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संझा और लत्तर


निवेदिता नीले कुरते में तुम बुलशेल्फ के सामने खड़ी हो
नीचे भी कुछ पहन ही लेती
यूं गहरी गहरी नज़रों से झांकती हो
मिलन का लम्स अब तक काबिज है
मुस्काते हुए थकी थकी दिखती हो
थकी थकी दिखती हो या फिर से थकाने का इरादा है
बुकशेल्फ के सामने खड़ी हो
फिर भी मुझे आरा मशीन लगती हो
मैं जरासंध की तरह खुद को चीड़ा जाता महसूस कर रहा हूं।

इस दुनिया में जहां सच के भी प्रायोजक होते हैं
मैं देखता हूं कि बैकग्राउंड के सारी किताबें एक दूजे में मर्ज होकर डिजाल्व होते हैं और तुम निखरती हो
प्रेजेंट्स से लेकर एंड क्रेडिट तक
मुर्गी, अंडा और आमलेट से
फोरप्ले, फक और ओर्गज्म तक
नीले तारे गिनने से लेकर भुखमरी तक
तुम्हारी बालकनी के सामने अपनी गरीब पिता तक को न पहचानने की ग्लानि
से
इतवार को बिना निवाला पूरी बोतल उड़ेले जाने तक
बाल यौन हिंसा से चकमते तारों के साथ शहर बदलने का सफर तय करने तक
मेरे मन के सिनेमा पटल पर तुम ही काबिज हो।

सिग्नेचर की बोतल में लगा मनी प्लांट बुरा मान दूसरे की खिड़की पकड़ रहा है।

Comments

  1. बधाई हो आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज के ब्लॉग बुलेटिन पर प्रकशित की गई है | सूचनार्थ धन्यवाद |

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  2. जरासंध! क्या बात है!

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