Tuesday, May 7, 2013

लैंड माईन्स


मेज़ पर लुढ़का हुआ निब वाली कलम है जो स्कैनर के पैरों के पास कुछ तरह तरह औंधा पड़ा है जैसे रात भर जागने के बाद उसे चौथे पहर नींद आई हो। रूठ कर सोया था जिसकी रूठन नींद में भी दिख रही है। निब का नुकीला हिस्सा मेज़ और स्कैनर के बीच के खोह में घुस आया है। खुद को इस बिंब से बहुत रीलेट करता हूं। लगता है कुछ पैसों के लिए जैसे कोई लड़का अपनी मां से लड़कर रात भर घर के बाहर बिताया हो और पीकर कहीं गिरा पड़ा हो।

कलम अपने में स्याही भरे है। इतना कि कपड़े खराब करता है। थर्मामीटर की तरह झाड़ो तो बुखार की तरह उतरता है। फर्ष को बूंद बूंद रंग जाता है। इसकी निब को देखता हूं तो किसी खूनी वारदात की तरह लगता है। आप इन काले स्याहियों से अपने दिल के लहू के अरमानों में रंग भर सकते हैं। ज़हन बिल्कुल खाली है लेकिन लगता है हुमक कर उठा लूंगा तो यकीनन दिल की बेचैनी को करार हो आएगा।

कभी कभी हम पढ़ते कम हैं या बिल्कुल नहीं पढ़ते हैं। यह जान रहे होते हैं लेकिन इसमें इंगेज रहने का कोई बहाना चाहते हैं। स्कूली दिनों की तरह जहां बाप अगर मटरगष्ती करता देख लेगा तो कोई काम पकड़ा देगा सो बेहतर है किताब में सिर डाले बैठे भर रहो। नज़र नीची रखके दुनिया के तमाम मसाइल पर मन ही मन ड्रिल करते रहो। इन न पढ़ने के दिनों में भी, जब  बुकशेल्फ में कई किताबें रखी हों तो भी राह चलते, बस में बैठे, किले की कोई गुंबद निहारते, शाम ढ़ले पार्क में फैले पेड़ों की अंधेरी काया देखते यह एहसास शिद्दत से उठता है कि बहुत दिन हो गए कोई किताब नहीं रखीदी। वह अलां किताब हमारे पास होनी चाहिए, वो फलां किताब लेने से रह गई। और अगर अबकी वह किताब लेंगे तो सीरियसली पढ़ेंगे। आखिर पढ़ने में लगता ही क्या है? पढ़ना तो अपना शौक है न फिर पढ़ने से काहे इतना भागना ? अरे राह चलते पढ़ लेंगे। हिन्दी तो अपनी इतनी अच्छी है कि बस में तीन स्टॉप खत्म होते न होते दो पेज़ तो औसतन रोज़ाना पढ़ ही सकते हैं। 

लेकिन नहीं हो पाता। महीनों महीने बैग में कम अज कम किताब और एक नोटबुक घूमती रहती है। तो पढ़ने लिखने के नाम पर आज दिखावा आज तक ज़ारी है। 

यही हाल इन कलमों के साथ भी है। बुकशेल्फ में ही ये कलम ऐसे रखे रहते हैं जैसे मिस्टर इंडिया फिल्म में परमाणु रॉकेट बड़े सलीके से रखा रहता है। कई बात तो आधी रात के एकांत में इन कलमों की सिरीज़ को छूता हूं तो कर्ण की याद आती है जब महाभारत के युद्ध में वह अपने तरकष में एक एक विष बुझे तीर सलीके से रखता था।

कोई तकलीफ तो है साहब। आप मानें या न मानें। कभी दिल किलकता है तो कभी किलसता है। अफसोस हावी होता जाता है। अपने भर की पूरी ताकत से ही सर दीवार पर दे मारने का मन हो आता है। होंठ सूखते हैं। हर चीज़ अधूरी लगती है। कभी कभी तो हालत इतनी बुरी हो जाती है कि मैं अपना लिंग परिवर्तन नहीं कर पाता और तब किन्नर बनकर एक बड़ी घुटन महसूस करता हूं।

इन कलमों को देखता हूं तो यही सब कुछ तारी हो जाता है। मैं आखिर किसकी प्रतीक्षा कर रहा हूं? और हैरत तो ये है कि इन प्रतीक्षा में कोई बेचैनी नहीं है। बस टिक टिक टिक टिक सूइयां बज रहीं हैं और मैं किभी भी क्षण एक धमाके से उड़ जाऊंगा। 

फिर एक निर्जीव कलम भी जो मेरे अंदर इतने एहसास छोड़ जाता है कि जिससे ज़हन खाली भी लगता है और बेचैनी अब डब करता लबालब उसका क्या होगा?

वैसे आज रात मैं मेंढ़क बनकर इस निब वाली कलम से अपने दिल का न्यूड फोटोग्राफी करने की कोषिष करूंगा। और यही सही रास्ता भी है कि ऑपरेशन टेबल पर खुद को रेशा रेशा खोल देना और फिर उसे माइंस की तरह अपने अंदर बिछा कर उस पर मिट्टी डाल साबुत बन जाना।

5 comments:

  1. Aapko kalam ki syahi ki si shifat bahut bahut mubaarak.. jub tak kalam ke bheeter rahe tab tak kuch nahi baher aker sade kagaz per faile tho ehsaason ka "sagar" bun jae.. Bahut accha lekhan hai aapka.. Sach kahun tho I AM JEALOUS OF YOU. Honestly..

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  2. likhne me regular hone ka kya loge?

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  3. Sagar saab ye pehli waali photo jyada mukaabil thi abki shakshiyat k liye.. shakl se massomiyat aur badmaashi chalakti thi.. ye bina sulgi cigg. apke sath match nahi ker rahi.. KUCH BANAWATI LAG RAHI.. Kuch nahi BAHUT..

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  4. cigret to bahut peeta hoon sahab. ye banawati hi hai. video editing room mein cig. allowed nahi hai. focus maar raha tha editor ne click kar diya....

    aapne nazar rakhi aur itne achche se bataya... mujhe bahut rucha aapka comment.

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