Monday, September 23, 2013

सुषुम पानी से कहाँ बुझती प्यास

वे कैसी मनःस्थितियां हुआ करती थी। समझाना तो बहुत चाहते थे मगर शब्द नहीं मिलते थे। अचानक से हकबका से जाते थे । अंग्रेजी की टीचर हुआ करती थीं। सात बजे सुबह सामुहिक प्रार्थना चल रहा होता था। हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें। और मन विजय नहीं बल्कि परास्त सा हो चुका था। आज सोचता हूं तो अंग्रेजी टीचर देर रात तक पढ़ती होंगी जभी प्रार्थना में जम्हाई ले रही होती थीं। लेकिन तब लगता था कि उनके पति ने उन्हें सोने नहीं दिया होगा। आखिर क्या कुछ करती रही होंगी इतनी रात तक? तब थोड़ी देर के लिए वे हमारे मन में बेवफा सी हो जातीं। दिल करता हाथ पकड़ कर कोने में ले जाऊं और समझाऊं, आपका पति आपसे उम्मीदें रखता है, आपको चूमता है, मैं कुछ नहीं कर पाता। उसके बनिस्पत मेरा प्यार ज्यादा सच्चा है। आप उसे मार नहीं सकतीं। जबकि मुझे अपने घरेलू झगड़े याद करके भी दस छड़ी ज्यादा मार सकती हैं। मैं कुछ हो सा गया है। आपको लेकर मैं रोता हूं, दोस्तों से बचता हूं। जब आप विलियम वर्डस्वर्थ और जाॅन कीट्स की किसी कविता का मर्म समझाती हैं तो शिद्दत से महसूसता हूं कि अभी तो मेरे पास आपकी समझ को छूने की काबिलयित नहीं है लेकिन शायद मैं आपसे प्रेमपूर्वक यह शास्त्रार्थ करने के लिए ही जन्मा हूं। मेरे लिए, बस मेरे लिए अपनी उम्र रोक लीजिए, मैं जल्द ही आपकी बराबरी आयु और विद्या में करने लगूंगा।

छी आप कैसे उस दिन शनिवार को हाफ डे में पारदर्शी ब्लाउज़ पहन कर आ गई थीं। मेरे सारे क्लासमेट आंखें मार कर कह रहे थे देख बड़ी शौकीन है मैम। अंदर ब्लू रंग का पहनकर आई है। और भी बहुत कुछ। वो सब सुनकर मैंने पहली बार अपने दिल को सिकुड़ता महसूस किया था। टीस की जोंक मेरे धमनी में उतर आई थी। कभी कभी आप पर भी गुस्सा आता था मगर जैसे ही आपको देखता दिल होता कि मैं आपसे माफी मांगू कि मुझे कुछ हो गया है, आप परेशान न हों, मैं जल्दी ठीक हो जाऊंगा। अजीब अजीब तर्क मन में आते। आप संगीत की कक्षा में अपनी सैंडिल उतार कर अंदर जातीं तो मैं उन्हें चोरी चोरी छूता। मुझे लगता मेरे अंदर कोई बोझ है जो अब आराम पा रहा है।

यह संयोग ही था कि हमारी कक्षा में लंच से पहले पांचवीं क्लास आप लेती थीं। लंच में मैं चुपचाप उसी कुर्सी को बेंच के पास खिसका कर अपनी टिफिन खोल लेता था। मैं अपने अंदर तब धीरे धीरे कुछ बदलाव महसूस करता, कनपटी से पसीने की धार लुढ़कने लगती, मेरा शरीर आपमें ढ़लने लगता। आप बना मैं बेंच के उस तरफ खुद को देखता और जानबूझ कर अपने लिए सहानूभूति बटोरने की कोशिश करता। मैं सोचता कि आपने जानबूझकर मेरे माथे पर आज अपना हाथ फेरा है और अन्य विद्यार्थियों के बनिस्पत आप मेरे लिए थोड़ी बायस्ड हैं। मैं कुर्सी को पूरी तरह छेंक कर बैठने की कोशिश करता मुझे वे कुर्सी खास आपके बदन के स्पर्श से एक विशेष तरह की गर्माहट भरी लगती। मेरे मन को यह सोचकर बड़ा आराम मिलता कि कुर्सी के इस हत्थे पर हां यही आपकी तराशी हुई बांहें अभी कुछ देर पहले तक थी। पलट कर रखी गई किताब के उन पन्नों के अक्षर मुझे काग़जों में हल्के हल्के तैरते हुए लगते। लगता तालाब में जैसे कोई बत्तख डोल रहा हो। किताब के पन्ने बुखार में हल्के दहकते हुए महसूस होते। और एक दिन जब उस पर जल्दी में कोई और बैठ गया तो उस दिन मैंने छुट्टी के बाद छुपकर मैंने आधी ईंट का पूरा टूकड़ा उसके माथे पे दे मारा था।

उन दिनों रात को अपने घर पर टेबुल लैंप की रोशनी में अंग्रजी की कविताओं के पन्ने फाड़ मुंह में ठूंस कर बेआवाज़ रोता था। जिस रात मैं जितना रोता अगली सुबह आप मुझे उतनी ही धुली हुई मिलती। मुझे आप फिर थोड़ी से बेवफा लगती. मुझे इसमें कोई कनेक्शन लगा। इसलिए मैंने खुद को तकलीफ देना शुरू कर दिया। धीरे धीरे मैं आपकी कक्षाओं में भी रोने लगा।

ज़ारी


Thursday, September 19, 2013

गौरी, मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे!

गौरी (गौरीशंकर) मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे। तू ही बता न ऐसे में मैं क्या करूं। काकी चूं चूं करती है। काकी बक बक करती है। कुत्ता भौं भौं करता है। भाभी की मुनिया भें भें रोती है। खुद भाभी भी घूंघट काढ़े भुन भुन करती रहती है। सचदेवा पिंगिल पढ़ता है। कठफोड़वा टक टक करता है। देहरी पर बंधी बकरी चकर चकर खाती रहती है, टप टप भेनारी गिराती रहती है और में में किए रहती है। अउर ऊ जो गईया है का नाम रखे हैं उसका कक्का दिन भर मों मों किए जाती है। हमको मरने के बाद बैतरनी का का जरूरत ? इसी हर हर कच कच में जिन्दे बैकुंठ है। आदमी तो आदमी जनावर तक सुरियाए रहता है।

भोर हुआ नहीं, पंछी बोला नहीं, अजान पड़ा नहीं, घरिघंट बजा नहीं, रत्ना ओसरा बुहारी नहीं, सुधीर घोड़ा वाला खाना चना गुड़ अंटी में दाब के दौड़ने निकला नहीं कि भर हंडी भात परोस दो बूढ़ा को। भकोस कर हम पर एहसान करेंगे। और उस पर भी मिनट दू मिनट सुई टसका नहीं कि सुनो रमायन। हमारा पेट गुड़ गुड़ करता है। मन हद मद करता है। चित्त थर थर करता है। बैठल ठमा बूढ़ा मौगी जेकां कथय छै।

बीनी से हांक रही गित्तु। गौरिया पर साल पारे गए कटहल के अचार संग गर्म भात मिलाकर कंठ के पास रखे जा रहा है। हर तरह से बहुत भूखा है गौरी। गित्तु की खबर कई साल से नहीं थी। उसका चेहरा कितना बदला, ससुराल कैसा मिला। अमरपुर से कल्हे सांझ को टमटम लिया था, एक थान कपड़ा बगल में दबाए। खाली हाथ कैसे आता न, बचपन की दोस्त जो ठहरी गित्तु। एक ही बात समझ में आया गौरी को कि गित्तु को चैन नहीं है। वह तसल्ली से उससे कहीं अकेले में उससे बात करना चाहता है। घर वाले मोहलत नहीं देते। गित्तु अकच्छ है। घिरनी की तरह नाचती रहती है।

गौरिया को अपने ऊपर ग्लानि होती है। मेरी वजह से सबके उलाहने सुन रही है गित्तु। नहीं ही आता तो क्या हो जाता? गित्तु है कि कुछ खिलाकर भेजना चाहती है, थाली तैयार था जिसमें दो फक्का अचार था और एक पुराने स्टील के लोटे में पानी। वैसे तो आंगन में हर कदम पर पैर से पीढ़ा टकराता है लेकिन समय पर पीढ़ा नहीं मिलता। गौरी संज्ञान लेता है, गित्तु घबराती है तो और भी ज्यादा बोलने लगती है। अपना उतावलापन छिपा रही है या ग्लानि। इस एक पंद्रह बीस मिनट में क्या कुछ कर लेना चाहती है? हमारे बीच यही पंद्रह बीस मिनट हैं और हमें इसी मिनट में सबकुछ हल कर लेना चाहिए।

नहीं समझती गित्तु। ससुराल में मेहमानवाजी की इज्जत बचाने पर तुली हुई है। नहीं ही मिलता पीढ़ा तो अपना पूजा करने वाला आसन ही दे देती है बैठने को।

तू कभी और नहीं आ सकता था ? इस बार तो रहने दे लेकिन फिर आएगा न? देख तेरे लिए कुछ कर भी नहीं सकी। मकई कटने का समय है न, सब खेत में उलझे हैं। बब्बू ट्यूशन गया है, सात बजे तक लौटेगा। है तो ट्यूशन ही पर कोचिंग जैसा पढ़ाता है मास्टर। अभी क्या बजा होगा? बीनी झुलाते गर्दन उचकाते हुए देखती है गित्तु। धूप  भंसा घर के खपरैल को पार कर रही है। सवा पांच बजा है। अब दिन भी लंबा........

गर्म गर्म भात और अचार का मसाला! एक तेज़ जलन उठती है गौरी को। आंखों में पानी आ जाता है। किसलिए गीली हुई ये आंखें? किसके लिए? अचार के झांस के बहाने थोड़ा रो लेता है, उसकी हाल पर। आंख चुराकर देखता है गित्तु को। उफ। कितने बहाने! बड़ बड़ करने की आड़ में जाने क्या क्या बोले जा रही है।

'आज रात रूक जाता गौरी।'
एक अनचाही सी मिन्नती जिसमें न रूकने की आस छुपी है। बचपन का दोस्त है, ताड़ लेता है गौरी भी। रेलवे में ए सी मेन्टेनर का रिजल्ट नहीं आया, इलाहाबाद परीक्षा में इंटरव्यू में छंट गया, भुवनेश्वर रेलवे में गु्रप-डी का फाइनल रिजल्ट आने ही वाला है। कहने को अभी तक बस इंतज़ार है, निठल्ला है, रूक सकता है, लेकिन रूकने से सवाल पर ही कौर निगलने से पहले ही ऐसा उत्तेजित होकर जवाब देता है - 'उन्....उन्....उन्नहूं, कल सुबह ही दीदी इंटरसीटी से बेगुसराय जा रही है। फिर साढ़े दस बजे बाबूजी के साथ गौरीपुर बैंक जाना है, पैसा निकालने। वहां से भागलपुर, खतौनी का रसीद कटाने अमीन से मिलना है। कित्ते तो काम हैं गित्तु! और फिर मकई कटने का मौसम वहां भी तो है....'

आंखें फिर एक पल को मिलती है। जैसे चार चोर नज़र मिलते हैं। पंखा झलना एक पल के लिए रूकता है फिर बातों में आई धीमेपन दुगनी तेज़ गति से चल पड़ता है। गौरी भी अपने कंठ में अकट गया निवाले को पानी के एक लंबे घूंट से नीचे ठेल देता है।

खाना हो गया। गौरी हाथ धोकर हवा में हाथ झाड़कर उसे सुखा रहा है। तब तक धोकर रखे गए कपड़े गित्तु रस्सी पर पसार रही है। उसे लगता है कि यह क्या है जो एक कोने से दूसरे कोने तक खुले आंगन में खिंचा हुआ है जिसपर अलग अलग नाप के कपड़े सूखते हैं, बारिश में भीगते हैं और धूप खाते हैं!

गित्तु मुस्कुराती आंखों से गौरी को देखती है, अब नहीं दे सकती हाथ पोंछने के लिए उसे अपना दुपट्टा। सिर्फ इतना कहती है- 'आंचल से अब गौरी पूजते हैं, रोज़।'

यह क्या बोल दिया उसने। अचानक में बोले गए वाक्य कितना सच हो आया है। सुनकर गौरी को टीस मिली खुशी महसूस हुई है। वह तिलमिला सा उठा है। जीभ बाहर कर लंबी लंबी सांस ले अंदर की लहर निकालता है।
विदा लेने का समय आ गया। कुछ बातें समझीं हुई, कुछ समझाई। कुछ बातें तमाम खुलेपन के बावजूद वर्जित। कुछ पर चुप रहना बेहतर। कुछ सवाल हत्या के प्रतिक्रियास्वरूप हैरानी भरी आंखों से ताकती हैं। कई सवालों का जवाब नहीं मिला है। जबकि मिलना जवाब के लिए ही हुआ था।

स्टील की छोटी प्लेट में मेहमान को चार लौंग, दो इलाइची, चार मिसरी, एक जनेऊ और कम से कम ग्यारह रूपया देकर विदा करने का रिवाज़ है। दोस्ती थोड़ा सा रिवाज़ निभाता है बहुत सा रिवाज़ तोड़ता हुआ बुझी आंखों से गित्तु को देखता हुआ बस इलाइची लिए निकल पड़ता है।

मुंह फेर कर आगे बढ़ आए गौरी को कच्चा रास्ता सूनी पगडंडी सा जान पड़ता है। लगता है वे गित्तु की आंखें हैं जिसमें वो अपना होकर भी गैर होकर चल पड़ा है। भुरभुरे ईंटों की गली से निकलते गौरी के मन में सांझ ढ़ले किसी आंगन से उठती लोकगीत सुनाई देती है -

सरसों के कली सिय जोत महान हे तीसी फूल
रंग दुलहा सोहान हे तीसी फूल
उगल चार चार चांद हे तीसी फूल
मोर सजना महान हे तीसी फूल

एक आवाज़ और उसमें आ मिलती है - गौरी, मन चकरघिन्नी सा नाचता है रे, तू ही बता न मैं क्या करूं?
वह तेज़ी से पीछे मुड़कर देखता है। गली का मोड़ तो कब का खत्म हो चुका है।

Thursday, September 12, 2013

उससे कहो कि आकर मुझसे लड़े


उसकी कोई खबर नहीं लगती। सूचना प्राद्यौगिकी के अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस रहने वाली के बारे में अब कहीं कोई जिंदा जानकारी नहीं है। चंद कतरे उसकी आवाज़ के अपनी जिंदगी में इक जगह सकेर रखा है। वहीं उसे थोड़ा बहुत पा लिया करता हूं। एक पोस्टकार्ड है, गहरे आसमानी काग़ज़ पर उसकी बचपने में लिखी कुछ सतरें हैं। एक फिल्म में काम करना भी। उसके अक्षर आंगन में ढुलकते लोटे जैसे लगते हैं। 

उसे कहां कहां नहीं ढूंढ़ता। कनुप्रिया की किताब में, इज़ाडोरा डंकन के जीवन में, आंखों से बोलती किसी म्यूजिकल ब्लैक एंड ह्वाईट फिल्म में जहां दृश्यों के बीच तेज़ पियानो बजता है। मैं उसे खोजता हूं सखुए के पेड़ों के बीच, बदहवाशी के घोंड़ों के बीच, नींद और सपने के जोड़ों के बीच, अपनों से घिरे गैरों के बीच, सेंट ऑफ़ अ वुमेन के डांसिंग सीन के बीच, ज़हन में बॉस से डांट खाते खौफ के रील के बीच, जैसे मुझे अपने शहर का गंगा किनारे बहता गंदला नाला भी पसंद है वह भी मुझे उतनी ही अज़ीज है।

भीड़ भरे हाट से थैला भर सब्जी खरीदने से कभी नहीं ऊबा मैं, शाम ढ़ले काठ की नाव से गंगा में डूबा मैं, दूर रहकर भी वो पड़ोसन की तरह ही लगती, क्या था जो इतना याद आता, सताता। जीवन गर्क करता, वर्तमान नर्क करता।

मेरा खुदऐतमाद मर गया है। अपने ही दिल के अंदर एक खोखल सा महसूस होता है। शदीद तनहाई से सींचा जाता, बरगद की तरह फैलता एक विशालकाय वृक्ष। उसे हर जगह तलाशता हूं। उसकी सरौते जैसी उँगलियों का लम्स फिर से जिंदा कैसे हो.


अब कहां की दानाई अब के कैसे बिसात
तुम भी छेड़ लो तुम्हें भी करार आ जाए

आदमी में ही यकीन था या कि उजाले में
क्या लगते थे तुम्हारे जो दुबारा तवील बोसे दिए

रंगीं पैरहन एक हसीं गुलिस्तां सा लगता रहा
तुमको चुनना साइड इफेक्ट लेकर भी आता रहा

इक उम्र ही तो गुज़ारी है, जानता हूं मैं अपने बदन को
तू मुझको वहां से छू जहां से मैं अनजान हूं अबके


उसको चाहिए कि आकर मुझसे लड़े।  

Wednesday, September 11, 2013

टूटता नहीं ये जादू


होंठ उसके जब भी लपकता हूं, गर्दन से गुज़रता हूं
इरादे दरकने लगते हैं, लहू बहकने लगते हैं।
मन जैसा कैसा ऊपर नीचे को होने लगता है।

दिल होता है किसी चील की माफिक चोंच में दबा कर उसे
उड़ जाऊं, इफरात समय निकाल, नितांत अकेलेपन में शिकार करूं
नस नस चटका दूं उसकी, अपनी रीढ़ की हड्डियां तोडूं

नहीं ही पूरा हो पता पक्षियों का सा ये ख्वाब तो
गली के मुहाने पर झपट्टा मार कर पकड़ लेता हूं उसे
निचले होंठ को अपने दांतों से महीन महीन कुतर देता हूं
दोनों गालों पर अनार उगा देता हूं
किसी दुख का बदला लेता हूं
जाने कैसी संगति है मेरी, कैसा मनोविज्ञान है
बिछड़ने से पहले कर डालो सब तकलीफ कम रहा करेगी
वह कहती -
एक मिनट रूको, जाना तो है घर ही वापस
बस ज़रा लिपस्टिक लगा लूं

/एक मिनट का अंतराल, जिसमें-
बारी बारी से ऊपरी और निचले होंठ पर लिपस्टिक फिसलता है (मन होता मेरा मैं ही अपने होंठों से वो लाली मिला दूं)/

क्षण भर में बदल जाती वो
मैं नहीं बदल पाया सदियों में

हर पल में लगती वो खींचती हुई
टूटता नहीं कभी ये भोर का-सा जादू! 

Tuesday, September 10, 2013

तुम्हें भी तो था न प्यार, तुम भी तो कह सकती थी



तकिए पे आहों की अनगिन सिसकियां हैं
कभी तुम्हारा बाल टूट कर छूट जाया करता था जिसपर
हाट ले जाने वाले झोले में अब बेहिसाब जिम्मेदारियां
बैंगन, तोरी, टिंडा, मेथी, अजवाईन, जीरा, परवल
एक ज़रा ध्यान तुम्हारा गया तो सुनीता चमकीं
अरे ! दातुन नहीं लाए।
परिपक्व हो चला अब बनाता हूं फौरी बहाने
नीम का था, आज मिला नहीं
उसे जवाबों ने न कोई लेना
नहीं ही जरूरी भी कोई मेरा जवाब देना
वो न सुनती, मैं न कहता

सांझ ढ़ले लालटेन शौक से जलाती सुनीता
आंखें क्षण भर दिप दिप करती, पलकों पे उसका कन्हैया नाचता
मैं जान रहा होता, मोरनाच करते रोशनी को, उसके प्रेमी को
वो समझ रही होती मैं छूट गया हूं
जल्दबाजी में पोछे गए लिप ग्लाॅस की तरह अपनी प्रेयसी के पास

हम दोनों बिला मतलब झगड़ते
हम दोनों एक दूजे की बेबसी समझते,
हम दोनों परस्पर हमदर्दी रखते
हम दोनों आधी रात अनजाने में करीब आते
हम दोनों किसी बहाने ज़ार ज़ार रोते और मजबूत होते
हम दोनों नहीं होते मौजूद जब संभोग होता

हम दोनों के बच्चे स्कूल जाते हैं, गेहूं पिसवाने को पैसे मांगते हैं।


हम दोनों एक दूजे को अब तक नहीं पहचानते हैं। 

Friday, September 6, 2013

नेकलाइन - तीन

हाय ! कैसे हो?

याद को वो पुराना सिलसिला इस प्रश्न से टूटा। मुझे लगा वो मेरे चेहरे पर विछोह के पड़ते फ्लैशेज़ कहीं देख न रही हो, सो जड़ता से लगभग टूटता हुआ मैं बोल पड़ा - हैलो, तुम कैसी हो।

एज़ यूजअल बढि़या। उसने ज़रा और आत्मविश्वास से खड़े होने की कोशिश की। बढि़या शब्द उसके मुंह से काफी माड्यूलेट होकर निकला जो मुस्कुराने और हंसने के बीच की अवस्था में कहीं फंसा था।

हम्मम..... - मैंने उसकी वर्तमान स्थिति से अवगत होते हुए कहा

मुझे कम बोलता देख उसने दूसरा रूख अपनाया जहां से मुझसे कुछ बुलवाया जा सकता था।
और तुम्हारे घर में सब ठीक? मम्मी, बुआ और मामाजी?

हां, वो सब भी बढि़या। दरअसल मैं इस अचानक के मिलने के संयोग को अब तक स्वीकार नहीं पाया था, सो बेहद सर्तकता से अपने शब्दों को चुन रहा था।

और मीता ? उसका क्या हाल है, इंटर में एडमिशन हो गया उसका?
आं... हां। हो गया।

सब्जेक्ट्स क्या लिए हैं उसने? - मैं हकबका गया। उसके अंदर अब भी उगलवाने की कला मौजूद थी। उसने भांप लिया था कि मैं बोलना नहीं चाहता। बरसों बाद कुछ खास किस्म के रिश्तों से जब हम टकरा ही जाते हैं तो उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं।

ऐसा नहीं था कि मैं उसके बारे में नहीं जानना चाहता था मगर उसके बात को शुरू करने का सिलसिला खीझ बढ़ाने के साथ साथ दिलचस्पी का भी बायस था।

मैंने जानबूझ कर जवाब नहीं दिया। मैं देर से जवाब देना चाहता था। लेकिन उसमें धैर्य नहीं था।

पेट निकल आया है तुम्हारा, आं....? उसने फिर पिन मारी। मैंने खिड़की के बाहर से नज़र हटा कर उसकी ओर एक नज़र देखा। हमारी आंखें मिली। मुझे सही जगह चुभी। मैं तिलमिला कर रह गया।

बीच के वक्फे खाली गए। मेट्रो के ट्रैक पर सरसाने की आवाज़ उस खाली वक्फे पर सुपर इम्पोज हो गई।
लगता है, तुम बात करने के मूड में नहीं हो। चलो..... मैं चलती हूं। ओ. के.।

नहीं ऐसा नहीं है। मीता ने बाॅयो लिया है। बुआ जी अब बीमार ज्यादा रहती है। मामाजी घर छोड़ गए। और बांकी सब ठीक है।

मैंने गौर किया कि अक्सर कुछ लोग जो कम बोलते हैं, वो फट पड़ते हैं।

मैं सही मायने में अब लौटा था जो बातचीत में काॅपरेट न कर पाने के गिल्ट को अब ढांपना चाहता था।

बाहर रात गहरा रही थी। नीले रंग के शाम का जादू अब टूट रहा था। अंधेरा सघन हो रहा था।

Monday, September 2, 2013

नेकलाइन- दो

मेट्रो की चौकोर खिड़की से बाहर शाम और रात का मिलना देखा जा सकता था। कभी कभी अंधेरे के बीच खड़े पेड़ और अंधेरा होने की मुहर लगा जाते। गाड़ी तेज़ी से फिसलती जाती और बाहर ट्रैफिक पर एथलीट की तरह रूकी गाडि़यां हरी बत्ती की हवाई फायरिंग का इंतज़ार कर रहे होते।

कुछ झगड़े कभी खत्म नहीं होते। हमारा आपस में झगड़ा कभी शुरू ही नहीं हुआ। वे झगड़े जो कभी लड़े नहीं गए, अंदर बहुत झगड़ता है। मैं अंदर ही अंदर उससे अब भी झगड़ लेता हूं। कभी वहां से शुरू करता हूं जहां से सब असहमति भर हुई थी। कभी वहां से जहां विवाद की गुंजाइश थी। कभी उसकी आंखों के ऐतराज़ से ही। कभी उसके बायीं भवहों के तिरछे होकर ऊपर उठने भर से ही तो कभी फोन पर किसी से बात करते हुए थर्ड पर्सन के रेफरेंस के मार्फत ही। मेट्रो जब प्रगति मैदान से मंडी हाऊस के लिए अंडर ग्राउंड हुई तो लगा तो हम भी अपने अतीत के सुरंग में जाने लगे। सफर हमेशा किसी के याद में ही ज्यादा बीतती है। और ऐसे में उसके ठीक सामने पकड़ा गया मैं हम दोनों को भीड़ के बीच अकेला कर गई थी।

वो आज भी उतनी ही साहसी है। जिन जिंदा सवालों के साथ वो मुझे घूरे जा रही थी उससे तो भीड़ में से कई लोग हमारे रिश्ते के बारे में जान चुके होंगे। 

जो रिश्ता खत्म हो गया अमूमन उससे मिलने की इच्छा मर जाती है। शायद वे रिश्ते खत्म नहीं होते। प्रेम में हम जेनेरश भी होते हैं और तह में कहीं जाकर प्रतिशोधी भी। हमारा प्रेम मुरझा गया था। उसकी सांसे तेज़ चल रही थी जिससे शर्ट के नीचे स्फटिक की घूमती मोतियाँ दिखाई दे जाती।  कान के झुमके अब भी उसके बालों के बीच फंस गए से लगते थे। 

क्या कहा था मैंने -
‘‘सिर्फ पूर्ण प्रेम। इससे कम मुझे कुछ नहीं चाहिए। सात गद्दों के बीच एक बाल भी नहीं। एकदम गुदगुदे गाल और भरे भरे उभार। और इससे कुछ भी कम तो गेट लॉस्ट। दरवाज़ा उधर है।’’

दरवाज़ा उधर ही रहा, बस वो नहीं रही। अक्सर ही जिस शाम मुझे पीने का इच्छा दोपहर से ही बलवती होने लगती है उससे झगड़े की दर भी बढ़ती जाती है। मैं अपने संवाद भी बोलता हूं और उसकी शैली और भाव भंगिमा से परिचित उसके भी, कि अभी अगर वो सचमुच यहां होती तो यही कहती। कल्पनाशीलता के किसी मोड़ पर जाकर शून्यता उभर आती है कि मैंने यह जबाव बहुत बेहतर दिया और शायद यह अकाट्य होता।

मगर क्या कहा था उसने -

कुछ भी तो नहीं.

(...जारी)

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