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कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हम भी, और ये चोट नई है अभी

एस:  धूप में खेलते बच्चे, टाट की झीनी पर्दों से आती रोशनी, आंगन में चलते चापाकल की आवाज़ ? वी: ना... ना... दरिया के बढ़ते पानी में कूदे डूबते बच्चे, मन भर गेहूं का ढेर, बीच खेत कमर भर पानी में लगा        मचान। एस: अच्छा ठीक, पुरखों की ज़मीन से निकले कलसी को सहलाना, कुलदेवी के लिए सात घाट का पानी और पुरानी घाट पर के संगमरमर को आंखों से सहलाना ? वी: ना... ना... साफ पानी के ठीक दो इंच नीचे करवट लेती मछली, शर्मीला टैगोर जैसी आंखों वाली हिरण की कुचांले और अरहल की दाल को देसी घी में हल्के भूनने की महक... एस: सहमत यानि कि ऊपरी अधरों को चूमना छोड़ उभारों के बीच का सीना और पतली कमर में गिटार का अक्स, श्वेत श्याम रंग में उभरे हुए कूल्हे यानी आमंत्रण देता कटा सेब और.... और.... (बात काट कर... ) वी: हां अबकी बिल्कुल ठीक, यानि वो नहीं जो होना ही हो बल्कि...  (क्राॅस करता हुआ एस)  एस:         बल्कि हो ही जाने में एक अनजान डगर जो हो जाने को रोमांचक, अर्थपूर्ण, विस्तृत और अंत में अनुभव का विशद पुर...

परत होती है शायद इसलिए आईने के सच बोलने का भ्रम बना रहता है

सिमटे में फैला एक गांव, कोहरे में उजागर एक सुख देर का भूखा बच्चा अपनी मां के आंचल में घुसा दूध पी रहा है। पेट भरने को है और अब खेलते खेलते पी रहा है। इस क्रम में गोद से बाहर लटका कभी पैर झुलाता है तो कभी सीने औरत के सीने पर से आंचल को पकड़ हटा देता है। हटा देता है कुछ इस तरह से जैसे पहचाने से किसी पहाड़ को अनजाने पर्दे से आज़ाद कर रहा हो। मां बार बार इधर उधर देख कर आंचल ठीक करती है। बीच बीच में बच्चा निप्पल से मुंह हटा कर किलकारियां मारता है। औरत को लगने लगता है कि इसका पेट भर चुका है इसलिए अब खेल रहा है, वह फैसला करती है कि मिनट दो मिनट बाद वह थन से बच्चे का मुंह छुड़ा देगी। उधर  बच्चा बीच बीच में थन में फिर दांत लगाता है। लगातार पड़ते दांत और भींगने के असर से थन अंगूठे-सा हो गया है। उस पर दांत के निशान साफ-साफ दिख रहे हैं। जब भी बच्चा दूध पीता है, मां का मन गुदगुदाता है। वह इसमें सहयोग समर्थन कभी लोरी गा कर, कभी कोई लोकगीत गुनगुना कर, अपने बच्चे को सहला कर करती है। कई बार वह बस उसे अपने गोद में उठा लेती है। बच्चा बाकी काम खुद कर लेता है। तब वह चुल्हे के पास बैठी दाल भी...

इश्क के जिस्म का घुटना आगे से सख्त मगर पीछे से चिकना, बिना रोओं का रंदा पड़ा और अनछुआ है

(अंजुमन-ए-इस्लामिया के पार्क में बैठकर ...) नज़ाकत बस नाम का ही नज़ाकत है। नाजुकी तो उसमें है ही नहीं। अल्ला झूठ न बुलाए यास्मीन लेकिन मुझे शक होता है कि मियां खत भी दूसरों का ख्याल सुनकर ही लिखते होंगे। हुस्ना के चेहरे पर का नमक नाक के पास तेज़ हो आया है। मिलावट भरी खफगी से संगुफ्ता से कहती है। खुदा जाने लिखते हैं या दूसरों से लिखवाते हैं। गोया यह भी कोई उमर है सैनिक की तरह सलामी देने की! अरे इतना भी नहीं जानते कि मुहब्बत को सलाम करना भी इश्क का एक रूमानी अंदाज़ है। सलाम यूं हो कि वजूद का पूरा हाल बयां हो जाए। हाल-ए-दिल नुमायां हो जाए और दिल के गोशे-गोशे में सिमटा पाक मुहब्बत इत्र बन पूरी वादी को महका जाए। पाकीज़गी का एहसास हो और... और मैं तो कहती हूं सलाम ऐसा हो कि बस यूं लगे कि कुछ पल के लिए सांस रूके भी, थमे भी। इक ज़रा देर दम घुटे, सांस खींचू और महसूस हो कि वो रूखसार को छूते छूते रह गया।  बेशक वो रह जाए लेकिन एक शदीद किस्म की छूअन का एहसास हो। संगुफ्ता ने ऊपर कहे पान में जर्दा लगाया। संगुफ्ता, संगुफ्ता यास्मीन जो अभी जाहिद के अचानक दिख जाने के बाद हुस्ना को को...

पेड़ के तने और फुनगी में बहुत विरोधाभास है

किसी टेसन से कोई कोयले वाली गाड़ी छूटने की अंतिम चेतावनी देती है। प्रभाती गाई जा चुकी है। कोई टूटा सा राग याद आता है। पहले मन में गुनगुनाती है फिर आधार लेती हुई मैया शुरू करती है - उम्महूुं, हूं हूं हूं हूं, ला ला ला ला लाला ला ला... अनाचक लय पकड़ में आ जाता है और अबकी दूसरी लाइन से शुरू करती है। 'कि रानी बेटी राज करेगी। महलों का राजा मिला रानी बेटी राज करेगी।' सर्दियों की सुबह है। धूप खिली है। आंगन में खटिया पर मैया अपने अपनी दोनों पैरों को सामने सीधा करके बैठी है। और पैरों पर ही रानी बेटी लेटी है। आंखें में काजल, बाईं तरफ माथे पर काजल का गोल टीका, हाथ-पांव फेंकते, हल्की जुकाम से परेशान, अनमयस्क सी। बीच बीच में मन बहल जाता है तो पैर के अंगूठे को उठा कर मुंह में रख लेती है। सरसों तेल की मालिश हो रही है। मैया बड़े जतन से बहलाती हुई, कभी डांट कर कभी ध्यान बंटा कर मालिश कर रही है। एक हथेली जित्ता पेट, दो अंगुल का माथा, थोड़ा लंबा घुंघराले केश, कुल मिला कर एक गोल तकिए जैसी आकृति, गुल गुल करती, स्पंजी। गुंधे हुए गीले आटे के स्पर्श सी। कभी कभी हैरान होती हुई ...

महज़ छाती भर ही नहीं, ना पसली का पिंजरा ही, अन्दर एक विला है

पूअर काॅन्शनट्रेशन का शिकार हो गए हो तुम। कि जब एक पूरी कविता तुम्हारी सामने खड़ी होती है तो तुम कभी उसके होंठ देखते हो कभी आंखें। डूब कर देख पाने का तुममें वो आत्मविश्वास जाता रहा है। ऐसा नहीं है कि वो अब तुम्हारे सामने झुकती नहीं लेकिन तुमने अपने जिंदगी को ही कुछ इस कदर उलझा और जंजालों के भरा बना लिया है कि उसके उभारों के कटाव को देर तक नहीं पाते। बेशक तुम वही देखने की कामना लिए फिरते हो लेकिन तुम्हारा दिमाग यंत्रवत हो गया है। तालाब में उतरते हो लेकिन डूब नहीं पाते, तुमने झुकना बंद कर दिया है। घुटने मोड़ने से परहेज करते हो और इस यंत्रवत दिमाग में संदर्भों से भरा उदाहरण है जो अब मौलिकता पर काबिज हो रही है। करना तो तुम्हें यह चाहिए कि... छोड़ो मैं क्या बताऊं तुम्हें, तुम्हें खुद यह पता है। पर प्रभु लौटना भी तो इसी जनम में होता है न? आखिर किसी के भटकते रहने की अधिकतम उम्र क्या डिसाइड कर रखी है आपने ? खासकर तब जब सभी सामने से अपने रस्ते जा रहे हों। भले ही वो सभी अच्छे इंसान हैं मगर ऐसा क्यों लगता है कि नए घर में घुसने से ठीक पहले वो मुझे ठेंगा दिखा जाते हैं ? यह क्या होता है ?...

हर कण की मर्ज़ी थी आत्महत्या. यह देर-सवेर सबका अपना-अपना समवेत निर्णय था.

गांव आने के बाद सब कुछ नया नया लग रहा था। नया नया गांव लग रहा था। गांव भी नया-नया ही लग रहा था। नीले आसमान में कहीं कहीं ठहरे हुए उजले बादलों का थक्का तो पुराना था लेकिन उससे रूई की तरह एक-एक टुकड़े का छूटना नया था। ज़मीन सामान्यतः समतल ही थी लेकिन कदमों को ढ़लान लगना नया था। उसमें छिछले भंवर बन चार मुठ्ठी पानी का जमाव का लगना नया था। पेड़ में लगे हुए पत्ते नए लग रहे थे। दोनों तरफ घास लगी हुई पतले से रास्ते पर पगडंडी भी नई लग रही थी। रास्तों से ज़रा सा पैर भटका तो पैर को खेत में आया हुआ पाया। पैर के साथ साथ शरीर भी खेत में आ गया। पैर पहले आया फिर शरीर आया। फिर नएपन का एहसास और ज्यादा आया। रबड़ के पेड़ के पत्ते छूने पर कुछ ऐसे लगे जैसे ये दो चार दिन पेड़ से टूट गिर भी जाएंगे तो बेजान नहीं लगेंगे। मटर की छीमियों के पेट चीरे तो गोल गोल दाने थे। कुछ छोटे छोटे दाने भी थो जो काग़ज़ पर एक मोटे बिन्दु की तरह लगते थे। अब मन भी नया हो आया था। मैं भी अपने आप को नया लग रहा रहा था। जैसे ही इस नएपन का यकीन हुआ तो अचानक यह यकीन खो बैठा। इस संदेह को दूर करने के लिए मन से सहसा इसे बोलने का इरादा क...

कहना खुदा के साथ संगत करना था

पुरानी झील का पानी हवा से इत्तेफाक रख रही थी। छोटी छोटी नावों में बैठे जोड़े हौले हौले पैडल मार रहे थे। मुहाने पर बांस को ज़वान होता पेड़ था। थोड़ी सी हवा लगने पर ही खिलखिला कर हंसा करता। एक डाली लरज कर पानी में गिर आई थी। जब हवा तेज़ चलती पानी से डाॅल्फिन की तरह निकलती और पास के बोट में बैठे जोड़े पर छींटा मार उसका स्वागत करती। बांस का पेड़ उभयचर बन गया था। जैसे मेंढ़क, मगर और कछुआ होता है। जल और ज़मीन दोनों पर रहने वाला। थोड़ा ऊपर अड़हुल का छोटा सा पौधा था। लेकिन कहने भर को छोटा। हुस्न टूट कर बरसा है उस पर। पत्तों से ज्यादा फूल खिले हैं। सुर्ख। हवा तेज़ होती। सब आपस में लड़ने लगते। ऐसा भी लगता जैसे किसी ने चुटकुला सुनाया हो और हँस हँस कर पेट दर्द हो रहा हो। कई बार ऐसा भी लगता एक ही घने पेड़ में ख्वाहिशों भरी कई कई पतंग फंसे हों। गोया पूरा नज़ारा ही ईश्क से फल फूल रहा हो।  और किले के ऊपरी खिड़की पर जहां से पूरा आसमान दिखता है और नीचे से सिर्फ खिड़की देखो तो एक आसमान का एक टुकड़ा दिखता है। एक संगत बैठती है। कुछ हस्सास तो कुछ कद्रदान की मंडली। शायर से पेशकश की जाती है। ...