Thursday, September 19, 2013

गौरी, मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे!

गौरी (गौरीशंकर) मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे। तू ही बता न ऐसे में मैं क्या करूं। काकी चूं चूं करती है। काकी बक बक करती है। कुत्ता भौं भौं करता है। भाभी की मुनिया भें भें रोती है। खुद भाभी भी घूंघट काढ़े भुन भुन करती रहती है। सचदेवा पिंगिल पढ़ता है। कठफोड़वा टक टक करता है। देहरी पर बंधी बकरी चकर चकर खाती रहती है, टप टप भेनारी गिराती रहती है और में में किए रहती है। अउर ऊ जो गईया है का नाम रखे हैं उसका कक्का दिन भर मों मों किए जाती है। हमको मरने के बाद बैतरनी का का जरूरत ? इसी हर हर कच कच में जिन्दे बैकुंठ है। आदमी तो आदमी जनावर तक सुरियाए रहता है।

भोर हुआ नहीं, पंछी बोला नहीं, अजान पड़ा नहीं, घरिघंट बजा नहीं, रत्ना ओसरा बुहारी नहीं, सुधीर घोड़ा वाला खाना चना गुड़ अंटी में दाब के दौड़ने निकला नहीं कि भर हंडी भात परोस दो बूढ़ा को। भकोस कर हम पर एहसान करेंगे। और उस पर भी मिनट दू मिनट सुई टसका नहीं कि सुनो रमायन। हमारा पेट गुड़ गुड़ करता है। मन हद मद करता है। चित्त थर थर करता है। बैठल ठमा बूढ़ा मौगी जेकां कथय छै।

बीनी से हांक रही गित्तु। गौरिया पर साल पारे गए कटहल के अचार संग गर्म भात मिलाकर कंठ के पास रखे जा रहा है। हर तरह से बहुत भूखा है गौरी। गित्तु की खबर कई साल से नहीं थी। उसका चेहरा कितना बदला, ससुराल कैसा मिला। अमरपुर से कल्हे सांझ को टमटम लिया था, एक थान कपड़ा बगल में दबाए। खाली हाथ कैसे आता न, बचपन की दोस्त जो ठहरी गित्तु। एक ही बात समझ में आया गौरी को कि गित्तु को चैन नहीं है। वह तसल्ली से उससे कहीं अकेले में उससे बात करना चाहता है। घर वाले मोहलत नहीं देते। गित्तु अकच्छ है। घिरनी की तरह नाचती रहती है।

गौरिया को अपने ऊपर ग्लानि होती है। मेरी वजह से सबके उलाहने सुन रही है गित्तु। नहीं ही आता तो क्या हो जाता? गित्तु है कि कुछ खिलाकर भेजना चाहती है, थाली तैयार था जिसमें दो फक्का अचार था और एक पुराने स्टील के लोटे में पानी। वैसे तो आंगन में हर कदम पर पैर से पीढ़ा टकराता है लेकिन समय पर पीढ़ा नहीं मिलता। गौरी संज्ञान लेता है, गित्तु घबराती है तो और भी ज्यादा बोलने लगती है। अपना उतावलापन छिपा रही है या ग्लानि। इस एक पंद्रह बीस मिनट में क्या कुछ कर लेना चाहती है? हमारे बीच यही पंद्रह बीस मिनट हैं और हमें इसी मिनट में सबकुछ हल कर लेना चाहिए।

नहीं समझती गित्तु। ससुराल में मेहमानवाजी की इज्जत बचाने पर तुली हुई है। नहीं ही मिलता पीढ़ा तो अपना पूजा करने वाला आसन ही दे देती है बैठने को।

तू कभी और नहीं आ सकता था ? इस बार तो रहने दे लेकिन फिर आएगा न? देख तेरे लिए कुछ कर भी नहीं सकी। मकई कटने का समय है न, सब खेत में उलझे हैं। बब्बू ट्यूशन गया है, सात बजे तक लौटेगा। है तो ट्यूशन ही पर कोचिंग जैसा पढ़ाता है मास्टर। अभी क्या बजा होगा? बीनी झुलाते गर्दन उचकाते हुए देखती है गित्तु। धूप  भंसा घर के खपरैल को पार कर रही है। सवा पांच बजा है। अब दिन भी लंबा........

गर्म गर्म भात और अचार का मसाला! एक तेज़ जलन उठती है गौरी को। आंखों में पानी आ जाता है। किसलिए गीली हुई ये आंखें? किसके लिए? अचार के झांस के बहाने थोड़ा रो लेता है, उसकी हाल पर। आंख चुराकर देखता है गित्तु को। उफ। कितने बहाने! बड़ बड़ करने की आड़ में जाने क्या क्या बोले जा रही है।

'आज रात रूक जाता गौरी।'
एक अनचाही सी मिन्नती जिसमें न रूकने की आस छुपी है। बचपन का दोस्त है, ताड़ लेता है गौरी भी। रेलवे में ए सी मेन्टेनर का रिजल्ट नहीं आया, इलाहाबाद परीक्षा में इंटरव्यू में छंट गया, भुवनेश्वर रेलवे में गु्रप-डी का फाइनल रिजल्ट आने ही वाला है। कहने को अभी तक बस इंतज़ार है, निठल्ला है, रूक सकता है, लेकिन रूकने से सवाल पर ही कौर निगलने से पहले ही ऐसा उत्तेजित होकर जवाब देता है - 'उन्....उन्....उन्नहूं, कल सुबह ही दीदी इंटरसीटी से बेगुसराय जा रही है। फिर साढ़े दस बजे बाबूजी के साथ गौरीपुर बैंक जाना है, पैसा निकालने। वहां से भागलपुर, खतौनी का रसीद कटाने अमीन से मिलना है। कित्ते तो काम हैं गित्तु! और फिर मकई कटने का मौसम वहां भी तो है....'

आंखें फिर एक पल को मिलती है। जैसे चार चोर नज़र मिलते हैं। पंखा झलना एक पल के लिए रूकता है फिर बातों में आई धीमेपन दुगनी तेज़ गति से चल पड़ता है। गौरी भी अपने कंठ में अकट गया निवाले को पानी के एक लंबे घूंट से नीचे ठेल देता है।

खाना हो गया। गौरी हाथ धोकर हवा में हाथ झाड़कर उसे सुखा रहा है। तब तक धोकर रखे गए कपड़े गित्तु रस्सी पर पसार रही है। उसे लगता है कि यह क्या है जो एक कोने से दूसरे कोने तक खुले आंगन में खिंचा हुआ है जिसपर अलग अलग नाप के कपड़े सूखते हैं, बारिश में भीगते हैं और धूप खाते हैं!

गित्तु मुस्कुराती आंखों से गौरी को देखती है, अब नहीं दे सकती हाथ पोंछने के लिए उसे अपना दुपट्टा। सिर्फ इतना कहती है- 'आंचल से अब गौरी पूजते हैं, रोज़।'

यह क्या बोल दिया उसने। अचानक में बोले गए वाक्य कितना सच हो आया है। सुनकर गौरी को टीस मिली खुशी महसूस हुई है। वह तिलमिला सा उठा है। जीभ बाहर कर लंबी लंबी सांस ले अंदर की लहर निकालता है।
विदा लेने का समय आ गया। कुछ बातें समझीं हुई, कुछ समझाई। कुछ बातें तमाम खुलेपन के बावजूद वर्जित। कुछ पर चुप रहना बेहतर। कुछ सवाल हत्या के प्रतिक्रियास्वरूप हैरानी भरी आंखों से ताकती हैं। कई सवालों का जवाब नहीं मिला है। जबकि मिलना जवाब के लिए ही हुआ था।

स्टील की छोटी प्लेट में मेहमान को चार लौंग, दो इलाइची, चार मिसरी, एक जनेऊ और कम से कम ग्यारह रूपया देकर विदा करने का रिवाज़ है। दोस्ती थोड़ा सा रिवाज़ निभाता है बहुत सा रिवाज़ तोड़ता हुआ बुझी आंखों से गित्तु को देखता हुआ बस इलाइची लिए निकल पड़ता है।

मुंह फेर कर आगे बढ़ आए गौरी को कच्चा रास्ता सूनी पगडंडी सा जान पड़ता है। लगता है वे गित्तु की आंखें हैं जिसमें वो अपना होकर भी गैर होकर चल पड़ा है। भुरभुरे ईंटों की गली से निकलते गौरी के मन में सांझ ढ़ले किसी आंगन से उठती लोकगीत सुनाई देती है -

सरसों के कली सिय जोत महान हे तीसी फूल
रंग दुलहा सोहान हे तीसी फूल
उगल चार चार चांद हे तीसी फूल
मोर सजना महान हे तीसी फूल

एक आवाज़ और उसमें आ मिलती है - गौरी, मन चकरघिन्नी सा नाचता है रे, तू ही बता न मैं क्या करूं?
वह तेज़ी से पीछे मुड़कर देखता है। गली का मोड़ तो कब का खत्म हो चुका है।

5 comments:

  1. सुनो रे, अब एक ठो उपन्यास लिख ही दो. भिटनी भिटनी पोस्ट केतना लिखोगे?

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    1. गे बिलाय, कत्ते त बात छय. और केना कहियो.

      कहीं खोज न रेणु के लिखल 'संवदिया'.

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    2. http://books.google.co.in/books?id=zwKeNzNg2Q4C&pg=PA248&lpg=PA248&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80&source=bl&ots=bOIDDJDcMj&sig=JJFLVPBvJJ-wgk6BPOnMCxWWQIE&hl=en&sa=X&ei=U0I9UuSpBILBrAfov4CADw&ved=0CH4Q6AEwCQ#v=onepage&q=%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80&f=false

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  2. आज की ब्लॉग बुलेटिन चुप रहनें के फ़ायदे... ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ...

    सादर आभार !

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  3. bhut achha likhte hain aap...mitti se jude huye...mithila ke laal...thanks.... www.sriramroy.blogspot.in

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