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दिल एक टिन का जंग खाया कनस्तर था जिसको लोहार हर कुछ दिन पर ठोक-पीट कर मार्केट में फजीहत से चलने लायक बना देता

हम दोनों तैरना नहीं जानते हम दोनों एक दूजे को बचाना चाहते हैं तुम्हें यह झूठा दंभ कि उबार लोगी मुझको मुझे यह गुमां कि प्यार करता रहूंगा तुमको मुझसे रिश्ता जोड़ने में होने वाले संभावित खतरों का ज्ञान था तुम्हें सबसे ज्यादा आत्मविश्वास से तुमने सबसे ज्यादा संशय चुना मैं केवल दो ही चीज़ जानता था  या तो प्यार है या कि नहीं है प्यार...। किसी पनडुब्बी की तरह एक साथ लगाए डुबकी के बाद जहां कहीं भी हम निकले इक सैलाब ही घेरे था। कृपया आप कैमरे की आंख ज़ूम कर के देखें। क्या आपको हिलोरें मारती पानी नहीं दिखतीं, एकदम पास? आपकी आंख (एकवचन) के ठीक सामने? इत्ता सामने कि वो ठीक से नज़र तक नहीं आता। अब लांग शाॅट में देखते हैं तो भी वही पानी। और एक्सट्रा लांग शाॅट में वहीं पानी। कहीं, कोई द्वीप नहीं। अनवरत बस अपनी थकी बांहों की पतवार चलना। धाराएं तेज़ लेकिन विस्तार इस तरह कि जैसे किसी हौद में उपलाया हुआ पानी जिसका कोई आदि अंत नहीं। अभी ठीक, यहीं इसी जगह यहां आकर तुम भूल जाओगे कि इस विशाल, अथाह, अपार जलराशि का उद्गम स्थान कहां है, इसका आदि और अंत क्या है? यह जल का निर्जन प्रदेश है। यहां हरे शैवाल त...

ऐ मलिका-ए-नील !

ऐ मलिका-ए-नील ! ए मलिकाए नील। मैं तेरा फकीर तुझे अपने ही दिल में रखकर घूम रहा हूं दर ब दर। ऐ मलिका-ए-नील। तू इक दरया है, एक पाक दामन, दाग जिसमें सब आके धोते हैं। किनारों के पत्थर पर बैठ कर अपने ऐडि़यों के छाले छुड़ाते हैं। ऐ मलिका-ए- नील, तेरे किनारे ही उगा करती है इश्क की रूहानी फस्लें। तेरी ही घनी जुल्फों के ज़द में बहा करती है एक दूधिया नीला लंबी धार। तेरे ही भंवर में बैठ कर फूटता है कोई चराग।  यों तो तेरे भी देह में भागती हैं कई नीली रगें। ऐ मलिका-नील! जब भी देखा करता हूं तो रंगों से लबरेज़ जादू देख हैरां हुआ करता हूं। दो पुरकशिश कोहसारों के बीच फंसी एक झीनी चादर के दरमियां लरज़ता इक नीम उरियां हुस्न। दूध सा उजला, नील सा नीला और सूर्ख लाल। रोज़ दो चार होना होता है पेशानी पर दो होठों के दाग रखे जाने की हसरत से। ऐ मलिका-ए-नील ! रोज़ ही तेरी उपजाऊ ज़मीं पर हुस्न का उरूज़ लिए खिला रहता है जवान सरसों के फूल। ऐ मलिका-ए- नील रोज़ ही हज़ार राह तमन्नाएं निसार हुआ करती हैं। कहां भूल आया हूं वो गर्क और गुम होने के दिन.... उठा है वो गुबार कि अपने वजूद के पांव उखड़ जाएं, चढ़ा है वो बुखार...

शहनाई की छोटी-छोटी, तीखी धुनें-1

लौटना पहले भी हुआ था जब उसका पीछा करते करते उसके घर पहुंचा था, ग्रिल को पकड के उसे एक मौन आवाज़ दी थी. लड़की तब भी नहीं पलटी थी. करना तो प्यार था, लेकिन शुरुआत दोस्ती से भी हो जाए तो क्या बुरा है. मगर ये कहने में ही चेहरा लाल हो आया. भरे बाज़ार जब हाथ में एक कागज़ ले कर यह कहा तो चेहरे पर की आग से हाथ के कागज़ पिघल गए. हाथ के कागज़ प्यार के ख़त थे लेकिन इस वक्त किसी थर्ड क्लास सिनेमाघर की बेहद सस्ती सी टिकट लग रहे थे जो हथेली के पसीने में ही गल जाते हैं.  सबसे महान प्रेम सबसे सस्ते तरीके से शुरू हो रहा था.  XXXXX उस सदी में पटना की सड़क पर ऑटो हिचकोले खाते हुए चलते. बोरिंग रोड पर के मुहाने पर के रेस्तरां में लड़का पहली बार डेट पर था. टिप से वास्ता ना था लेकिन दोस्त ने बताया था की कुछ पैसे प्लेट में छोड़ देना. बहरहाल दोनों ने आंचलिक भाषा में बात करते हुए विश्व कवियों की भाषा को मात दी. छोड़ना वो कुछ भी नहीं चाहते थे मगर सब छूट रहा था. सीट पर लड़की के कुल्हे की गर्माहट से लेकर, वेटर को दिया गया ऑर्डर तक...  उस सदी का फलता हुआ इतिहास, भूगोल जब अब इतिहास है.  ...

दीवार से टकराकर मछली लौट जाती है

गर्मियों के दौरान स्कूल के मेन गेट पर बाईं तरफ एक खोमचे वाला खड़ा रहता। ब्लू चेक वाले लंुगी और हाफ सूती शर्ट में, बाल बड़े सलीके से झाड़े एक सभ्य, सौम्य बंदा। देखने से लगता शिक्षा अच्छी लिया हुआ अधेड़ युवक लेकिन मजबूरी (बहुत हद तक पैसे की कमी) के कारण आगे पढ़ने से वंचित वो सांवला आदमी जो देखने में बंटी के पापा जैसा लगता, एक सभ्य इंजीनियर जैसा। ये डाॅक्टरों और इंजीनियरों की पर्सनाल्टी क्या पढ़ते-पढ़ते या प्रैक्टिस में ही बन जाती है? खैर... वो एक बड़े आकार वाले डमरू के लकड़ी के स्टैण्ड पर एक चैड़ी सी टेबल लिए खड़ा रहता। क्या-क्या है उसमें ? कागज़ के कुछ मोटे गत्ते। किरासन तेल वाला शीशी जो अंधेरे में डिबिया का काम करता है। कफ सीरप वाली शीशी जिसमें सरसों का तेल है, एक ठोंगे में कटे हुए महीन प्याज, एक बड़ी शराब के बोलत में लाल चटनी जिसके ढ़क्कन पर कांटी से छेद किया हुआ है ताकि जोर दे कर उझलने पर थोड़ा थोड़ा बाहर गिरे। कुछ प्लास्टिक के पारदर्शी डब्बे जिसमें फरही (मूढ़ी), चना, हरी चना, चूरा, बादाम वगैरह रखे हैं। एक पन्नी में आधे आधे कटे हुए नींबू, एक में इमली, एक छोटे डब्बे में लाल मिर्च ...

सूखे लकड़ी चूल्हे में डालती रहना

मुझको देखे बिना करार ना था, एक ऐसा भी दौर गुज़रा है

ठीक है, ठीक है आपने उसका गर्दन चूमा था और खुद को वहीं छोड़ आए हुए चार साल होने हो आए। लेकिन उससे क्या ? इस दौरान अड़तालीस महीने गुज़र चुके, कई मौसम गुज़र गए। आसमान में बादलों ने यहां से वहां तक और मुहल्ले के बच्चों ने इस छोड़ से उस कोने तक रेस लगाई। दुनिया में मंदी आई फिर इससे उबरते हुए फिर से मंदी की कगार पर खड़ी है। कई पड़ोस की लड़कियां भागी और गर्भवती होकर अपने घर को लौट आई। कईयों की रातों रात शादी हो गई। निषेध आज्ञा वाली ज़मीन पर घर उठ गए उनमें किराए लग गए। और आप प्यार का रोना रो रहे हैं ? लानत है आप पर ! छि: आप कहेंगे लेकिन इस दौरान रेलवे ट्रैक पर बारिश होकर बह गई। कितनी ही गाडि़यां अपनी पटरी से उतर गई। दुनिया आखिर फिर से अपने पुराने खेमे में ही है न। लड़की किसी ने किसी से साथ ही है न। गिने हुए विकल्पों में आदमी जी या फिर मर ही तो रहा है न। लोग या तो कुंवारे या शादीशुदा ही तो हैं न। मौसम में जाड़ा, गर्मी, बरसात ही तो आई न और सबसे सबसे बड़ी बात प्यार करने के दौरान आप भी तो होंठ से पैर की उंगलियों तक होते हुए पुनः होंठ पर ही पर ही हो लौटे न। आपने कौन सी नई जगह ईज़ाद कर ली?  ...

गीत हमारे प्यार की दोहराएंगी जवानियाँ

एक एरा जीने का मन होता है। कि जैसे उन्नीस की उम्र में श्री 420 देखे हफ्ता ही हुआ हो और बारिश से रिलेटेड कुछ फिल्मी और कुछ अपनी इल्मी दृश्य गंुथ रहे हों। मन निर्देशक और नायक दोनों हो चला हो। रही पटकथा लेखक की भूमिका तो वो बीत जाने के बाद किसी घोर विरह में निभाई जाएगी (जैसे कि अभी निभाई जा रही है) तो बारिश ऐसी है कि हवा किधर से आ रही है आज अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। पहले अंधड़ उठा, धूप छांव में बदला, फिर अंधेरा में, नारियल और ताड़ के पेड़ बड़े भोंपू की शक्ल में तब्दील हो गए। सड़क पर हवा के गोल गोल डरावने भंवर बनने लगे और लाइब्रेरी जाने के रास्ते में उस भंवर में सिमटते चले गए। लाइब्रेरी में कुछ खास नहीं करना था। कोर्स की किताबों को दरकिनार करते हुए आषाढ़ का एक दिन और धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए दो यादगार प्रेम पत्र लिखने थे। प्रेमिका को इस सदी की सबसे महान और खूबसूरत खोज बताते हुए कुछ मौलिक इन्सीडेंट्स की याद दिलानी थी। परवाहों को किनारे रख कर अमर प्रेम करना था। पत्र में कुछ दृश्य यूं साकार कर देने थे कि लड़की अपना घर बार और हकीकत को भूल बैठे, हमारे पैरों की हवाई चप्पल तलवे पर कैसे घिसती...