Wednesday, July 20, 2011

आत्मकथ्य : एक कविता

जुदाईयों के जंगल हैं। नज़र के इस छोर से दूर औकात तक विचित्र अनगिन प्रजाति के वनस्पति हैं। कुछ अंतराल सपाट मैदान हैं। पेशाब किए जाने के बाद जूझता घास का पीलापन है। बीच से गुजरती छोटी लाइन की सीटी है। सालों से कार्य प्रगति पर है का बोर्ड लगाए सुस्ताते और हवा में तिरते, भूले से भटके और कभी किसी सोचे समझे शातिर मुजरिम की चाल कर बिसरे से लय पकड़ते, तंबाकू खाते, जानबूझ कर छींकते, कभी सिसकारी तो कभी  अंगुलियां क्रास कर ज़मीन पर तीन लकीर खींचते, तो कभी गैरतमंद सा पसीना पोंछते, मुंह ढंके शिकायत और तौबा करते गैंगमैन हैं। बीड़ी पीते सुख बांटने की धुन है। सबका सबसे ज्यादा रोना है। 


मेहनत से उगाया हुआ सत्य है कि इरादतन पाॅजीवीटी की शुरूआत तब हुई जब सामने वाला हमसे ज्यादा रो रहा था। उनके रोने से हम मजबूत हुए और हिम्मत बढ़ाने लगे। एक पैर का दर्द असह्य होने को चला तो दूसरे को लहूलुहान कर लिया गरज ये कि पहले पैर के दर्द से निजात मिले। कम से कम ध्यान तो भटके ! 


अंधेरे में किसी का चेहरा पकड़ा और गीली मिट्टी में ढाल दिया। बूढ़ी हथेलियों से गले को गुंथा गया फिर कई शक्ल बने। अनुभव ने कई बार हलाल किया। आसमान के बादल से एक बाल्टी बादल चुराई फिर बारी बारी सबके पत्तल में एक एक कलछुल परोसा। कभी नेह का गीला बादल गुलाल बना किसी के गाल पर लगा होली मुबारक गाया। अजीज़ को बिना देखे ऐसे मिले कि आखिरी मुलाकात हो। आंख भर देखने के बाद पलक से उस पर दस्तखत किए। छोटे कद के थे और बस्ता लिए फुर्र फुर्र भागे। नदी, नालों में कूदे, सूखते दुपट्टे चीड़ते हुए निकले और बेरोज़गारी की ऊंचाई पर भागलपुर से भोपाल तक का सफर लोहे की राॅड पकड़कर तै की। 

सीधी सी लंबी जुल्फों में ख्याल लपेट लपेट कर कविताएं कीं और उसे घुंघराले बना डाले। वक्त के खामोश पियानो पर हुस्न से कदम ताल करते हुए फिर उल्टा पियानो पर टिकाया। अनपढ़ था लेकिन कई नवयौवनाओं के धड़कनों का आॅपरेशन मरीज को जिंदा रखते हुए और हंसाते हुए कर डाला।

साबुत था मगर सफहे पर भी हाले दिल रखने में विकलांगता का एहसास था और बाज शामें जब फरेबी मौसम को देखकर निसार होते और व्हील चेयर घिसकाते, ‘क्यों नए लग रहे हैं ये धरती गगन‘ गाते किसी अंतिम छोर पर पहंुचते तो उसके बाद फिर साबुत हो कुदरत की बनाई शतरंज सी वादी के हर खाने पर गेंद की तरह टिप्पा खाते। 
नूरानी सा चेहरा था। हमारे व्यक्तित्व में जो भी कसक थी जो कभी तेरा सरमाया था तुम्हें एकांत में खींचने की खातिर था। एक नीम चाल वाली मोम की कपूर से स्पर्श वाली बाहें देर तक गले में घेरा बना झूलती रही। मूंदी पलकें यां आनंद में लीन थी जैसे अपने शिशु को प्रथम बार स्तनपान कराती महिला एक आत्मिक सुख और रोमांच भरे कंपन में लीन हो। ऐसे में गर दोनो तलवे हमारे ही पैरों पर हो तो कहा जा सकता है कि जान तुम्हारी दुनिया इस वक्त अब हमारे हिस्से है और इस एहसान के बदले में तुम मुझको कहीं अपना खुदा लिखना। 

कहना ये कि कत्थक के नृत्य सा मैं ही नायक हूं और मैं ही नायिका। अर्द्धनारीश्वर हूं। 
दर्प ये कि चंद लम्हे तुम्हारे साथ होने के बाद अब तुम्हारी जरूरत नहीं, अनलहक का एहसास है। 

5 comments:

  1. इस कदर ज़िन्दगी से लबरेज़ स्याही से लिखते हो साग़र कि इन धड़कते अल्फ़ाज़ों को छू कर महसूस करने का दिल करता है... जाने कौन रूह बसा देते हो शब्दों में...

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  2. उनके रोने से हम मजबूत हुए और हिम्मत बढ़ाने लगे।
    क्यूंकि वो रोकर हमारी पहले ही बढ़ा चुका था और हमारे होठों में कुटिल मुस्कान थी कि जब हम उसे सांत्वन दे रहे थे...


    PS: tumhare wahan pe login karke comment nahin ho rhe saagar. pehle wala comment badi mehnat se kiya tha dost.

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  3. पहाडी बलखाती नदी में लगा एक पत्ता बन हम बह रहे हैं...
    लाजवाब अंदाजेबयां...

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  4. बहुत अच्छा लिखा है सागर,बधाई...

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  5. http://www.parikalpnaa.com/2011/07/blog-post_480.html

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