Friday, November 27, 2009

???...












सांसों के फनगट में, दुनिया के जमघट में, ये कौन सा राग-विहाग है। दो है चार है, साला चमाड़ है। उमड़ता जज्बात है, उगलता आग है। कैसा पक्षपात है! उमड़ता है, घुमड़ता है, बरसता है, और तौबा फिर भी यही ग़म के बैठा है कि साला ठीक से नहीं बरसा। वरना ये कील कहां चुभता रहता! कुछो बाकी रह गया है। दिन है तो रातो होगा, दु सौ सवालो होगा। ये जो रस्ता है, पता नहीं कैसा बस्ता है, सब कुछ कूल है फिर भी शुल है, जीवन है कि भूल है। सांसा आधा अंदर है उफनता समंदर है। भुल है, भुलैया है, जिंदगी की गलियां है। वक्त का पहिया है, बेलौस बहैया है। भेड़ बनाकर हांकता है। कमीने मुंह किसका ताकता है। भगाने पर भी नहीं भागता है। क्या कोई कपड़े रखवा लिया है ! देखो तो कैसा आग है। अबे आग है कि झाग है। जिलेबी रस्ता है, मीठा है, छोटा है। इन सब को ढ़ोता है। अयाल है-ख्याल है फैला जंजाल है, बोलना बवाल है तो जीना मुहाल है, चंद सवाल है पर कितना बदहाल है ! होता भी हूं, रोता भी हूं, करता भी हूं, मरता भी हूं। आदत नहीं बनती, सांस नहीं थमती। बिचार है कि सदी के गर्म कपड़े जैसा दोपहर में यहां-वहां उतारा हुआ है ! सबके साथ दिन काटा जा सकता है। पर क्या इसे ही चाटा जा सकता है र्षोर्षो न कमर न करम सोझ है पता नहीं कितना बोझ है। सूझ है तो बूझ नहीं फेर ऐतने वाइस वरसा। दिमाग अनुमानी है। दिल अभिमानी है। खाका मिथ्याभिमानी है। बात तो वही पुरानी है। दर्द में कसम है वैसने ठसक है, न पुराना होता चमक है, मर रहा ललक है। छोटी-छोटी सांसे हैं। बीती बातें हैं। बाहर कितना धुंध है, अंदर कितना भीड़ है। साला पूरा मामला गंभीर है। ऊहा है, पोह भी, पांव पसारे मोह भी। निरा निपट है, छल है, कपट है। मार दो का शोर है, गीला काहे आंख का कोर है ! जीवन क्या है ! चूक है, भूख है ! फिर भी पूरा परिदृश्य मूक है। मन हैरान है ! कैसा विधान है, फैला सामान है, कभी तेज़ जुबान है, तो कभी चुप रहना ही ज्ञान है। कैसी तो बस्ती है, कुछ की मस्ती है, गरीबों की पस्ती है, खानापरस्ती है, जूझते लोगों की हालत खस्ती है, खुद हमारा जीवन क्या नहीं सस्ती है। चोट हरा है अभी मुंह झांपे पड़ा है। दायरा कितना सिमटा है, चुनाव है कि चिमटा है। शाम का बेरा है, मदिरा का फेरा है। उलझन कितना घेरा है! वही सवेरा है। कैसी बीमारी है, न मरने की तैयारी है, मन क्यों भारी है, अवसाद तारी है, जांच करवाओ क्या महामारी है ! उलझनों से जीना है, चक मारता सीना है, मुंह बाए आगे कई महीना है, बदन में कहां ज़ीना है ! माथे पर पसीना है, छुपा हुआ नगीना है। खेत से किसी ने गाय को हड़का दिया है। सागर-ओ-मीना पीकर लुढ़का दिया है।

Wednesday, September 30, 2009

Say-ओए-होए, होह-होए











1 बाहर/दिन/यूनिवर्सिटी का मैदान

कलाई पूरी तरह से घुमती है। घुटने को नीचे झुकाकर बल्लेबाज बाहर जाती हुई गेंद को स्वाक्यर कट लगाता है। विकेटकीपर सूने ग्ल्बस् को अपनी पेट की ओर खींचता है। दोनों पैर हवा में हैं और निगाहें घास पर फिसलती गेंद पर जो सीमा रेखा के बाहर जा रही है - चार रन।

इस तरह, बल्ले का संपर्क छूटते ही गेंद मैदान पकड़ती और एक पर एक क्लासिकल किताबी चौका लगता जाता। `अमित का ऑफ साइड बहुत मजबूत है` अहाते से सनग्लासेज लगाए आती-जाती लड़कियां मुस्कान फेंकती है और मुलायम ताली बजाती हैं जिससे ताली की आवाज नहीं आती लेकिन वो उत्साहवर्धन और `बेटा तू लिस्ट में है` का भ्रम देती है। प्रत्युत्तर में बल्लेबाज भी पसीना पोंछने के बहाने हेलमेट उतारता है और मुस्कान बिखेरता है। मैदान के सारे क्षेत्ररक्षक पलटकर गैलरी की तरफ देखते हैं और ओवरकांफिडेट होकर अपना कॉलर चढ़ाते हुए अगली गेंद पर जान की जानी लगा देने वाली फििल्डंग का जज्बा लिए बल्लेबाज की तरफ बढ़ते हैं। उधर गेंदबाज़ अजीत अगरकर की तरह अगली गेंद फेंकने के लिए अपनी सांसें बटोर रहा है। बल्लेबाज फिर हेलमेट लगाता है, बल्ला हवा में घुमाता है फिर ज़मीन पर ठोंकता है। गेंदबाज गोली की रफ्तार सा अम्पायर के पास से गुज़र...

कट टू :
2 बाहर/दिन/यूनिवर्सिटी का मैदान

कैमरा कॉलेज के प्रवेश द्वारा पर के जंग लगे साइनबोर्ड को दिखाता हुआ ढ़लते सूरज को फ्रेम में लेता हुआ नीचे आता है जहां सूर्य की किरणें सीधे ज़मीन पर नहीं आ रहीं। सूरज की लाल-पीली रोशनी छितरा रही है। और उसे रोक रहे हैं जींस-कुरते में घुसते हुए कुछ छात्र जिनके हाथों में हॉकी स्टिक हैं। शोर-शराबे के साथ गालियां देते हुए वो अंदर आते हैं। वो उस प्रोफेसर का समर्थन कर रहे हैं जिन्हें कल कॉलेज से निकाला जा रहा है। उन छात्रों में वो लड़का भी है जिस पर निहायत ही पढ़ाकू होने का मुहर भी लगा है।

कट टू :
3 बाहर/दिन/यूनिवर्सिटी का मैदान

कैमरा फिर 180 डिग्री घुमता हुआ जमीन से गर्द उठता दिखाता है। कुछ मोटरसाइकल सवार तेज़ गति से आते हुए अपनी बाइक बीच पिच पर रोकते हैं। ब्रेक की खतरनाक आवा़जें आती हैं। सभी खिलाड़ी सहमते हैं। पहले गाली-गलौज और फिर मार-पीट होती है। जिस कोच के देखरेख में खेल हो रहा है उसकी लक्षित पिटाई भी होती है। मामला प्रिंसीपल रूम तक जाता है। कॉलेज प्रशासन स्थिति गंभीर भांप कर फोन घुमाता है।

कट टू :
4 बाहर/दिन/यूनिवर्सिटी का मैदान

एक के बाद एक पुलिस की कई गाड़ियां सायरन बजाती कैम्पस में दाखिल होती है। छात्रों और पुलिस में घमासान मच जाता है। हवा में कई हाथ उठते हैं जो तोड़ दिए जाते हैं। पिच की दरार खून से भर जाती है और अचानक स्पीनरर्स से तेज गति के गेंदबाज लायक बनती जाती है...

कट टू :
5 अंदर/दिन/यूनिवर्सिटी-कांफ्रेंस रूम
(कांफ्रेस रूम का लांग शॉट)

वाइस प्रिंसिपल : आप पर आरोप है कि आपने कक्षा में कुछ ऐसी बातें बताई जो पाठ्यक्रम में नहीं है, जिससे अनुशासन हनन होता है एवं राज्य की राजनीति प्रभावित होती है। आप इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि इस राज्य में पहले से ही प्रजातंत्र है फिर ऐसी बातें पढ़ाने का क्या औचित्य है?

(प्रोफेसर के चेहरे का क्लोज शॉट वो दार्शनिक बने हुए हॉल का आकाश देख रहा है)

कट टू :
/फ्लैशबैक/

6 अंदर/दिन/स्कूल ...

सटाक्!

(कच्चे हरे बांस लचकती हुई बेहद पतली छड़ी एक के बाद उसके पैर पर बरसती है और निशान छोड़ते हुए उठती है)

आग लगाएगा ?

सटाक्...

(क्लासरूम में सन्नाटा)

हरामजादे... भड़काएगा?

सटाक्...

(सभी विद्यार्थी अवाक्)

बोल... (मारता है) बोल ना (मारता है) (फिर मारता है)

लड़का तमतमा जाता है, झुक कर पैरों पर लगे चोट को सहलना चाहता है। उस का विश्वास है कि अगर वह एक बार उस चोट खाए हुए जगह को सहला लेगा तो उसका दर्द कम हो जाएगा और वह मास्टर की ज्यादा छड़िया खा सकेगा।

सटाक्...

/फ्लैशबैक खत्म/

प्रोफेसर एक नज़र छात्रों को देखकर हड़बड़ा कर निकल जाता है।

कट टू :
7 अंदर /रात/चलती ट्रेन का दृश्य

(प्रोफेसर अपनी डायरी लिख रहा है)

``बरसों से यह प्रोफेसर आग लगा रहा है कई चीज़ों के खिलाफ। कॉलेज भी सोच रहा होगा कि मेरे जाते ही मामला ठंडा पड़ जाएगा पर नहीं विरासत ऐसे ही छोड़ी जाती है। विद्यार्थियों को एक संबल को मिल ही गया जो आगे जीवन में काम आएगा। यह आग धूप में जलती दियासलाई जैसी जरूर है जो बुझने का भ्रम देती है लेकिन जलती रहती है....``

Thursday, September 10, 2009

सायलेंस..... एक्शन



"ऐसा क्यों होता है कि कभी मन कुछ नहीं करने का करता है, जिस चीज़ का इंतज़ार बरसों के करते रहते है वो मिल जाने पर उतनी ख़ुशी नहीं रहती?.. ऐसा क्यों होता है की कभी- कभी हर चीज़ से उब जाते है हम... बेवज़ह की थकन क्यों रहती है... मन बहलाने घर से निकलो तो क्यों सर दर्द वापस लिए लौटते हैं... क्यों ऐसा होता है की कोई कितना भी उकसाए उठकर चलने का हौसला नहीं होता... क्यों लगता है कभी-कभी की जो है वो बीता जा रहा है और उसका मुझे कोई मलाल नहीं है,"
... अंजू यह दार्शनिकता भरी बात शून्य में निर्विकार, अपलक देखते कहती है... "तुमने कभी किसी को बर्बाद होते देखा है ? मैं खामोश हूँ...

"जानते हो! मैं जिंदगी में अच्छा कर सकती थी पर एक मोड़ पर मैंने ऐसा महसूस किया जितना बेहतर मैं बर्बाद हो सकती हूँ शायद बन नहीं सकती... तुम जिंदगी के ऐसे ही मोड़ पर मिले; जहाँ मैंने तुम्हारा साथ सिर्फ इसलिए पड़का क्योंकि तुम बिछड़ने वालों के कतार में सबसे अव्वल नज़र आते हो..."

" बह जाने दो ना यह दुनिया, भाड़ में जाए, एक पल में यह झंझट ख़तम... जिसे यह इत्मीनान हो, जो अपने सारे चीजों से संतोष कर ले, फिर भी बेबस ना हो इस स्थिति को को क्या कहते हैं सागर ? कभी समझा है की इस छोटे से गुल्लक को जितनी जतन से धीरे-धीरे हम भरते हैं, कभी कितना विच्छिन्न होकर तोड़ देते हैं..."

कंधे पर सर रख्खे अंजू मुझसे कहती है... बाल, तेल से तर हैं... और मालिश के बाइस मांग का पता नहीं चल रहा... कॉटन के कुरते की ३ बटन खुली हुई है. सुनहला रंग का लोकेट जो पानी से मुसलसल भीगने के बाइस धूसर हो चली है गले में कुरते के बाहर झूल रही है... यदा-कदा अपना सर उठा कर फिर से वो सर मेरे कंधे पर रख देती है, इससे लोकेट के झूलने की रफ्तार बढ़ जाती है, जिसमें मेरे बचपन का फोटो लगा है, जो मुझे उस वक़्त झूला झूलने का आभाष देता है... जिसके सहारे मैं वहां से सरकता हुआ अपने बचपन में चला जाता हूँ... अकेले झूला झूलने वाले दिनों में... ... वो बात का रुख पलटती है... या शायद जोड़ती है ...
"बचपन में, नहीं बचपन में नहीं आज तक... जब में पानी में अपनी बनायीं हुई जहाज़ डालती हूँ तो वो ज्यादा देर नहीं तैर पाता... उसकी बुनियाद में कोई खोट है मुझे ऐसा नहीं लगता लेकिन वो पलट जाती है... तुम्हें पाता नहीं है अपने जहाज़ को संतोष से डूबता देखने सा सुख... उस वक़्त लगता है जैसे यह जहाज सिर्फ एक लाश हो और मेरे बदन को ढो कर ले जा रहा हो... और में पूरे होशो-हवास में ऐसा होने देर रही हूँ... शायद उस पार कोई ठौर हो जो शाश्वत हो... "

झूले की गति धीरे-धीरे मंद पड़ती जा रही है, लेकिन वो अपने पूरे रौ में बहे जा रही है... उसके बालों में लगा तेल मेरे कुरते को दागदार कर चुका है... साथ ही एक अदृश्य लेकिन सूनी पगडण्डी पर अनुसाशित आंसू निर्विकार बहे जा रहे हैं जहाँ न कोई आवेग है, ना किसी बात की खीझ, किसी बात का ग़म नहीं... मेरा सीना उस तेल से दागदार हो गया है, साथ ही, उसके आंसू मिलकर एक जुदा सी महक बिखेर रही है... वह उस वक़्त वैसे ही बोल रही है जैसे किसी महात्मा को बरसों की तपस्या के बाद ज्ञान की प्राप्ति हो गयी हो... या फिर उस प्रेमी की तरह जिसे यह अहसास हो गया हो कि मैं इस लड़की के साथ ज़ुल्म कर रहा हूँ, यह मेरे बिना ज्यादा खुश रहेगी... इसकी दुनिया कहीं और है लेकिन बस किसी वादे को पूरा करने के लिए यह मेरे साथ बनी हुई है...

सूरज अपना सोना पिघलाकर अँधेरे कि ओट में जा चुका है... वो सिमट कर मेरे और करीब आना चाहती है... लेकिन मेरा शरीर बीच में आड़े जाता है... वो कहती है-

"मैं एक आत्मा हूँ, तुम भी बन जाओ; मैं तुमसे आज तक नहीं मिली... पर मिलना चाहती हूँ... तुमसे... तुमसे... सागर, तुम समझते हो ना तुमसे मिलने का अर्थ क्या हो सकता है... चलो वहां मिलते है आज रात जहाँ शरीर बाधक नहीं बनता हो...

मैं उसके सर पर हौले से थपकियाँ देता हूँ वह मेरे कंधे से सर उठाती है फिर बुरी तरह से फट पड़ती है... नारियल के पत्ते जो बराबर दूरी पर जो ब्लेड से कतरे हुए लगते हैं.. उनसे चाँद झांक रहा है... एक शीतल पवन छू कर गुज़रती है... वो पत्तों का झुंड एक साथ टकराता है... बारिश जैसी आवाज़ आती है उससे... मेरा पसीना टपकता है... उजले बादल आकाश के एक कोने से उठने लगते हैं... मैं सोच रहा हूँ...

... उफ़! कितना कुछ घटता रहता है एक साथ... सायलेंस... एक्शन!

Monday, August 24, 2009

डायरेक्टरर्स कट







/सीन-१/ सुनेहरा मौसम/दिन
ब्लैक एंड व्हाइट शेड में आपकी गर्लफ्रेंड फरों वाला ओवरकोट पहने हुए है... गले में स्कार्फ, और घुटनों तक का बूट, उसके हाथ में आपके उधार के पैसों के लिया ऑर्किड का गुलदस्ता है.. क्योंकि उसे पसंद है... वो चार महीने बाद आपसे मिलने स्टेशन पर आ रही है... सिर्फ २० मिनट का वक़्त है, उस ट्रेन के उस स्टेशन विशेष पर रुकने का...

आपने कई रातें जग कर, हर भावना में डूब कर, कभी पहाड़ पर, तो कभी साहिल पर बैठकर, कभी जगती आँखों से कोई सपना देखते हुए उसे हर मूड में कई लव लेटर्स लिक्खे हैं... इसमें से कई मीर के शेर है तो कुछ चुराए हुए दोस्तों के मोबाइल से फॉरवर्ड किया हुआ एस. एम. एस., अगर गर्लफ्रेंड कुछ ज्यादा हाई-टेक है तो आर्चीज़ के दूकान के शाम के रंगीन साये में एक दुसरे पर झुकते कपल्स के धुंधले चेहरे के बैकग्रऔंद में कुछ अंग्रेजी कोटेशन्स, आप चेप देते हैं... क्योंकि आपने तो सिर्फ प्यार किया! ऐसे उच्च ख्याल कहाँ आये आपने दिमाग में?

... हाँ कॉपीराइट आप ज़रूर लेते है, वाजिब भी है अपना पढाई छोड़ कर, अपना काम छोड़ कर, बायोलोजी के प्रैक्टिकल एक्साम के ज्यादा फीस बताकर आपने अपने पिता जी बहुत से पैसे निकलवाए हैं... और उनके लिए चोकलेट्स हर फ्लेवेर्स के लिए हैं...

आपके लिख्खे हुए में कुछ रूमानी ख्याल लिए हुए हैं जिसका जवाब आप उससे इस मूड में इंतज़ार कर रहे हों की वो तकिये को अपने सीने के नीचे लगा कर पांव हवा में लहराते हुए लिख्खेगी... और वो चिट्ठी आपकी वसीयत बन जायेगी... आपने शायद उसे लेमिनेट करवाने का भी सोचा हो...

... और आप यह सब आँखों में आंसू भर कर अपनी प्रेयसी को देते हैं... वो मुस्कुराते हुए ले लेती है... कुछ इस अदा से की उसने एहसान किया और आपका जीवन धन्य हुआ... वो लेकर खुश है और आप उन सहेजे हुए चीजों को मकाम तक पंहुचा कर...

/सीन-२/ सुनेहरा मौसम/दिन/

... शिकायतों का सिलसिला आप शुरू करते हैं, क्योंकि कहने को आपके पास इतने लेटर्स के बाद भी बहुत कुछ है... ''तुम फ़ोन नहीं करती हो, सिर्फ सन्डे को रात में ४ घंटे ही बात करती हो (बिल आपका होता है) मुझे टाइम नहीं देती हो, उस सी. डी. को सुना था जो मैंने खास जगजीत सिंह और सोनू निगम का लिमिटेड कलेक्शन तुम्हारे लिए मंगवाया था ?" ...

... अच्छा अब एम. बी. ए. करने क्या बंगलौर जाओगी ? पहले ही दिल्ली जा कर दूर हो गयी हो.

ट्रेन सिटी मारती है, आपका रुदन और बढ़ जाता है...

आप थोडा बड़े परिपेक्ष्य में देखा शुरू करते है... अच्छा, अपना ख्याल रखना, (आप इस वक़्त उसके परिवार के रिश्तेदार बन जाते हैं... शायद माँ-बाप) इसी बीच आपको ख्याल आता है- अरे ! रोमेंटिक बात करने का टाइम तो मिला ही नहीं. (जाते वक़्त उसे अपना जताना नहीं भूलते... ) कभी मेहदी से अपने हाथों पर मेरा नाम भी लिख लिया करो, इन गुलाबी होठों का ख्याल रखना... अब आप अपना अंतिम दांव मारते हैं... (अपना मेक्सिम्म) "अपना ख्याल रखना यानि मेरा ख्याल रखना... "

और ट्रेन चल पड़ती है... छुक- छुक, छुक - छुक ...

वक़्त आपके दिल में रुक जाता है, आप बहिन के शादी वाले भाई के तरह कर्तव्यनिष्ठ हो जाये हैं.. आपको त्याग, प्रेम से बड़ा लगने लगता है, वो खिड़की से बाहर अपना हाथ निकालती है, आप उसे चूमना चाहते है लेकिन १०० बंधने हैं... लोग देख रहे है से लेकर मर्यादा हनन तक के विचार आते है...

आप दौड़ कर थोडा आगे तक जाते है और अपने शर्ट से चाँदी की पायल निकाल कर उसे थमाते है... वो मुस्कुराती है... आप आँखें बंद कर उसके चहरे को अपने दिल के फ्रेम में बंद कर लेते हैं... वक़्त रुक जाता है...

(शोर्ट फ्रीज़ हो जाता है)

Monday, August 10, 2009

ओवर आल वी वर्क फॉर हियुमिनिटी एंड व्हेन...

वो ७५ डिग्री की एंगल लिए लैपटॉप पर काम कर रही है... टांग पे टांग चढा कर बैठी है... बाल शैंपू किये हुए है और शहराना अंदाज़ में खुले हैं... जो दोनों रुखसारों को ढके हुए हैं... साथियों को बस बीच में उनकी नाक ही नज़र आती है... बालों को बीच-बीच में दिलफरेब झटका सा दे देती है... और मेरे पुरुष साथी निढाल हो जाते है...

हाँ-हाँ नीचे से जींस, एक हाथ कटी हुई है... कैपरी कहते है शायद उसको... एक शोर्ट सा कुरता पहना है... कोई उत्तेजित करता सा इत्र लगा रखा है... उसने कभी बासी खाना नहीं खाया है, यह बात उसकी स्किन बोल रही है, पजेरो में बैठा ड्राईवर कुत्ते की तरेह चौकन्नी नींद सो रहा है... और वो लैपटॉप पर काम कर रही है...

वो जब भी किसी की तरफ नज़र उठाती है, आँखों पर का स्क्वायर चश्मा चमक उठता है, ...फर्राटेदार, चमकदार अंग्रजी बोलती है... एक प्रेशर सा बनाती है अपने साथियों पर... सबसे पहले और सबसे ज्यादा बोलती है... वो चाहती है उसके मुंह से कमांड छुटते ही वो काम हो जाये, किसी चीज़ की फरमाइश करते ही उसके नाक पर ठोक दी जाये... वो पशेंसलेस है... वो योजनाएं बनाती है, यू एन में काम करती है,

वो शक्लें देखकर मुस्कुराती है... वो ए. सी. गाड़ियों से नीचे नहीं उतरती... वो स्लम के बच्चों के लिए डिजाईन डोक्युमेंट तैयार करती है... उनके कुपोषण पर चर्चा करती है...उसने गरीबी पर रिसर्च किया है... वो जानती है कितने डॉलर का फलाना प्रोजेक्ट होगा... और उसके लिए फंड कैसे आता है... लम्बे से टेबल पर बिसलेरी की बोतलों के बीच... वो मुद्दों की बात करने वालों को इंग्लिश में डांट देती है... यह डांट घंटे भर चलती है... मुझे अंग्रेजी नहीं आती... वो मानसिक रूप से उसे तोड़ देती है... वो सभी एक ऐसी जमात में शामिल है... जो मानवता के लिए काम करते हैं... और वो लैपटॉप पर काम कर रही है...

वो बेवक्त थैंक्यू, वेलकम और ग्रेट बोलती है... और इस बीच में सॉरी बोल देती है... वो किसी की बात नहीं मानती है फिर भी थैंक्यू बोल देती है... ७५ डिग्री की एंगल लिए लैपटॉप पर काम कर रही है... वो उनके लिए रेडियो प्रोग्राम बनाना चाह रही है... बजट लाखों का है, वो कभी स्लम नहीं गयी... वो कई सेमीनार में कुपोषण की स्पेसिलिस्ट है... दर्ज़नों संस्थाओं में एड्वैज़र है... प्रोग्राम में वो ह्यूमन एंगल नहीं समझती है... हम बच्चों के लिए प्रोग्राम बना रहे है या उनके लिए मैं नहीं समझ पा रहा हूँ... एक गुस्से भरी उमस के साथ मैं उसे देखता हूँ... वो अपनी कातिल हंसी सबके चेहरे पर चस्पा देती है... बड़े साहब कहते है उसकी सेक्स अपील कमाल की है...

वो मानवता की सेवा करती है... शायद डॉलर में कमाती है... सबको नाम से पुकारती है... बड़े युनिवेर्सिटी से पढ़ कर आई है... उसके पास ढेरों आईडियाज़ है... पैसे उगाहने के... मैं सोचता हूँ दुनिया में जब तक यह कुपोषण, एच आई वी, गरीबी है, इनकी दूकान हरी रहेगी... मुझे इतिहास का चरित्र याद आता है " कहीं की राजकुमारी थी उसके मुल्क में आकाल आया हुआ था और वो जनता को केक खाने की सलाह दे रही थी" अभी प्रोग्राम शुरू भी नहीं हुआ है और ७० लाख खर्च हो चुके है... वो अपने लैपटॉप पर बाजरे वाले चार्ट में पीला रंग भर रही है, होठों पर वोही सेक्स अपील है... और मेरे साथी रात के ११ बजे भी नहीं थके...

मुझे कल जल्दी आना है, मैं घर जाने की बात कहता हूँ... वो प्लेट से सेब का एक टुकड़ा मुंह में रख कर चबाते हुए कहती है "यू नो आवर शेड्यूल इज वैरी हेकटिक" आफ़्टर आल वी वर्क फॉर हियुमिनिटी एंड व्हेन यू सर्व.... आगे की अंग्रजी मेरे पल्ले नहीं पड़ती...

Wednesday, July 29, 2009

अथ स्वागतम


अपनी डफली... सबका राग!

जर्नालिस्म में एक चीज़ पढ़ा था कि सूचना का पुनरूत्पादन होता है... मनोरंजन का भी गोया यही हाल है. हर चीज़ कहीं न कहीं पढ़ी लगती है, किसी न किसी सन्दर्भ से जुडी लगती है... ताक-झांक करने की मेरी पुरानी आदत है और आदतन हम अपनी डफली के बहाने गैरों के राग सुनाने बैठ गया...

'धुरंधरों के सामने इस ब्लॉग का कोई औचित्य नहीं है... यह बस उस गाने की तरह है- अ ने कहा ब्लॉग बनाइम, त बी न भी कहा ब्लॉग बनायेम... त हमहूँ कही हमहूँ ब्लॉग बनायेम... ब्लॉग बनायेंगे और छा जायेंगे...

तो अब जब भी टेम मिलेगा अपन अपना हारमोनिया लेकर शुरू हो जायेगा...

'दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए... मुहब्बत भरी एक नज़र चाहिए...

'सच्ची साहिब हमको मुहब्बत भरी आपकी एक नज़र चाहिए'

सलाम!

Friends

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