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तकरार

नहीं नहीं, मैं खां साहेब कि बात नहीं कर रहा ... ना ही उस उस दुष्ट बल्लेबाज की जो तुम्हारी आदतन फैंके गए चौथी स्लो डिलीवरी पर रिवर्स खेल गया... और ना ही ओबामा के अचानक इराक दौरे की बात कर रहा हूँ... मैं तो उस दीये की बात करूँगा ना जो शक्तिहीन है, इतना सीधा कि बेमकसद है .. जो छल-प्रपंच नहीं जानता... मकसद ? हाँ मैं सभ्य समाज वाले मकसद की बात नहीं कर रहा ? इसे समझना होगा आपको... दादी मर रही थी तभी आत्मा का ट्रांसफोर्मेशन हो रहा था... वो भौतिकी वाला हीट तो नहीं था ? पता नहीं, पर अगर था तो डायरेकशन तय करनी होगी. एक बात और...  यह सच है कि मैं जब भी पतंग उडाता हूँ काले बादल घिर आते हैं... पर इसकी परवाह नहीं मुझे क्या रात में पेड़ तुम्हें चुप्पी साधे खड़े नहीं दिखाई देते हैं ? हाँ. सब आप लोगों जैसे लगते हैं. अँधेरे में सुप्रीम कोर्ट का गुम्बद नज़र आता है ? हाँ, अभी तक तो आ रहा है. गुड ! फिर तुम जिंदा हो अभी. पर क्या यही बड़ी बात है ? नहीं... आवाज़ को सुनना बड़ी बात है, जिस भी शहर में रहे आधी रात को ट्रेन की आवाज़ आती सुनी ? हाँ, पर यह भ...

मूक सिनेमा का दौर

दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियां   महाराष्ट्र   तक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता में   हीरालाल सेन और जमशेद जी मदन   भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में   प्रदर्शित   होकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों में   प्रदर्शित   करें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारा   निर्देशित   फिल्म ' बिल्म मंगल '   तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहला   प्रदर्शन   नवम्बर , 1919 में हुआ।   जमदेश जी मदन ( 1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।   वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंने  ...

भारत में सिनेमा का आगमन

7 जुलाई, 1896.... मुंबई की वाटसन होटल में कुछ चुनिन्दा लोगों के सम्मुख लुमिएर बंधुओं की फिल्मों का प्रदर्शन किया गया. लुमिएर बंधुओं के इस चमत्कार को तत्काल कामयाबी मिली और टिकट दर एक रुपया होने के बावजूद बड़ी तादाद में दर्शक बायस्कोप देखने के लिए जुटे. इस कामयाबी के बाद इन फिल्मों का प्रदर्शन नावल्टी थियेटर में होने लगा. इस प्रकार भारतीय सिनेमा का सफर भी विश्व सिनेमा के लगभग साथ-साथ ही शुरू हो गया. लुमिएर बंधुओं ने अपना पहला प्रदर्शन पेरिस में दिसंबर, 1895 में किया था और छः महीने की अवधि में ही भारतीय दर्शकों को भी फिल्म देखने का मौका मिल गया. शेष विश्व की भांति भारतीय दर्शकों ने भी सिनेमा का दिल खोकर स्वागत किया. वाटसन हॉस्टल में आयोजित प्रथम प्रदर्शन देखने के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा “ एक शक्तिशाली लालटेन के माध्यम से वास्तविक जीवन से मिलते-जुलते बहुत से दृश्य परदे पर दिखाए गए. जिस प्रकार प्रत्येक पात्र की भाव-भंगिमाएं अत्यंत स्पष्टता से प्रस्तुत की जा सकीं, उससे पता चलता है की छायांकन की कला और जादुई लालटेन का गठजोड़ किस उन्नत स्थिति तक पहुँच चुका है. एक मिनट में लगभग 700 से...

अवचेतन में बजती धुन...

सारंगी की पहली तान महज़ रियाज़ के वास्ते बजी थी यकायक लगा रेखा यानि उमराव जान अवतरित होकर अब तर्ज़ छेड देगी. लेकिन उस्ताद ने ऐसा समां बंधा और लोगों ने ऐसी दाद दी रिहर्सल रूम लाइव कॉन्सर्ट में तब्दील हो गया. उस्ताद शेर बन कर बजने लगे. ढोलक ने साथ दिया तो माहौल खुशनुमा हो गया. जुगलबंदी सर चढ़कर बोलने लगी. फिजा में नफासत घुल गयी और सारे संगीतप्रेमियों के माथे पर दिन भर की शिकनें समतल हो गयी. बारी-बारी दोनों उस्ताद अपनी पारी आजमाते, एक में भाव विभोर होते तो दूसरा हमारी तन्द्रा तोड़ देता... हम संगीत कि अठखेलियों पर झूम रहे थे... सरस्वती ने अपने गोद में हमें लेकर ऐसा मंत्रमुग्ध किया कि हम अपनी सुध-बुध हो बैठे... गांव में ऐसे ही किसी उचाट और अलसाई सी दोपहर में गोरखधाम से से कुछ सारंगी वाले आये थे और शाम तक सारंगी द्वार पर बजायी थी. उन दिनों मैं अपनी सारी जरुरी चीजें झोपडी जो कि टाट कि बनी थी, उसमें खोंस कर रखता... उसमें मैंने कई भूले बिसरे धुन भी रख छोड़े थे... जब से घर छोड़ कर निकला तब से जब भी घर को याद किया है मैंने यही धुन अवचेतन में हावी हो गया है. त्योहारों के दौरान मैंने अपने ग...

उदासियाँ

बड़ा ही भाव-विह्वल हो कर मैं उन लम्हों को याद कर रहा हूँ नहीं शायद फिर से देखने की कोशिश कर रहा हूँ.. इस कोशिश में मेरी आँखें आगे की ओर निकल आती हैं... लगता है मैं किसी बेहद रुलाने वाली फिल्म का क्लाईमैक्स देख रहा हूँ... इससे मेरी आँखों में पानी का थक्का जम गया है जिसे लोग आंसू का नाम देते हैं... मुझे याद आता है कि मैं पिछले कई महीनो से नहीं रोया और पानी के इस थक्के ने गालों कि पगडण्डी नहीं पकड़ी... धूप में चलते हुए मेरी परछाईं भी छोटी हो चुकी है और मेरे से बात करना उसने बंद कर दिया है. ट्रेन प्लेटफार्म से खुलने ही वाली है पर नज़ारा ऐसा है जैसे अभी अभी भीड़ को उठाकर ट्रेन यहाँ से निकली है. यकायक सूना सा प्लेटफार्म मेरे दिल जैसा लगने लगता है. ट्रेन के सारे कम्पार्टमेंट खाली हैं... आदतन मैं खिडकी वाली सीट पकड़कर बैठ जाता हूँ... मुझे उसकी समानांतर चलती पटरी के नीचे कई पहचाने से तख्ते नज़र आते हैं... थोड़े घिसे हुए... कितना याराना लगता है इनसे...सर में थोड़ी सी दर्द लिए यात्रा करना कैसा होता है ? वही पल फिर से नमूदार हो जाते हैं... मेरा चेहरा मलिन होने लगता है...इस अपमान को मथते हुए मैंन...

सिनेमा के कार्य-व्यापार का फ्लैशबैक

1910 में , मुम्बई में , अमेरिका-इण्डिया पिक्चर पैलेस में मैंने एक फिल्म ` द लाइफ ऑफ क्राइस्ट ´ ( ईसा मसीह की जीवन गाथा) देखी। इसके पूर्व मैंने कई अवसरों पर अपने मित्रों और परिवार-जनों के साथ फिल्में देखी थीं , लेकिन वह दिन , क्रिसमस के दिनों का वह शनिवार , वही मेरे जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन की शुरूआत का दिन था। वो दिन ही भारत वर्ष में एक उद्योग की स्थापना का स्मृति चिन्ह है कि बड़े-छोटे सभी व्यवसाय जो आज विद्यमान हैं उसमें उसका पांचवां स्थान बन गया है और यह सब मुझ जैसे एक गरीब ब्राह्मण के द्वारा सम्भव हो पाया। ईसा मसीह के जीवन की महान घटनाओं को देखते हुए जब मैं सुध-बुध खोया हुआ ताली बजा रहा था तब मुझे विचित्र अवर्णनीय भाव की अनुभूति हुई। जब ईसा मसीह का जीवन मेरे दृश्य पटल पर तेजी से घुमड़ रहा था , उसी वक्त मैं श्रीकृष्ण भगवान और श्री रामचन्द्र भगवान् को और गोकुल एवं मैंने महसूस किया कि मेरी कल्पना पर्दे पर रूप ग्रहण कर रही है। क्या वास्तव में हो सकता है ? क्या हम भारत-पुत्र पर्दे पर भारतीय बिम्बों को कभी भी देख पाएंगे ? समूची रात इसी मानसिक उहापोह में बीती। उसके बाद के दो म...