Friday, January 27, 2012

एसबेस्टस की छत पर बारिश जोरदार होती है फिर भी मछलियाँ अधूरी प्यास मरती हैं



निचाट गर्मी की रात है। बगलों से पसीने की धार बहती रहती है। सुबह बनी रोटी ढक कर शाम तक रखने से बदबू आने लगती है। हर कोई पस्त है। मौसम न हुआ एक लाल पका पपीता हो गया, सबके दिमाग पर इसका असर चढ़ा रहता है, कोई किसी से ठीक से बात नहीं कर पाता। चिढ़ कर जवाब दिए जाते हैं तुर्रा यह कि किसी को टोकना भी उस पके फल में कौवे के चोंच मारना जैसा लगता है। पंछी ने चोंच मारा नहीं कि आधे से ज्यादा गूदा ज़मीन पर... मतलब अप्रत्यक्ष एक क्रिया इस कदर हावी है कि उसकी होती प्रतिक्रिया बहुत है।

ऐसे में छत पर सीमेंट जमाई हुयी एक सीट है। उस पर लड़की बैठी है। शादी में छह दिन बाकी हैं। बिल्कुल खुला आकाश है। आकाश की पीठ पर तारों का जमघट है। ऐसा लगता है उनमें एक दूसरे पर चढ़ने की होड़ है और इसी चक्कर में वे दीवाली के समय के कीड़ों के तरह अपनी सतह से गिरते जा रहे हैं। प्रेमी युगल इस नज़ारे को देख कर हैरान हैं। वे चकित हैं कि आखिर इतने सारे तारे ज़मीन पर एक ही रात कैसे गिर रहे हैं! पिछले घंटे में ही लगभग चौदह तारे गिर चुके हैं। अपनी 28 बरस की उम्र में उसने कल तक बमुश्किल कुल चौदह तारे गिरते देखे होंगे। रूमानी दिनों में वे तारों के गिरने को वरदान मानते थे और हर गिरते तारे को देख एस. एम. एस. करते, और एक दूसरे को मांगते। मगर यह हकीकत की ऐसी घड़ी है जहां सारी फिलोसफी बेकार है।

लड़की के बदन से हल्दी की महक आ रही है। इन दिनों उसका अजब सा हाल है। विवाहित औरतें उसे हल्दी लगाने के बहाने उसे तथा उसके अंगों से छेड़छाड़ करती हैं।  उसके कुरती के अंदर हाथ डाल अपने दिनों, ख्यालों और मनोभावों के लट्टू लड़की पर घुमाती है।  ही-ही, ठी-ठी और बेशर्म चुटकुलों के बीच एक से बढ़कर एक फंतासी गढ़ती हैं। ऐसा करेगा तो वैसा लगेगा और उबटन-लेप संबंधी कई और टिप्स दिए जाती है। लड़की के ज़हन में दो लड़कों का ख्याल है जो नहीं होने वाला है उसको सोच कर शर्माती है और जो होने जा रहा है उसे सोच खुश नहीं है। यह थोपा हुआ फैसला है जो अमूमन हर मिडिल क्लास घर का हाल है। औरतें टूट टूट कर लोकगीत भी गाती चलती हैं। पूरा घर एक खिला हुआ सरसों का फूल लगता है जिसमें पीले रंग बखूबी उभर कर आते हैं।

इसी बीच, क्षण भर के लिए अति व्यस्त सगा भाई भी आंगन से गुज़रता है, इस छेड़छाड़ को सुन उसे थोड़ा बुरा और थोड़ा भला एक साथ लगता है लेकिन इसे औरतों का मामला समझ वह आगे बढ़ जाता है।

अब मेरा यकीन कीजिए कि इस हंसते खेलते और बेफिक्र घर में मैं भावुकता जैसी ढोल कतई नहीं बजाना चाहता और घनघोर असमंजस में हूं कि शादी से छह दिन पहले मिलन की इस ऐन घड़ी मैं किससे क्या कहलवाऊं, किसके जिम्मे कौन सा संवाद दूं। जज्बाती होने के कारण मैं हर बार थोड़ा रो कर जी हल्का कर लेता हूं। हालांकि आड़े वक्त भावुक होकर रोना मुझे शोभा नहीं देता। मैंने सोचा कि मैं अपनी बहन से इस बाबत बात करूं। वो कहती है तुम तो लिख रहे हो, सुखांत प्रेम कहानी बना दो। इतना तक तो पढ़ने में अच्छा लगा, और पाठक भी खुश होंगे। वह पागल यह नहीं जानती कि यह हमारे हाथ में नहीं होता। मैं किसी मंत्रालय या प्रोड्यूसर द्वारा हायर किया गया स्क्रिप्ट राइटर नहीं हूं जो क्रमशः जनहित या स्वहित में ज़ारी के लिए लिखूं, उसमें योजना विशेष की बुनियादी बातों और लाभ को इन्सर्ट कर उसके एवज में पैसे जेब में डाल अगले काम के लिए निकलूं। 

तो हम ऐसा करते हैं कि जो कुछ मुझसे किसी अदृश्य ताकत द्वारा लिखवाया जा रहा है उसे लिख देते हैं चाहे यह आपको भावुक करे या यह विचारणीय हो, इसकी परवाह किए बिना।

लड़का: (मिमियाते हुए) आज तारे ज्यादा ही टूट रहे हैं? 

लड़की:  हूं...

दोनों समानांतर पटरी पर भी अलग अलग चीजें सोच रहे हैं। 

लड़का: अब इसका क्या मतलब निकालें, मैं तुम्हारे जिंदगी से तारा बनकर हमेशा के लिए टूट रहा हूं या हमारे इस आखिरी मिलन पर भगवान भी फूल की जगह तारे बरसा रहा है ? 

लड़की: जिंदगी में से अगर तुम्हें कोई एक दिन निकालने का मौका मिले तो तुम कौन सा दिन निकाल देना चाहोगे ?

लड़का: (लड़का अपने ही ख्याल में गुम है) हमलोग भी आखिरकार बदनसीब ही निकले 

लड़की: (कातर नज़रों से प्रेमी को देखते हुए, आवाज़ में सन्नाटा, बेबसी और उदासी तीनों का मिश्रण, अबकी कंधा छू कर) जवाब दो, अगर तुम्हें अपनी जिंदगी में से कोई एक दिन निकाल देने का मौका मिले तो तुम कौन सा दिन निकाल देना चाहोगे ?

लड़के का घुटना काफी दुख गया है वो अब पालथी मार कर बैठ गया है। लड़की की गोद में उसकी दोनों हथेलियाँ खुली हुई हैं। लड़का उसमें अपना चेहरा रख देता है। पसीने भरी हथेली थोड़ी और गीली होती है, हथेली के जीभ को नमकीन आँसुओं का एहसास होता है।

लड़का: जिस दिन तुम्हें पहली बार देखा था! ना तुम्हें देखता ना ये फसाना बनता। और तुम ?

लड़की: जिस दिन तुम्हें भैया बोलना पड़ा था। 
(संयोग से दोनों दिन एक ही हैं)

(लड़के की आंखों में थोड़ी मुस्कुराहट तैर आती है। लड़की ज़ारी...)

लड़की: तुम हिम्मत नहीं कर पाए ना...

लड़का: तुम जानती हो इसका कोई फायदा नहीं था। 

लड़की: तुम हिम्मत दिखाते तो मुझे ज्यादा नहीं दुखता।

(लड़का चुप) 

(लड़की ज़ारी)

लड़कीः हुंह (व्यंग्य भरी क्षणिक हंसी) कैसा हमारा भी समाज है। सारे मां बाप डरे हुए रहते हैं। बच्चों को आत्मनिर्भर सिर्फ नौकरी पाने के लिए बनाते हैं लेकिन मर्जी अपनी चलाते हैं। अपनी असुरक्षा को, अपने मन के डरों को लड़कियों के मन में वे शुरू से ही ठूंसना देते हैं कि तेरे भाई के सारे दोस्त भी तेरे भाई ही होंगे...(गला रूंधता है).... आसपास के लड़के भी तेरे भाई होंगे। (रोती है) मुझे हक नहीं कि मैं तय करूं कि कौन मेरा भाई होगा कौन....  (कसपते हुए) मैं तुम्हें दोष नहीं देती लेकिन यह जि़ल्लत समाज नहीं मैं और मेरे जैसे कितने उठाएंगे? हम प्यार भी उनकी मर्जी से करेंगे ? बड़े होकर जिसे भाई बोलने का दिल नहीं करता, उसे भी बचपन में मजबूरी में भाई बुलवाया जाता है। (फफककर) आखिर उन्हें किस पर भरोसा नहीं होता ? अपने पर, अपने ही बनाए रवायत पर या अपने बच्चों पर? 

लड़की झुक कर अपना सर लड़के के कंधे पर रखती है, लड़का उसे थोड़ा किनारे पर ला चूमता है, दोनों के कंपकंपाते होंठ एक दूसरे से लगे हैं। लड़का सहारा देकर पीछे हटने के लिए होंठ थोड़े कड़े करता है, आंखें दोनों की बंद हैं, चार आँखों से आँसू की धार बह रही है। अंदर की टीस, एक अथाह विछोह का दर्द, बहुत सारा भार, पसीना, आँसू की लड़ी सब अधरों के पास सिमट आया है। पता नहीं यहाँ और क्या-क्या है। सब एक दूसरे में इतने घुल मिल रहे हैं कि पहचानना मुश्किल है। शायद यह चुंबन नहीं आकाश में घटित होता कोई घटनाक्रम है। ऐसे घटनाक्रम हर मुहल्ले में घट जाया करता है। चुपचाप। बेआवाज़। बिना कोई सवाल किए..बिना किसी प्रतिरोध के...

लड़का आँखें खोलता है। लड़की के होठों के ऊपर हर रोम पर पसीने की नन्हीं नन्हीं बूंदें हैं। वह रात की तरह उसके जिंदगी से जाना चाहता है ताकि अब उसकी जिंदगी में सिर्फ सुबह ही सुबह हो, उजाला ही उजाला हो। जिल्लत भरी जबरदस्ती थोपे हुए रिश्तों के नाम से आज़ाद....

सहसा दोनों ऊपर देखते हैं (जब आप अंजाम नहीं जानते हों तो ऊपर देखने की दर ज्यादा रहती है)। अबकी चार तारे एक साथ टूट कर गिरे हैं। थोड़ा नीचे आने के बाद बुझ गए हैं। लड़की को लगता है कि धरती टेबल के नीचे रखा कोई कूड़ेदान  है। वहां कुर्सी पर कैसा निष्ठुर ईश्वर बैठा है जो सरदर्द वाले दिन ऐसे स्क्रिप्टों का ड्राफ्ट बना कर फेंक देता है जिसके किरदार हम ही हों।

लड़के को यह लगता है कि धरती ऐश ट्रे है. ईश्वर ही होगा, लेकिन इस अंत पर उसके भी दिल में एक कसक उठी होगी और उसने सिगरेट पी कर तारों के बहाने उसकी राख अपने  अपने उंगलियों से नीचे झटकी होगी।

Tuesday, January 24, 2012

खुदा मिला ना विसाल-ए-सनम


पॉजिटिव बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं। इसलिए बहुत जरूरी है कि वे गा, गे, गी से भरी हों। गा, गे, गी का वाक्यों में लग जाना चार चांद के लग जाने के बराबर हैं। गा, गे, गी महज़ एक राग नहीं है बल्कि एक ख्वाब है। आदमी मुस्कुराने लगता है। जिंदगी में कुछ अच्छा हो ना हो  पॉजिटिव बातें आदमी को खुश रखती हैं। अब जैसे आज हमारे दफ्तर में लाईट नहीं है। एक स्पष्ट सा उत्तर है मरम्मत चल रहा है अतः शाम तक बिजली आएगी। लेकिन अगर आप यह बात कह दें तो बुरे नज़रों से देखे जाएंगे। यू डैम फूल, तुम्हें व्यावहारिकता अपनानी चाहिए और कहनी चाहिए कि एक घंटे में लाइन आ जाएगी। यह सुनने में अच्छा लगता है। अच्छा सुनना एक तरह का प्रवचन है जो आश्रम वाले साधु, सज्जन आपके डिमांड पर देते रहते हैं। आप सप्ताह भर घोषित रूप से गलत काम कर लें और इतवार को आश्रम जा कर मीठे बोल वचन सुन लें तो आपके दिल का बोझ हल्का हो जाता है। एंड यू विल डेफिनेटली फील रीलैक्ड। आपको अपनी नन्हीं नन्हीं आंखों में जीवन के सूक्ष्म मर्म नज़र आएंगे। आपको लगेगा कि आज हमने कुछ एचीव किया। यह रात तक आपको लगता रहेगा। और सोमवार से फिर आप बुरे काम के लिए नए सिरे से तैयार हो जाएंगे। हल्के दिल से भारी भारी बुरे काम करने की कुव्वत आती जाएगी। अगर पिछले सप्ताह दस हज़ार की रिश्वत खाई है तो इस सप्ताह बारह का जोखिम ले लेंगे। ऐसा नहीं है कि आपके अंदर से कोई आवाज़ नहीं आती लेकिन व्यवहारिकता, आध्यात्म पर थोड़ी हावी हो जाती है। एक वक्त ऐसा भी आता है जब हमारे अंदर का कमीना दिल कहता है यार इसके बारे में बाद में सोच लेंगे और सोच भर ही लेने से ही हम पापमुक्त हो जाते हैं हम गंगा नहाने से पापमुक्त हो जाने का चलन है।

गा, गे, गी दरअसल यहीं नहीं हर जगह फुसलाने का काम कर लेता है। वायदे करते समय, सपना दिखाते समय, चुनाव लड़ते समय, भविष्य का निवेश करते समय। जाने हम कैसे इतने आश्वस्त हो गए हैं कि हमारा भविष्य बहुत सुनहरा होगा इसलिए कि हम वत्र्तमान बिगाड़ रहे हैं या उसकी बुनियाद वत्र्तमान को बुरा बनाकर रखनी है।
गा, गे, गी लगे वाक्य आसानी से एक चमकते हुए मछली में तब्दील हो जाती है। सपने देख देख कर हम अघा गए हैं। लेकिन सपने देखना ऐसा लगता है जैसे प्रशंसा के समतुल्य कोई शब्द हो। साला सपनों की कभी हार नहीं होती और इंसान जीवन की वैतरणी पार करने के लिए जैसे कई घाट पर गाय की पूंछ पकड़ कर पार करता है वैसे ही सपना इस इहलोक की नैया पार लगाने का औज़ार बन गया है।

इन बातों को सुन कर मुझे निगेटिव कहा जा सकता है। आप मुझे दूरदर्शन में काम करने वाला कर्मचारी मत समझिए जो अतीत के गौरव की कहानी सुना और भविष्य के गा, गे, गी लपेट कर आपको ऐग राॅल खिलाऊंगा। इन्हीं फालतू के सपनों ने हमें काहिल बना दिया है और हम अपने आज के काम भी सही ढंग से नहीं कर पा रहे और सिर्फ सपने देखने में बिता रहे हैं। इसका मतलब यह भी नहीं कि सपने देखे ही ना जाएं लेकिन कहना ये कि आज़ादी के सपने देखने तक ठीक हैं लेकिन जब आज़ादी होगी तब हम नुक्कड़ पर जाकर जलेबी खाएंगे वाले सपनों में शरीक हो हम कामचोर हो जाते हैं।

जहां गा, गे, गी एक सुरक्षित निवेश है वहीं था, थे, थी एक गौरवपूर्ण उदासी भरा अतीत। दोनों ही आर्कषक हैं। दोनों ही आज मारता है। यही हमारा प्रेम, बचपन, यादें और जीवन भी है जिन्होंने हमारा बेड़ा गर्क कर रखा है।

नोट: गुस्से में हूं, जाने क्या क्या लिख गया हूं। आप इसमें से अपने लिए अच्छी अच्छी बातें (जोकि संभवतः नहीं ही होंगी), छांट लीजिएगा। अब देखिए यह उम्मीद बढ़ाने वाली अच्छी लाइन है तो मार्केट में इसी की दरकार है।
उम्मीद है अच्छा लगा होगा सुनने में ! (पुनः धृष्टता)

*****

सन्दर्भ : देश-दुनिया के मौजूदा हालात, प्रेम, जीवन का शतरंज, पूंजीवाद-समाजवाद- साम्यवाद, शोषण, आम आदमी की औकात, इमारत, मानसिकता, डालर प्रकरण, वातावरण, दफ्तर, मनेजमेंट, जीवनशैली, स्वेट मार्डन और शिव खेडा की दुकान ! 

आभार तो नहीं क्योंकि ये मुफ्त में मिला है, दे कर किसी ने एहसान नहीं किया.

Saturday, January 21, 2012

मेरी पीठ पर एक तिल है, अंदाज़ा लगाओ तो फिसल जाता है




लिखने के लिए आज मैंने तमाम तरह के नुस्खे आजमाए। घंटों सूनेपन के कोलाहल में बैठा रहा। यू-ट्यूब पर कई तरह के आक्रामक और सेंटीमेंटल वीडियोज़ देखे। एक लाइनर के मुताल्लिक सोचा और सोच कर यह पाया कि सलीम जावेद ने अपने मेहनत और अनुभव के वन लाईनरर्स अमिताभ के मुंह से जब बुलवाया होगा तो कितना दर्द होता होगा! मीर, गालिब के शेरों को आधा पौना करके देखा। बचपन याद किया और चाहा कि स्मृतियों से ही उठा कर कुछ लिख टंटा खत्म करूं। और तो और मैंने अपने ज़ख्मों को भी च्यूटी काटी साहब कि कोई तो तड़पो, कुछ तो दुखो, तमाम तोहमतों, जिल्लतों, मान-अपमान-सम्मान को याद किया। अपनी तो अपनी गैरों की प्रेमिकाओं को याद किया। जब उनकी नर्म, गुदाज़ बाहों के बारे में सोच कर कुछ न बना तो बेवफाईयों को याद किया। वस्ल ने काम ना दिया तो विरह का दामन थाम लिया। किसी भोले, मासूम बच्चे की आंखों में भी झांक लिया। लेकिन सब के सब धरे रह गए। ऐन वक्त कोई काम ना आया और मैं खुद को उत्तेजित करने में असफल रहा।

सुबह पार्क में भी बैठा था, पेड़ों, फूलों, पत्तियों से नए और घिसे हुए मानी तलाश करने की भी कोशिश की। किसी बस के साथ-साथ तक दौड़ा। दौड़ा और खूब दौड़ा। इतना तेज़ दौड़ा कि दौडना पीछे छूट गया और अब बदहवासी में भागने जैसा लगा रहा। रफ्तार कुछ यंू हो गई कि मैं बस के कंडक्टर को देख रहा था वो हैरानी से मुझे कि यह कैसे संभव है! फिर ऐसा समय भी आया कि पैर पीछे छूटते गए और मेरी नज़र अपने रास्ते से ज्यादा बस के चक्कों पर टिक गई। उसकी घूमती टायर जो बस स्टाॅप से सरका था तो उस पर ' रालसन' और 'आईएसआई' का निशान दिख रहा था। हल्के हल्के दौड़ते हुए मुझे लगा मैं योग भी कर रहा हूं। मेरी नज़र तेज होती चक्कों पर भी रालसन और आईएसआई के निशान को भी देख रही थी।

अब मेरी रफ्तार इस कदर है कि मुझे उन पहियों पर कसे मोटे मोटे नट-वोल्ट नज़र आ रहे हैं। मेरे शरीर से मेरा दिमाग निकल कर उन पहियों के नीचे आ गया है जबकि मेरे पैर धीरे धीरे थम रहे हैं। मेरी मानसिक तरंगे उन्हीं पहिए के उसी पेंच में फंसती जा रही है। खोपड़ी से रील जैसा कुछ निकल रहा है जो छिटके धूप में थोड़ी थोड़ी चमक जाती है। कुल मिला कर मैं एक टेपरिकाॅर्डर में फंसा पुराना कैसेट हो गया हूं जिसकी रील अपने केंद्र से बुरी तरह फंस कर ज़ाम हो गई है।

मैं थकने लगा हूं। पैर बस घिसट रहे हैं। नट वोल्टों का भी अब तेज़ी के घूमते देखना अब बंद हो गया है। वहां कुछ स्टील जैसा है बस वो चमक रही है। बेतहाशा हांफते रहा हूं, दिल की धड़कन असामान्य हो चली है, शायद नापना संभव नहीं है, सामान्यतया मैं मुंह बंद करके दौड़ता हूं यह इस वक्त फेफड़े को किसी समंदर के उपर मंडराती जितनी हवा चाहिए। 'हांफना' नामक यह क्रिया मेरे नाक तो नाक, मुंह, आंख और कान तक से निकल रहा है। पिंजरे के नीचे और कमर के बची की खाली जगह पर जोरों का दर्द हो रहा है। मेरे दोनों हाथ वहां चले गए हैं। मालूम होता है किडनी अपने जगह पर नहीं रही। कहीं गिर गई है। मैं वो जगह ज़ोर से पकड़ दबाए हुए हूं।

मैं सांसों से भर गया हूं। किसी घाट पर हूं। किसी ने मेरी गर्दन को अपने बलिष्ठ हाथों से पानी में डालकर तब निकाला है जब जीवन की डोर टूटने ही वाली थी। दुःख होता है एकाकार होने के लिए इतना कुछ करना पड़ता है और ये होना इतना मुश्किल होता है।

हैरत की बात है लेकिन कि बस मेरे ज़हन में अब भी है। लेकिन आंशिक रूप से कम होती हुई। मन के एक पतली, बेहद महीन रेखा पर बाल भर सरकती हुई।

लिखने के स्तर पर भी यह सोच की यह सामानांतर पटरियां चलती रहीं। आखिरकार 'ओ. टेस्टेड' के तमगे से महरूम रहा और रेल के खाली डब्बे सा जंग पड़ी पटरियों पर किनारे लगा लुढ़का दिया गया।

Wednesday, January 18, 2012

दुःख जिंदगी के शतरंज का एक विलक्षण ग्रैंड मास्टर है जो एक साथ कई खिलाडि़यों को बखूबी होल्ड पर रखता है



मैं गली में चल रहा होता हूं कि चार हाथ दूरी पर खड़ी दीवार खिसक कर मेरी कनपटी के पास आ गई मालूम होती है। एक झटके वो घूम जाती है। अगली होशमंद सांस में अपने बिस्तर पर ले रहा होता हूं। मेरी पलकों से गर्म मोम पिघल कर गिर रही है। कमरे कर दरवाज़े पर जो परदा है दरअसल वो मेरी खाल है। ऐसा लगता है कि मेरी चमड़ी किसी तेज़ चाकू से उतार कर लटका दिया गया है। मैं अपने बीवी को खोजने की कोशिश करता हूं। जब मैं अपने पैताने देखता हूं वो बहुत फिक्रमंद नज़र आती है। प्रेम में हारी, समर्पित एक दासी, गहरे खुदे बुनियाद वाली बामियान की मूर्ति सी। वो मुझे बचाने की मुहिम में लगी हुई है। मेरा बायां पैर उसने दोनों हाथों से पकड़ बहुत करीने से उसने अपने दोनों स्तनों के बीच लगाया हुआ है। ऐड़ी फेफड़ों की नली पर है और तलवे बीच के खाली जगह पर।अंगूठे और कानी उंगलियों पर उसके दाहिने और बाएं उभार की सरहदों को मैं महसूस कर पा रहा हूं जो संभवत: उंगलियों पर ही आ गई मालूम होती हैं। मैं अपना सर उठा कर अपनी पत्नी को देखने की कोशिश करता हूं। चूंकि मुझे बिना तकिए के लिटाया गया है इस कारण मुझे अपना सिर उठाने में और भी तकलीफ होती है। जबकि मैं सारे ख्याल से आरी हूं, मुझे लगता है कि इस वक्त मेरी बीवी किन जज्बातों से तारी होगी।

मैं थोड़ा और होश में आऊंगा तो सोचने लगूंगा कि क्या वो सोच रही होगी कि आज के बाद से अब मुझे कोई कष्ट नहीं दिया जाएगा ? क्या मैंने एक ही झटके में उसके की हुई सारी जादतियों का बदला ले लिया है? क्या हम हमारे बीच के प्रेम की परीक्षा है जिसके दिव्य दर्शन मुझे हो रहे हैं ? क्या मैंने उसका अहंकार तोड़ दिया है और अपने इरादे में सफल हुआ हूं ? मेरी जिस बीमारी को राम मनोहर लोहिया अस्पताल का मनोविज्ञान विभाग का व्याख्या करने में असफल हो रहा है और डाॅक्टर के तमाम आश्वासन के बाद भी मैं चेक-अप के बाद उसके मेन गेट पर गिर कर उसे इस दृश्य से रू-ब-रू करवा चुनौती देता हूं क्या मेरी पत्नी आंसू बहा कर उसे समझ पा रही है? 

दुनियावी संसार में वापस आ, मैं उठ कर उसे दिलासा देना चाहता हूं कि अबकी मुझे हमारे ऊपर छत गिरता मालूम होता है।

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