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लो जानां, तुम्हारे लिए कुछ भी...

पानी, एक रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन पदार्थ है.  पानी को जिस बर्तन भी बर्तन में रख दो, उसका आकार ले लेता है. पानी निकाल दो, हवा उसका जगह ले लेता है. मौसम भी पानी जैसा होता है. नहीं मौसम पूरी तरह से पानी जैसा नहीं होता. यह आयतन के मामले में पानी जैसा होता है. मौसम से हमारा वातावरण कभी खाली नहीं होता. एक जाता है तो दूसरा डेरा जमा लेता है. मौसम के रंग होते है, गंध होते हैं और स्वाद भी होते हैं. और जब मौसम में रंग, गंध और स्वाद नहीं होते तो यह पानी जैसा हो जाता है. तब मौसम बेरंग, और बेस्वादी हो जाता है. बहना - बिना किसी मकसद के, फर्क के. शहर के शोर में टूटा हुआ एक दिल जैसा, बस काम काम और काम की धुन, बस चलना, चलना और चलने की जिद जैसा, पुराने किले के सर पर पीछे से पड़ता चाँद के प्रकाश जैसा जिसके आगे किले लम्बाई से अँधेरा हो. एक विरोधाभास जैसा. हम सभी अल्लाह की संतान हैं पर उंच नीच का स्थाई स्वाभाव जैसा. वैसा. ज़हर, अमृत, विरासत, फकीरी, दुःख, सुख, ज्ञान, अँधेरा, रास्ता और रुकावटें. सभी कुछ ना कुछ छोड़ रहे हैं, कारखाना  धुंआ  छोड़ रही है. ... और मैं अपनी गर्ल...

सातवां फेरा

कैमरापर्सन  : रोल कैमरा ! (थोड़े अंतराल के बाद)  एक्शन ! (शब्दों के शुद्ध उच्चारण उपयुक्त स्थान पर विराम और बलाघात* के साथ) "बिहार का मौसम इस बार राजनितिक रंग के साथ मिलकर एक हो गया है. गर्मी जम कर कहर ढा रही है. मेघा रे, मेघा रे मत परदेस जा रे ! तमाम पटनावासियों की फिलहाल यही आरज़ू है. मेरे पृष्ठभूमि में गांधी मैदान उजाड़ और निचाट अकेला है. गर्म हवा के थपेड़े गालों को झुलसा रहे रहे हैं. आसमान में बादलों का पुलिंदा तो नज़र आता है लेकिन बारिश का कहीं नामोनिशान नहीं. भले ही विज्ञान ने कई चीजों में अपनी दखल दे रही हो  लेकिन अभी भी कुदरत की इस नेमत का कोई सानी नहीं. लोग पसीने से बेहाल हैं. जहाँ कोल्ड ड्रिंक वाले चादी काट रहे हैं वही लोगों की जेब ढीली हो रही है. गंगा, घाट से साढ़े तीन किलोमीटर पीछे चली गयी है और इस बार छठ पूजा में श्रद्धालुओं को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी. जाहिर है ग्लोबल वार्मिंग से कोई शहर अछूता नहीं रहेगा." ---- कैमरामैन कामिनी के साथ सागर शेख, मग्निफिशेंट न्यूज़ , पटना.  - यही कहा था ना तुमने पहली बार पी टी सी (PTC) देते हुए ... ...

शम्म-ए-फरोज़ा

"मौज-सी पानी में इक पैदा हुई, बह गयी, जैसे इक झोंका हवा का पास से होकर निकल जाए कहीं चंद रोज़ा आरज़ुओं का चिराग़ झिलमिलाकर बुझ गया"  - सआदत हसन मंटो *****  (शादी से पहले दो मुलाकात)  - एक - राशिद :चार दिनों से सूरज नहीं निकला, रूई के फाहे में लिपटे यह दिन देखना जरूर किसी दिन अचानक ज़ख्म पर लगे पट्टी की तरह फिसल कर गिर पड़ेगा.  सुधा : और गिरेगा तो हैरान होने को जब बैठेगे तब तक पसीने वाले दिन आ जायेंगे. वक्त यूँ तेज़ी से कटा करता है, वक्त यूँ तेज़ी से कटा.... राशिद : भीड़ में तुम्हारी  पहचानी  गंध  हो जैसे. सुधा : फ़र्ज़ करो कि यह लगभग खाली खोली, कुछ सस्ती शराब की बोतलें, एक गलीज़ रजाई, तार पर टंगे दो दिनों के गीले कपडे...  राशिद : गीले कपड़ों में क्या ? सुधा : ज़ाहिर है मेरा पेटीकोट, और थोडा खुराफात सोचने के लिए तुम्हारे दोस्तों के अंडरवियर  राशिद : एक ही तार पर  ? सुधा : एक ही ग्रह पर बोलो  राशिद : और एक बड़ी मुख्तलिफ किस्म की बू, जिससे कलेजे में नफरत जगे और छोड़ कर जाया ना जाए  सुधा : हाँ ठीक.....

जलता और पकाता चूल्हा

(विंध्यवासिनी मंदिर के ऊपर एक छज्जे पर बैठे दो कबूतरों की बातचीत (एक नर, एक मादा)  ज्ञातव्य हो की दर्शन की बेला है और दोनों बातचीत में बार-बार अपने चोंच और नज़र को सीढ़ियों पर चढ़ते लोग की तरह इशारा कर रहे हैं ) एक घर होता है जहाँ तुम पैदा होकर बड़े  होते  हो. कुछ रिश्तेदारों के बीच एक और किरदार  दिखता  है जिसका आम सा संबोधन नहीं होता या घिसे हुए संबोधन होने के बावजूद वो खून का रिश्ता नहीं होता. पर उस किरदार का पूरे परिवार में और लिए जाने वालों फैसलों में पूरा दखल रहता है. तुम्हारे  पिता के बाद वे मुखिया का स्थान ले लेते हैं. तुम बड़े होने तक नहीं जान पाते कि यह आखिर हैं कौन... पहले तो सिखाया जाता है कि इस किरदार को यह पुकारो, पर जब अक्ल खुलती है फिर पड़ताल करने पर यह पता चलता है कि इसका हमारे खानदान के खून से कोई रिश्ता नहीं .. यह एक अपरिभाषित रिश्ता है, एक अनाम सा जिसे तुम बुआ, ताई, जिज्जी, काकी या फिर नाम से ही बुलाते रहे हो. यह किरदार घर की भलाई के बारे में तुम्हारे पिता (अगर जिम्मेदार हुए तो ) से कम नहीं सोचता.  ऐसा होने के कारण कई रहे हों...

कुरेदो जरा राख के वहाँ आग है क्या ?

सूत्रधार :  पहाड़ पर बिछे हुए कोयलों में सुलगने की गुंजाईश है ... जिस को बाहर से दुनिया बंजर मानती है ... ढलानों पर ज़रा ज़रा सा फिसलन होती थी उन कोयलों का ... थोडा सा फिसलता ... राख उडती और लगता जैसे सब शांत है. जो गोला अन्दर फटता रहता उसका इल्म नहीं था... और जिन्हें था वे शिक्षित और समाज में पागल करार दिए जा चुके थे. समाज यह कर के अपने दायित्व के निर्वहन से स्वयं को च्युत मान चुका था... हालांकि उसका पाठ्यक्रम बहुत बड़ा था लेकिन सुविधाओं की लिंक ने सब काम आसन कर दिया था .. हैरत यह थी इतने के बाद भी हर दिन किसी ना किसी चीज़ की डेडलाइन होती ... लोग तनाव में रहते थे नतीजा बालों का झाड़ना और रुसी का होना था... एक बड़े वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यही थी...लोग इस पर बातें करते थे...  /संगीत/ रजाई में पैर गर्म हो जाते थे. भुने हुए आलू के पराठे और उस पर हरी चटनी की सुगंध ने आँखों से बहरा और कानों से अँधा बना दिया था.. लेकिन यह सुख स्वीकार्य था और इस सुख के सब कुछ त्याज्य था... इस सुख की फेहरिस्त लम्बी थी. ईमानदारी से कहूँ तो इसकी फेहरिस्त अंतहीन थी... गैस की पाईपलाइन किचेन...

दीबाचा

जिंदगी मौत का दीबाचा (भूमिका) है, क्या अजब कि इनको पढ़कर आपको मरने का सलीका आ जाए    ----- सआदत हसन मंटो  ***** बड़े से आँगन के किनारे ढेर सारी अगरबत्तियां जल रही हैं... कुछ लोग खाना खा रहे हैं ... एक आदमी के सामने मैं बैठा हूँ... हालांकि वो खा रहा है फिर भी   जबरदस्ती उसे खाने का आग्रह कर रहा हूँ. वो हाथ लगाकर इनकार कर रहा है. मैं ताली बजाकर परोसने वाले को बुलाता हूँ. लड़का बाल्टी ले कर आया है. खाने वाला शोव्ल ओढ़ कर बैठा है.. वो नहीं खाना चाहता ...लड़के के आते ही वो पत्तल लेकर उठ पड़ा है... गीली दाल किनारे से बहने लगा है... वो आदमी अब लगभग उठ खड़ा हुआ है...   मैं उसका हाथ पकड़कर उसे उसकी जगह पर बैठने का जिरह करता हूँ... बहुत मान मनौव्वल के बाद वो बैठ जाता है. वो और खाना लेने से फिर से इनकार कर रहा है. उसका हाथ बार बार उत्तेजना में सख्त मनाही के रूप में उठता है... मैंने जिद बाँध ली है... पत्तल की   दाल अब लगभग ख़त्म हो चुकी है... टप... टप... टप ! जैसे   सईदा की पायल .. छम.. छम.. ! छम...छम... !   छिः ! मैं श्राद्ध भोज में भी कैसी बाते...

इश्तियाक *

आईने से मुझे नफरत  है  कि  उसमें असली शक्ल नज़र नहीं आती... मैंने जब कभी अपना चेहरा आईने में देखा, मुझे ऐसा लगा  कि  मेरे चेहरे पर किसी ने कलई कर दी है... लानत भेजो ऐसी वाहियात चीज़ पर... जब आईने नहीं थे, लोग ज्यादा  खूबसूरत  थे... अब आईने मौजूद हैं, मगर लोग  खूबसूरत  नहीं रहे... -----सआदत हसन मंटो  ***** [ जुहू चौपाटी पर का एक कमरा  जिसमें  चीजें बेतरतीबी से इधर उधर फैली हैं .. हरेक चीज़ इस्तेमाल की हुई लग रही है, बिस्तर पर सुजीत और श्यामा अलग अलग लेटे छत में कोई एक जगह तलाश रहे हैं जहाँ दोनों की निगाह टिक जाए और कहना ना पड़े की "मैं वहीँ रह गया हूँ " ] सुजीत :  उलझी से लटों में कई कहानियों के छल्ले हैं..... मैं एक सिगरेट हूँ और तुम्हारी साँसें मुझे सुलगाती रहती हो. मैं ख़त्म हो रहा हूँ आहिस्ता-आहिस्ता... तुम धुंआ बनकर कोहरे में समा जाती हो... किसी रहस्य की तरह...  श्यामा : तो तुम अपनी सासें कोहरे से खींचते हो ? सुजीत : हाँ ! तुम ऐसा कह सकती हो, तुम्हारे पूरे वजूद में ही गिरहें हैं...  [श्य...