Saturday, August 31, 2013

नेकलाइन- एक

भीड़ में सहसा मुझे देख उसकी आंखें महकीं। चश्मा जोकि थोड़ा ढ़लक आया था सो उसने चार आंखों से मुझे देखा। मेरी निगाहें लगातार उस पर थी। नेकलाइन पर बल पड़े और वो आधी इंच नीचे धंस आई। चश्मे वालों के साथा थोड़ी दिक्कत ये होती है कि उसके शीशे पर अगर लाईट पड़ती है तो शीशे पर रोशनी की एक शतरंजी खाना नज़र आता है फिर एक पल को यह संदेह उपजता है कि उसने मुझे देखा या नहीं। और इसी दरम्यान अगर हम नहीं चाहते कि वो हमें देखे तो हम किसी दीवार के आड़े आ सकते हैं, नीचे झुक सकते हैं, पीछे मुड़ सकते हैं। 

आंखें किसी को कैसे चीन्हती है। पहले स्वाभाविता में नज़र पड़ती है फिर सहज ही गर्दन इधर उधर घूम जाती है लेकिन उस पहचाने की आंख हमारे स्मृतियों में सहसा धंस आती है और तंग करने लगती है। संबंधों में एक लाख शिकायत के बाद भी पहली प्रतिक्रिया मुस्कुराहट की ही होती है। वो स्केलेटर से चढ़ रही थी और मैंने सीढि़यां ली थी। ऊपर प्लेटफार्म पर हाॅर्न बजाती मेट्रो आने या जाने का संकेत दे रहा था। अमूमन सभी मानकर चलते हैं कि गाड़ी अब लगने वाली होगी, सो सबके कदमों की रफ्तार बढ़ जाती है। एक दूसरे को पहचानने की क्रिया को हमने भैंस को दिए गए रोटी की तरह निगल लिया गो कि मेट्रो में किसी स्टील राॅड को पकड़कर धीमे धीमे झूलते हुए अतीत में आए उस किरादार संबंधी याद की जुगाली करेंगे। 

मगर हुआ कुछ ऐसा कि हमने साथ ही गाड़ी ली। मैंने दूसरा डिब्बा लिया, उसने तीसरा। पहली कोच महिलाओं के लिए रिज्वर्ड है सो जो जल्दी में किसी और कोच में चढ़ते हैं वे गाड़ी चल पड़ने के बाद अंदर ही अंदर पहली कोच तक आती हैं। वो आ ही रही थी कि मैं दो कोच के भीतरी जंक्शन (क्योंकि वहां सबसे अच्छी हवा लगती है, रबड़ की सतह होती है) पर वही जुगाली कर रहा था कि उसकी आंखें फिर से मुझे खोजते हुए वहां से आगे बढ़ रही थी। मैंने छुपना चाहा। मगर एक सफल कोशिश के बाद दूसरे प्रयास में पकड़ा गया। पहचान की आंखें मकड़ी की तरह फंदा डालती हैं। रिश्तों की तरह उससे भी आज़ाद होने में समय लगता है। 

वो अब भी उतनी ही भरी पूरी थी। नहीं पहले से शायद कम हो गई थी। हाथ में वही पूरे हथेली को भरता सैमसंग गैलेक्सी चार है। हल्के आसमानी रंग की फिसलती शर्ट और काली जींस। उन दोनों को अलग करता लाल बेल्ट जो अब धूसर हो चली थी और जो उठते बैठते कई लोगों को यकायक निकर का सा भ्रम देती होगी। चेहरे पर हल्की सी जम आई नमी, आंखों में सुब्ह का लगाया फैल आया काज़ल। हां हाथों की चूडि़यां अब शादी के डेढ़ बरस बाद कम हो आई थी। 

 ......(ज़ारी)

Friday, August 30, 2013

......

उसके होने का गंध उसके नाभि से फूटती है लेकिन शब्द कहां से फूटते हैं? यूं ही विशाल पुस्तक मेले में अनजाने से बुक स्टाल पर बाएं से आठवीं शेल्फ में अमुक किताब का होना कि जहां दुकानदार भी नहीं उम्मीद करता हो कि पाठक यहां देखेगा सो वहां किताबों का सा भ्रम देता कुछ भी रख दो। 

स्टाल पर कोने में ग्रे कालीन पर उन शब्दों से गुज़रते हुए जाने क्यों लगता रहा कि उसके लिखे जाने से पहले वे शब्द हमारे ज़हन में महफूज थे और किसी ने सेंध मार कर यह निकाली है। पढ़ना कई बार वही सुहाता जो हम पहले से जान रहे होते हैं।

यह सोचना भी बहुत सुखद लगता कि हमारे शब्द साझे हैं। दिमाग से सरसरा कर फिसलते हुए उनकी उंगलियों के बीच फंसे कलम से कैसे किसी काग़ज़ पर वे आकार लेते होंगे? क्या 'द' वैसा ही होता होगा जैसा उनके दिमाग में उपजा था, या कि उनकी उंगलियों ने उसे सफहे पर रोपते हुए कोई कलाकारी कर डाली थी। उनका लिखा 'ज' भी आह कितना आत्मीय! पहचाने से शब्द जिन्हें बीच के बरस में कहीं भूल आए थे और उस भूलने की याद भर आती रही। यों ही अनायास वो पढ़ना छोड़ उन उंगलियों का ख्याल करने लगता हूं जो सर्फ से धोए जाने के बाद हल्की हल्की रूखी लगती है। 

क्या उनका लिखना भी संगीत संयोजन के नियमों में बंधा है। क्या वे भी हर शब्द तीन ताल पर गिन कर, कभी कोई मीटर पकड़ कर लिखते हैं? 

अच्छा है कि कई सवालों के जवाब नहीं सो उनके व्यक्तित्व के प्रेम में पागल मुझ जैसी प्रेमिका रंगमंच पर गोल गोल बेसुध घूमती नज़र आती है।

अपार किताबों में भी वर्णमाला के खांचे में ही बंधी हर रचना मगर कैसे चीन्ह लेता है हमारा हृदय उन्हीं में से कुछ खास शब्दों को। क्यों लगता ऐसा कि वे जो अक्षर लिखते तो हमारे दिल पर नर्म नर्म रूई के फाहे गिरते। क्यों लगता ऐसा कि किसी कोई आदमी न सही तो राह चलते किसी जानवर के ही गले लगते फफक पड़ने की संतुष्टि मिलती? क्यों लगता ऐसा कि हमारे बीच की दूरी को भी हज़ार मील की दूरी और अनियमित कालखंड के फासले भी पट जाते? क्यों लगता ऐसा कि वे गर सामने ही होते तो अपनी धड़कन संयत कर उनकी हथेली बड़े इत्मीनान से अपने उभारों पर रख लेती ?

शब्दों की हल्की हल्की ऊष्मा, अक्षरों के आंच, वाक्यों में छुपी अदरकी स्वाद। मां ने जो कभी रूला रूला कर, गर्दन गिलास में गोत कर जबरन पिलाया, क्यों आज उसी का स्वाद जिह्वा पर छाया?

Thursday, August 8, 2013

फेसबुक स्टेट्स !


लड़की ने अपना फेक फेसबुक अकाउंट खोला। सर्चबार में आर लिखा और दूसरे विकल्प को सेलेक्ट किया। ‘इसके सिर्फ टैग की हुई तस्वीरें और अपडेट्स दिखते हैं और लंबे अरसे से इसने किसी को टैग नहीं किया है’
फिलहाल वह स्क्राॅल डाऊन करके ‘शो ओल्डर स्टोरीज़’ में जाकर उसके पुराने स्टेटस देख रही है।

अंर्तजाल पर यूं तो अरबों शब्द छींटे हुए हैं। जिनमें से हज़ार शब्द उसके भी हैं।

पुराने स्टेट्स पर भी सरसरी निगाह डालते हुए उसमें जहां कहीं उसका अपना नाम दिखता  - आह! कितना सुखद अतीत!! मुझे ज़हन में रखकर लिखी गई महबूब की ये पंक्तियां। नियान लाईट की रोशनी लिए उन आंखों में क्षण भर के लिए एक सौ अस्सी वाॅट की चमक आ जाती है।

और ये स्टेट्स उस शाम की है जब थोड़ी देर को सोकर उठी ही थी। सर में तेज़ दर्द था और दिल कर रहा था कि इस सूने घर में किसी को आवाज़ देकर कहूं - दीदी अदरक वाली चाय बना दो। कि तभी फोन की घंटी बजी। दिल ने जैसे धड़कना शुरू कर दिया। तकिए को हटाया तो लगा जैसे वो तकिए के नीचे ही आवाज़ लगा रहा था। फोन का रिंग भी जैसे मेरा ही नाम पुकार रही हो। स्क्रीन पर उसका नाम चमक रहा था। एन काॅलिंग..... के बाद तीन डाॅट्स जैसे बिना फोन उठाए ही जैसे इस बेचैनी को बयां कर रहे थे। काश इंतज़ार के उन बेचैन लम्हों की फोटोकाॅपी रख रखा जा सकता!

उन दिनों कितना घुमा फिरा कर ये स्टेट्स लिखा करता था! उसी शाम उसने पूछा था - क्या पहनी हो? मैंने हंस कर कहा था - गाऊन।
- उतार कर मुझे पहना दो।
- अच्छा ?
- हां, और उसके नीचे?
- चप्पल। वो भी पहना दूं।

दो जोड़े कान और होठों के दरम्यान दीर्घ हंसी देर तक गूंजती रही थी।

खुले में जैसे पुराना किला हो। इन बारिशों में पत्थरों ने हरे गाऊन डाल लिए हैं। इन्हें छूता हूं तो ये मेरा स्पर्श महसूस करती हैं। प्रेम में अमूर्त चीज़ें भी मूर्त हो जाती हैं। यादें जाफना के जंगल जैसी हैं और यहां से तुम्हें उल्टे उंगलियों से छू रहा था। तुम सांस लेने लगी हो।

इस शाम लड़की के सर का दर्द फिर तारी है। अदरकी चाय देने वाली दीदी तो आज भी नहीं है और न जिलाने वाले स्टेट्स ही।

Monday, August 5, 2013

A thousand things to forget....


जनाब एक मिनट अपना कीमती समय दीजिए। रूकिए एक मिनट! आपने अपने व्यवहार से तो अपनी बात कह दी। मैं ज़रा अपने मुंह से अपनी बात कहना चाहूंगा। मैं जानता हूं कि मुझे इसके लिए आपके अनुमति की जरूरत नहीं है। क्योंकि अगर आप नहीं सुनेंगे तो भी मैं अपनी बात कहूंगा। किसी से भी कह लूंगा। रसोई की दीवार से, अरूणेश के छज्जे से, कमरे के बाहर लटकती टाट के परदे से और गर महसूस हुआ कि गुसलखाने का सड़ रहा पयताना ही यदि मेरी बात सुनने में इच्छुक है तो मैं उससे ही कह लूंगा।

मैं जानता हूं कि मेरी बातों से धुंआ नहीं उठता। यह एक ठंडी बुझी चुकी राख की मानिंद है जिसमें अब कोई चिंगारी नहीं। आप धीरज रखें मैं आपको यह आश्वस्त करना चाहता हूं कि यह कोई बवेला नहीं मचाएगी। मैं जानता हूं कि आपकी जिंदगी फेसबुक की तरह है जहां फलाने कहे को भी लाइक करना और चिलाने के उद्गार पर भी कमेंट करना है। क्षणभर में कहीं प्रशंसा भी करनी और तत्क्षण ही किसी दूसरे स्टेटस पर अफसोसजनक भी लिखना है और बढ़ जाना है।

अपनी रीत और बीच चुके जीवन के आधार पर मैं यह चाहूंगा कि मेरा कहा आपका मनोरंजन नहीं करे। क्योंकि मैंने पाया है कि मैं मनोरंजन दे सकने के लायक ही नहीं हूं। मैंने बड़ी कठिनाई अपनी दुम का दबाया है साहब। रोज़ मुझे सिर्फ अपनी जगह खड़े हो जाने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी है। आलम यह है कि अब मैं आगे बढ़ जाने के सपने नहीं देखता। आप देख सकते हैं (जिसके लिए आपकी पारखी नज़र को चंद सेकेंड की जरूरत होगी) कि मैं एक बेहद आम आदमी हूं। भिखमंगे खानदान में लावारिस की तरह पला बढ़ा। आपको आपके मां बाप पालते होंगे मुझे तो पेड़ों, आसमानों, हवाओं और पानी से मिलकर पाला है।

मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि एक वक्त था जब मैंने भूख पर विजय प्राप्त कर ली थी। मेरे और भूख में कोई मसले नहीं बचे थे। मैं दिन रात सीधा सीधा उससे मुठभेड़ करता था। मैं किसी बाउंड्री पर उसकी छड़ पकड़ कर रातों को सोता और जागता था। जब नींद आ ही जाती तो छड़ से हाथ न छूट जाए इसलिए अपनी कोहनी और अपना घुटना उसमें फंसा देता। हर जगह मैंने जुगाड़ तलाशे हैं। आप न जाने क्यों पहाड़ों पर के बाबाओं की इज्जत सिर्फ इसलिए करते हैं जिन्होंने तपस्या से भूख पर जीत पाई है।

लेकिन आज समय दूसरा है। सो मैं भी दूसरा हूं। बड़ी साधारण सी पंक्ति है लेकिन फिर भी इसे लिखते हुए अथाह पीड़ा महसूस कर रहा हूं कि अब मुझसे भूख बर्दाश्त नहीं होती। आपको किसी भी प्रकार से इस पंक्ति में कोई चमत्कार नहीं लग रहा होगा लेकिन आप ज़रा अपना बहुत सारा ज्ञान, संगीत की कतरनें, दृश्य-श्रव्य माध्यमों से अर्जित अनुभूतियां, किताबों के शब्द थोड़ी देर के लिए अपने सिलबट्टे जैसी पीठ पर से उतार दें। माफ करें मैंने थोड़ी अनैतिकतावश आपकी नंगी पीठ देख ली है और पाया कि उस पर अब किसी ऐसे आदमी की जरूरत है जो छेनी से आपकी पीठ तो हरा, ताज़ा कर दे।

नहीं मैंने कतई नहीं पी है। अच्छा चलिए, पी है। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? आप पीते किस तरह से हैं? मुआफ कीजिए, मैं एक जगह बैठकर सुरूर लेने वाला आदमी नहीं हूं। कल इतवार था और मैंने सुबह से ही पीनी शुरू कर दी। मैं टेबल पर आर एस की बोतल रखकर उसे ग्लास में ढ़ालता गया और काम करता रहा। मैंने किचेन के बर्तन धोए, बीच बीच में खुमारी चढ़ती तो अनजाने में ही वहीं बैठ जाता

क्या आप खुद को कभी भूलते हैं?

भूलते होंगे। जरूर भूलते होंगे। मेरे अपने आपको भूलने की दर बहुत ज्यादा है। कल से चैबीस घंटे में से साढ़े इक्कीस घंटे मैं अपने आप को भूला रहा हूं। दिन भर टूट टूट कर कमरे का सारा काम करने के बाद मैं शाम को दो पैग लगाने के बाद नहाने चला गया। क्या आपने कभी बहुत सारा पी कर नहाया है? भूलवश मैं बाथरूम का दरवाज़ा लगाना भूल गया। फर्श पर साबुन का झाग लगाकर बैठा तो भूल गया कि मैं क्या करने यहां क्या करने आया था। कई बार ऐसा भी हुआ कि नहाते नहाते पानी भरा मग उठाया और पानी डालना भूल गया। एक चेतना थी जो दरवाज़े के बाहर की दुनिया का आभास कराती थी। कमरे के अंदर एकांत में और दुनिया की पैन करती आंखों के कैमरे के आगे में हम सिर्फ ह और म नहीं रहते। बीच की भूली हुई वर्णमाला भी इनमें आ जाती है।

कुछ बासी सा लार था जो मुंह में जिह्वा और चिकने विशाल छत के बीच था। अटपटाई सी ज़बान थी। अव्वल तो कुछ कहता नहीं। कुछ कहता तो उसे बार बार दोहराता जाता। हंसता तो लगातार हंसता जाता। ऐसे ही हालत मैंने संभोग भी की, जहां कुछ शुरूआत करता और फिर राह में ही भूल भी जाता। साथ वाली पे्रमिका का भी धैर्य चुकता गया जब उसने पाया कि मैं यहां बिस्तर पर अपने तलवे रगड़ रही हूं और वो मेरे बदन की थाह लेने के बजाए कपड़े ही टटोले जा रहा है।

आप सुनने वालों में से कई लोग जा चुके हैं। उन्हें अपना कोई काम याद आ गया होगा। हां तो मैं आपसे क्या कह रहा था..... हां आम आदमी। दोस्तों यह व्यवस्था का ही दोष है जब हर शब्द राजनीति से जुड़ जाता है। यह मज़े की बात है जो आपको सुनने में लगेगी कि जब मैं होश में होता हूं तो हमेशा आपको अपना परिचय देने में डरा हुआ रहता हूं। मुझे हमेशा अंदर से यह खदशा लगा रहता है कि कोई मुझे खुश और हंसता देख ले तो कहीं कोई मुझसे किसी तरह की मदद न मांग बैठे। अपने सहकर्मियों के संग पार्टियों में भी मुझे डर सताता है कि कोई मेरे घर पर पार्टी आयोजित करने का प्रस्ताव न रख दे। मैं अपनी प्रेमिका के घर से भी किसी नौजवान को अपने यहां इसलिए नहीं आने देता चाहता कि कहीं वो मुझसे कोई नौकरी दिलवा देने का आग्रह न कर बैठे। (और जब भी किसी ने ऐसा किया है मैंने हमेशा के लिए उससे कन्नी काट ली है) मुझे अपनी पसंद तक छुपा कर रखनी पड़ती है, वे समझते नहीं कि इस रूप को बचाए रखने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है।

मैं आपको जितना स्वस्थ, हंसमुख, चुलबुला और परिपक्व दिखता हूं उससे कहीं ज्यादा बीमारियां पाले बैठा हूं। हा हा हा हा हा हा।

दरअस्ल सुनने की चीज़ यही है। आप मेरी हंसी में मेरी ग्लानि, प्रशंसा में ईष्र्या, नारी सम्मान में उससे एक विशेष काम वासना सुन सकते हैं। और तो और मैंने कई चीज़ें बुरी बता कर सिर्फ इसलिए छोड़ी हैं क्योंकि वो मुझसे निभ ही नहीं सकती थी।

हां तो प्रिय मित्रों, ज़रा मुझे याद दिलाएंगे कि मैं क्या कह रहा था........

Friday, August 2, 2013

Guzarte Lamhen, passing moments via cinematic angle and '!!!'

27th May, 12 / Rasoi/ 12:55 AM (approx.)

कल रात भारतीय समयानुसार  (how Hindi changes our thoughts!) IST 11:08 पर उसका कॉल आया। हैलो के बाद बीच के समय में हमारे संबंधों की गर्माहट घुल आई। पिछले मार्च में जब हम मिले थे तो हम कोस्टा कॉफ़ी  में हम बैठे थे। पेपर नेपकिन उठाते समय उसने मेरा हाथ पकड़ा था। बहुत धीमे धीमे मुझमें कुछ हुआ था। मैं सिकुड़ने लगी थी। समझ नहीं आया कि कई बार जिंदगी भर धोखा खाने और छलावे को रिश्ते में रहते हुए भी हम नए किसी रिश्ते के लिए तैयार क्यों हो जाते हैं? जबकि हम जान रहे होते हैं कि हमारे बाकी प्यार और रिश्ते की तरह यह भी अनकंडिशनल है। क्या हममें मना कर पाने की इच्छाशक्ति नहीं होती या फिर पहचान की यह दस्तक हमारी जीवन में उम्मीद बनकर आता है। रोशनी भी अजीब शै है, पूरी उम्र अंधेरे की आइसपाइस करते बिता देने के बाद भी हममें कहीं यह धप्पा बनकर पैठ जाती है।

मैं अक्सर सोचती हूं कि आर को आखिर किस चीज़ की तलाश है!
वेल...... अलग होते समय आर ने मेरे बाएं गाल उसके चुंबन लिया जिसने मुझमें एक नया जोश भर दिया था।
 
------पॉज ......../कॉफ़ी ब्रेक /

30th May '12 - I at 8:58 PM

कितने कम लड़कों ने यह महसूस किया होगा कि प्यार करने देना प्यार करने से ज्यादा अहम है!
xxxxx

II- at 11:39 PM

यह कहावत गलत है कि फर्स्ट इम्प्रेशन इज़ द लास्ट इम्प्रॆशन । बाहरी प्रेशर के कारण या फिर पहली मुलाकात में स्वयं को हम अच्छा प्रजेंट करने के कारण अपने मूल गुण से उलट खुद को दिखाते हैं। आत्मविश्वास की कमी वाले ऐसे कई लोगों को मैं जानती हूं जो समय के साथ मिलते घुलते पहचान में मुझे हैरान कर डालते हैं।

31st May '12 - I at 14:56 PM

सोकर देर से उठी। तीस की उम्र होने को आई अब मेरी। अक्सर सुबह जब उठती हूं तो प्यार की कमी महसूस होती है। थर्टीज़ थोड़ी अजीब होती है। यह महसूस करवाती है कि अब हमारे लिए प्यार दुनिया में थोड़ा ही बचा है।  आई मीन कि..... अब मुझे प्यार पाने का नहीं प्यार देने का टाइम आ गया है।

xxxxx
पहली मंजिल से सामने देखती हूं तो पाती हूं ये जाती जुलाई की सीढि़यां हैं। खुले आकाश के नीचे, बारिश की नेह में भींग कर बीच की मुख्य जगह को छोड़कर अपने आस पास के इलाके पर जमी काई को बचाने का प्रयास कर रही है। दीवारों पर यहां वहां मखमली हरी कालीन लगी है।

लॉन के किनारे जंगली खरपरवार उग आए हैं। पी इनके बीच जब उतरता है तो लगता है अपने आप से उलझ रहा हो। दीवार को पकड बढ़ती हर लत्तर उसे किसी उधेड़बुन की तरह लगता है। कहता है - मन हिंसक हो जाता है और पूरी ताकत से उन्हें तब तक काटने का मन होता है जब तक कि सिर्फ और सिर्फ पारदर्शी मैं न बचूं।

3rd of June, 12 at 2:28 AM
सागर बियेविओरल डिसआर्डर से ग्रस्त लगा। आई गेस कि वो चाइल्ड अब्यूज़ का शिकार रहा हो। %$&#&$@

7th June, 12 at 9:46 PM
समटाइम्स वी डोंट चूज़ वर्ड केयरफुल्ली। टूडे आजर्व टोल्ड मी डैट ही वांट्स टॅ हैव सेक्स विद जी। आई इन्नटरप्पटेड एंड करेक्टरेड सिंस यू बोथ आर इन लव इच अदर यू कैन से दैड यू वन्ना मेक लव दिव हर।
सेक्स! हाऊ रिडिकलस!! F****

बाइ द वे लाइफ इज़ गोइंग ऑन  स्वीटहार्ट...... वैसे अभी अचानक से एम की याद आई जो अपने पूरे लेटर में लव की बात करती और लास्ट में अपने सिग्नेचर के बाद पी.एस. डालती कि - दिस इज़ नोट ए लव लेटर

ओह  गाॅश द मेन थिंग आफ्टर दिस लाइन वाज़ थ्री एक्स्क्लामेशन सिम्बल ‘‘!!!’’’

Now, remembering Baby's dialogue from Kasap (Joshi Ji)

"Usne shayad amrood ang lagaaya tha main N ki di hui Vodka laga rahi hoon"

Thursday, August 1, 2013

मरती हुई मछली याद में ज़िंदा रह जाती है


17.03.12 at 11:52 PM

आज अनजाने में ही ए का हाथ मेरे हाथ से छू गया। छुअन को लेकर मुझे लगता है कि हार्ड टच उनता अहम नहीं होता जितना किसी की त्वचा के साथ हमारे त्वचा के रोएं भर स्पर्श करें। इस सिलसिले में मुझे याद है तब मैं बारह की थी और सातवीं में पढ़ रही थी, लंच से ठीक पहले चौथे पीरियड में मृगांक ने एक लंबी गर्म सांस मेरी गर्दन पर छोड़ते हुए मेरे कान की लौ पर अपने नाक से एक धीमा सा स्पर्श कराया। मैं सिहर उठी थी। वो मेरी पहली सिहरन थी। छुअन का वो रोमांच मुझे आज तक याद है।  

खैर......आज के इस स्पर्श से हमदोनों ही चौंक गए। हमने खुद को एक दूसरे से एक झटके से अलग किया। जब भी हमारी नज़र मिलती, हम एक दूसरे को तौलते, बैलेंस्ड बनने की कोशिश करते। फिर रिपोर्ट को समझते समझते मैंने बनावटी गुस्सा अख्तियार किया तो ए पूरी तरह सहम चुका था। मुझे उसका यूं डरना अच्छा लगा।

22.04.12 at 8: 47PM

कल शाम ऑफिस से जल्दी पैक अप हो गया। मैं हूमायूं के क़िले को चली गई। जाने क्या मन हुआ कि मैं किले के अंदर न जाकर बाहर पार्क में ही टहलने लगी। आसमान बहुत गहरा नीला था। नीती जैसे अपने कैनवस पर नीले रंग के ताज़े गीले कलर का इस्तेमाल करती है। मैंने देखा कि आसमान में किले का गुंबद अकेला है। शम्मी के पेड़ के पत्ते मेंहदी के रत्ती रत्ती की तरह बिखरे हुए हैं। पेड़ों के झुटपुटे में कालिमा बढ़ने लगी। एक पेड़ है जिसका नाम मैं नहीं जानती (वैसे तो बहुत से ऐसे पेड़ है जिसका नाम मैं नही जानती) इस पर शाम को कई बड़े पक्षी चील और गिद्ध कयाम करते हैं। ये पक्षी दिन भर जैसे अपने डैने आकाश में फैला कर उड़ते हैं रात को वैसे ही चुप्पा बनकर सिर झुकाए रहते हैं जैसे कोई शुर्तुमुर्ग रेत में अपना सर धंसाए रहता है। तब मुझे इनकी लघुता का एहसास होता है। कोई भी हर जगह बादशाह नहीं होता। मैं प्रकृति की खूबसूरती निहार ही रहती थी कि शाम का धुंधलका कब बढ़ आया पता नहीं चला। शाम रात में बदल गई। 

मैं भी मैं कहां रही!

06.04.12 at 1:28 AM

सीसीडी में आज गर्ग ने अपना हाथ मेरे हाथ पर हिम्मत कर रख ही दिया। मैंने चाहा कि हटा दूं। सो इस दौरान हुए रिएक्शन में मैं हल्का सा कुनमुनाई मगर फिर रहने दिया। मुझे लगा कि मुझे गर्ग के इस टच को समझने की कोशिश करनी चाहिए। उन नज़रिए से नहीं जो मैं उसके बारे में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रखती आई हूं। उस एंगल से भी नहीं जिसके दायरे में वो मेरे लिए पहचाना है। मैंने उसके टच को गर्ग के अस्तित्व से आज़ाद कर महसूसने की कोशिश की। मुझे उसके टच में एहसास और आत्मीयता की वो ऊष्मा महसूस नहीं हुई। एंड देन आई रिअलाइज्ड कि गर्ग इज़ नॉट फार मी। ये भी लगा कि कई बार हम बस पहचान के लोगों के साथ, उसकी आंखों में अपने लिए इज्जत की खातिर, उसकी दोस्ती को तरजीह देते हुए हम उसके साथ सहानूभूति से पेश आते हैं, या फिर दयनीय नज़र से उस भावुक रिश्ते को देखते हैं। डोंट नो डैट मैं खुद को समझा पा रही हूं या नहीं मगर मेरा दिल कह रहा है कि इस चीज़ को जो मैं इस वक्त लिख नहीं पा रही हूं वो बस समझ रही हूं। मुख्तसर बात ये कि प्यार में हमें किसी पर एहसान नहीं करना चाहिए और साथी के साथ और स्पर्श को आज़ाद ख्याल से सुनना चाहिए। अपना मनोभाव उसमें मिक्स कर उस रिश्ते को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए।

22.05.12 at 4:12 PM

डियर डायरी!
या... या.... यप्प.....। आई नो। आई नो। लांग टाईम नॉट रिटेन। बट मिस्ड यू सो मच। तुम्हारी याद तब तक आती रहती है जब तक तुमसे भागती रहती हूं। और अब.... अब तो बस तुम्हें जी रही हूं। इससे पहले कि भूल जाऊं कुछ बिंदु लिख लूं।

  • काग़ज़ कलम का क्या रिश्ता है? तौलकर बोलना क्या प्यार ?
  • आखिरकार सबको अपने घर ही लौटना है। और
  • मरती हुई मछली याद में ज़िंदा रह जाती है।
लव एन हग्स :)
S

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