझे लगता है अंतिम पांच लाईने ही लिखी जाती तो एक सम्पूर्ण पोस्ट बन जाती.. सारा सार तो उन्ही में है

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  4. उत्कृष्ट लेखन...बधाई..

    नीरज

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