Tuesday, March 19, 2013

संझा और लत्तर


निवेदिता नीले कुरते में तुम बुलशेल्फ के सामने खड़ी हो
नीचे भी कुछ पहन ही लेती
यूं गहरी गहरी नज़रों से झांकती हो
मिलन का लम्स अब तक काबिज है
मुस्काते हुए थकी थकी दिखती हो
थकी थकी दिखती हो या फिर से थकाने का इरादा है
बुकशेल्फ के सामने खड़ी हो
फिर भी मुझे आरा मशीन लगती हो
मैं जरासंध की तरह खुद को चीड़ा जाता महसूस कर रहा हूं।

इस दुनिया में जहां सच के भी प्रायोजक होते हैं
मैं देखता हूं कि बैकग्राउंड के सारी किताबें एक दूजे में मर्ज होकर डिजाल्व होते हैं और तुम निखरती हो
प्रेजेंट्स से लेकर एंड क्रेडिट तक
मुर्गी, अंडा और आमलेट से
फोरप्ले, फक और ओर्गज्म तक
नीले तारे गिनने से लेकर भुखमरी तक
तुम्हारी बालकनी के सामने अपनी गरीब पिता तक को न पहचानने की ग्लानि
से
इतवार को बिना निवाला पूरी बोतल उड़ेले जाने तक
बाल यौन हिंसा से चकमते तारों के साथ शहर बदलने का सफर तय करने तक
मेरे मन के सिनेमा पटल पर तुम ही काबिज हो।

सिग्नेचर की बोतल में लगा मनी प्लांट बुरा मान दूसरे की खिड़की पकड़ रहा है।

2 comments:

  1. बधाई हो आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज के ब्लॉग बुलेटिन पर प्रकशित की गई है | सूचनार्थ धन्यवाद |

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  2. जरासंध! क्या बात है!

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