Wednesday, March 13, 2013

रॉ फुटेज में डंप जिंदगी


दफ्तर छोड़ने के बाद उसकी अनुपस्थिति ज्यादा हाजि़र हो गई है। वो कोना जहां वो बैठा करता था इतना सुनसान लगता है जैसे जेठ महीने में गलियों में उठते गोल गोल बवंडर हू - हू करते हैं। उसका कम बोलना अब ज्यादा सुनाई दे रहा है। रफ स्क्रिप्टों पर यहां वहां की गई काट पीट, दो शब्दों के बीच में प्रूफरीडिंग की तरह कई निशान लगे हैं, ये खोंच हैं जो गांव की गलियों के गुज़रते टटिये में होते हैं और जिनमें अक्सरहां कपड़े फंसते हैं। अक्सर ही कोई सूत उधड़ कर रह जाता है और हम कभी फुर्सत में उस उधड़े सीवन को ठीक करने की कोशिश करते हैं तो उसकी अंतिम परिणिति उस पूरे धागे को कपड़े से अलग करने पर जाकर खत्म होती है।

ह्वाईट बोर्ड पर विकल्प के रूप में लिखे उसके पंचलाइन, आधे मिटे मिटाए, खुद जन्माए और मारे गए, जो कभी जार्नर, फॉर्मेट में फिट ना होने के बायब या क्लाइंट से अप्रूव नहीं होने के कारण रिजेक्ट हो गए, उन्हें कभी अपनी किताब में संजोने के दिली इरादे की चुप्पी लिए दफन कर दिया कि एक दिन ये मुहावरे के रूप में अपनी शक्ल अख्तियार करेंगे।

अचानक जब भी दराज़ खोलता हूं तो रिसाइकल लिफाफे पर उसके वन लाइनर मिल जाते हैं। बारहा ये बहुत लंबी होती हैं और इनमें ज़िन्दगी के मुख्तलिफ लम्हों, एहसासों और पैकरों का कोकटेल होता है।

एक प्राईवेट नौकरी करता आदमी यूं सामान्यतया एक बैग भर का मुसाफिर होता है। उसे कोई पर्सनल आलमारी दफ्तर मुहैया नहीं कराती लेकिन छूट गई चीज़ों में कई चीजें हैं। फोन पर किसी को कन्विंस करते चश्मा मेज़ पर रखकर रगड़े गए आंखों के टूटी हुई पलकें, फलाने टेंडर के लिए अप्लाई करते हुए अमुक शर्त को अंडरलाइन कर उसका जबाव तलाशने के दौरान माथापच्ची करने के क्रम में टूटे बाल, रखे रखे ठंडे हो जाते चाय की कप, और यदि आपकी आंखों का कैमरा पैन करे तो स्टूडियो के पास रखी ऑफिस की उसकी चप्पल पर ठहर सकती है। पैरों की नाप कितनी छोटी होती है, बाज़ारवादी नज़रिए से सोचें तो कुछ ही नंबर में समा जाता आदमी जैसे कई कुछ नंबर की ब्रा की साइज़ से औरतों को नापते हैं।

ये स्टूडियो जहां दुनियां भर के साउंडट्रैक तैयार होते हैं, वहां उसका 'जी' कहना गूंजता है। कोई माई का लाल नहीं जो आदमी के खामोशी को न्यूएंडो के उन्नत से उन्नत तकनीक पर भी एडिट कर सके। उसका होना अनमिक्स वर्जन था जहां से उत्तम ब्रॉडकास्ट क्वालिटी मिक्स वर्जन आता रहता था।

कभी कभी अब जब फोन का रिसीवर उठाने से पहले अब हाथ एक क्षण को रूक जाता है, किसी गुप्तचर एजेंट की तरह सोचता हूं कि इस पर उसके फिंगरप्रिंट हैं, एक जीवित, कंपन करती थरथराती देह का अंश....... रिसीवर से लगते तारों के गोल छल्ले....हां बस यही था वो.... पेंचदार, लचीला और देह की ही दो ध्रुवों को जोड़ता, उनका मेल कराता... रिसीवर उठाकर सुनता हूं तो एक लंबी डैश सुनाई देती है, आधी रात पटरी पर दौड़ लगा लेने के बाद की रेलगाड़ी जिसके सूने ट्रैक को आप लाल सिग्नल की नज़र से देखें।

सर के ऊपर स्लो मोशन में घूम रहा पंखा है या वक्त अपना ही ग्रह काट रहा है।

रॉ फुटेज में डंप जिंदगी जैसे भोज में दही के पीछे चीनी जैसे खेत में हल के फाल से चीरे लगते और बीज डालते ज़मीन.

अपने ही डायल में चक्कर रहा वक्त में ज़िंदगी की सारी टाइमलाइन खुली है मगर वक्त के साथ भी कोई हमारी तरह गैर जिम्मेदार एडिटर होता होगा तभी यहां के एफसीपी (फायनल कट प्रो) से हर बार बेहतर आऊटपुट नहीं निकलता।

...और कई रफकट फायनल डिलीव्रबलर्स नहीं बन पाते।

3 comments:

  1. लिखने में इतना लम्बा अन्तराल न लिया करो. प्लीज.

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  2. उसका होना अनमिक्स वर्जन था जहां से उत्तम ब्रॉडकास्ट क्वालिटी मिक्स वर्जन आता रहता था...

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