Monday, August 29, 2011

शहनाई की छोटी-छोटी, तीखी धुनें-1


लौटना पहले भी हुआ था जब उसका पीछा करते करते उसके घर पहुंचा था, ग्रिल को पकड के उसे एक मौन आवाज़ दी थी. लड़की तब भी नहीं पलटी थी. करना तो प्यार था, लेकिन शुरुआत दोस्ती से भी हो जाए तो क्या बुरा है. मगर ये कहने में ही चेहरा लाल हो आया. भरे बाज़ार जब हाथ में एक कागज़ ले कर यह कहा तो चेहरे पर की आग से हाथ के कागज़ पिघल गए. हाथ के कागज़ प्यार के ख़त थे लेकिन इस वक्त किसी थर्ड क्लास सिनेमाघर की बेहद सस्ती सी टिकट लग रहे थे जो हथेली के पसीने में ही गल जाते हैं. 

सबसे महान प्रेम सबसे सस्ते तरीके से शुरू हो रहा था. 

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उस सदी में पटना की सड़क पर ऑटो हिचकोले खाते हुए चलते. बोरिंग रोड पर के मुहाने पर के रेस्तरां में लड़का पहली बार डेट पर था. टिप से वास्ता ना था लेकिन दोस्त ने बताया था की कुछ पैसे प्लेट में छोड़ देना. बहरहाल दोनों ने आंचलिक भाषा में बात करते हुए विश्व कवियों की भाषा को मात दी. छोड़ना वो कुछ भी नहीं चाहते थे मगर सब छूट रहा था. सीट पर लड़की के कुल्हे की गर्माहट से लेकर, वेटर को दिया गया ऑर्डर तक... 

उस सदी का फलता हुआ इतिहास, भूगोल जब अब इतिहास है. 

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हिचकोले खाते सड़क पर दोनों की वापसी थी. रुढ़िवादी समाज में दिखाए गए साहस और बिताये गए कुछ खुशनुमा पलों के बाद लड़के ने अधिकारवश लड़की का हाथ पकड़ लिया. कहना कुछ नहीं था, कहने को कुछ नहीं था. हवा का एक कतरा कहीं से बह निकला. शैम्पू किये हुए लड़की के दो खुले बाल लड़के के सूखे होंठों से चिपक गए. अब भी कहना कुछ नहीं था फिर भी कहने को कुछ था. उसने कहा - तुम्हे बालों का स्वाद अड़हुल फूल के पराग जैसा है. लड़की झट अपने बालों को खीच यों ही कहती है - तुम लड़के हर वक्त चांस मारने में रहते हो. 

हालांकि अब भी कहना कुछ नहीं था और कहने को कुछ नहीं था.

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लड़की को सलमान खान बहुत पसंद था और पसंद में आग में घी का काम फिल्म - तेरे नाम ने कर डाला था. लड़का उसकी तारीफ़ सुन कर जल उठता. लड़की उस तरह के जूनून भरे प्यार को बहुत पसंद करती. लड़के ने यह तय किया की वो लड़की को सलमान खान से भी ज्यादा पसंदीदा बन कर दिखायेगा. कुछ महीने बाद जब लड़की की शादी हुई तो लड़के के जिस्म  पर बरगद की तरह झुरमुट उग आये थे. पिताजी किसान थे, एक रोज़ उसने सब्जी में डालने वाली कीटनाशक की पूरी बोतल पी गंगा में छलांग लगा दी. पानी कम था वो बच गया. फिर एक दिन उसने अपना सर दीवार पर दे मारा. अभी वो बिना सर के चलता है. 

अंतिम पंक्ति लिखे जाने तक लड़की को सलमान खान पसंद है.

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Thursday, August 25, 2011

दीवार से टकराकर मछली लौट जाती है




गर्मियों के दौरान स्कूल के मेन गेट पर बाईं तरफ एक खोमचे वाला खड़ा रहता। ब्लू चेक वाले लंुगी और हाफ सूती शर्ट में, बाल बड़े सलीके से झाड़े एक सभ्य, सौम्य बंदा। देखने से लगता शिक्षा अच्छी लिया हुआ अधेड़ युवक लेकिन मजबूरी (बहुत हद तक पैसे की कमी) के कारण आगे पढ़ने से वंचित वो सांवला आदमी जो देखने में बंटी के पापा जैसा लगता, एक सभ्य इंजीनियर जैसा। ये डाॅक्टरों और इंजीनियरों की पर्सनाल्टी क्या पढ़ते-पढ़ते या प्रैक्टिस में ही बन जाती है? खैर... वो एक बड़े आकार वाले डमरू के लकड़ी के स्टैण्ड पर एक चैड़ी सी टेबल लिए खड़ा रहता। क्या-क्या है उसमें ?

कागज़ के कुछ मोटे गत्ते। किरासन तेल वाला शीशी जो अंधेरे में डिबिया का काम करता है। कफ सीरप वाली शीशी जिसमें सरसों का तेल है, एक ठोंगे में कटे हुए महीन प्याज, एक बड़ी शराब के बोलत में लाल चटनी जिसके ढ़क्कन पर कांटी से छेद किया हुआ है ताकि जोर दे कर उझलने पर थोड़ा थोड़ा बाहर गिरे। कुछ प्लास्टिक के पारदर्शी डब्बे जिसमें फरही (मूढ़ी), चना, हरी चना, चूरा, बादाम वगैरह रखे हैं। एक पन्नी में आधे आधे कटे हुए नींबू, एक में इमली, एक छोटे डब्बे में लाल मिर्च का पाउडर, तीन छोटे डब्बे में लाइन से कटी हुई हरी मिर्च, लाल-उजली नमक और एक में काला नमक। एक छोटी सी तराजू... उनके पास 25 ग्राम वाला बटखरा नहीं है। है तो एक छोटा सा कजली रंग का पत्थर, वही 25 ग्राम है। पचास ग्राम का बटखरा है। सामने एक अंडा वाला, बगल में एक लाल, पीले, हरे रंग के शर्बत वाला भी लेकिन चाचा के खोमचे वाली दुकान चटपटे भूजे और उनकी निश्चछल हंसी के कारण सबसे ज्यादा चला करती। 

छुटकी चाचा को भीड़ में जब भी भूजा बनाने कहती तो चाचा को उसे दरकिनार करना पड़ता। दो चार बार नोटिस करने के बाद छुटकी ने उसका तोड़ निकाल लिया। अब वो चाचा के एकदम बगल में खड़ी हो जाती और उनका लूंगी खींच खींच कर आॅर्डर किया करती। चाचा लंूगी कस कर बांधते फिर भी डर तो लगा ही रहता। इधर छुटकी ने देखा कि लंूगी खींचने पर चाचा हमेशा चैंक कर उसकी सुनने लगते हैं इसलिए मन ही मन उसने यही करने का सोचा। 
कई बार चाचा कहते कि अभी बहुत भीड़ है तो छुटकी कहती मैं बस याद दिला रही हूं ताकि तुम भीड़ में मुझे भूल ना जाओ। चेहरे पर बहुत बेफिक्री का भाव लाकर कहती - मेरी छुट्टी हो चुकी है और कोई जल्दी नहीं है पर जब भी मेरा नंबर आए मुझे पहले बता देना। छुटकी हमेशा अपना भूजा अपने सामने बनवाती है। चाचा का हाथ कितना भी साफ हो उसकी बारी आते ही हाथ फिर से धोते हैं तौलिए से पोछते हैं। छुटकी अपनी ऐड़ी ऊंचा कर कर के एक एक डब्बे की तरफ इशारा करती है। चाचा वो सब डालते हैं। चाचा जान गए हैं कि छुटकी को भूजा में चूरा पसंद नहीं लेकिन बादाम जरूर चाहिए। फिर भी छुटकी सारे नियम याद कराना अपना फर्ज समझती है। 

फरही कम, बादाम ज्यादा, नींबू एक पूरा आधा, मिर्च का पाउडर आधी चम्मच के थोड़ा ज्यादा, हरी मिर्च तेज़ रखना। प्याज भी मिर्च जितनी और हां मेरे लिए धनिया पत्ता भी डालना। मोटे वाले गत्ते पर देना। पतले पर लाल चटनी से कागज हाथ में ही फटने लगता है। और तराजू नीचे करके दिखाओ। थोड़ा भूजा और डालो। भूजा वाला प्लेट ज्यादा झुकना चाहिए। 

इतने नखरे के बाद जब छुटकी के हाथ भूजा आता तो उसके गाल के गढ्ढे गहरे हो जाते। पैसे देने के बाद वो पहला फांक चाचा के सामने ही मारती। दोनों एक साथ मुस्कुराते कि छुटकी के गाल लाल हो जाते, आंखों में पानी भर आता। गुलाबी गुलाती जीभ बार बार बाहर आने लगती। उसकी कान सुन्न होने लगती। चाचा की बुलंद आवाज़ भी कान पर धीमे-धीमे पहंुचते। छुटकी तिलमिला उठती।

चाचा उसकी हालत पर पिघल कर कहते - जब संभलता नहीं है तो काहे ऐसा शौक पालती हो मुन्नी। आईना देखो जाकर, कईसा मुंह हो गया है। जीभ का ऐसा तेज़ होना अच्छा नहीं। हमारे पास तो पानी भी नहीं। लो पानी लो।
छुटकी सिसकारियां भरती रहतीं। अपने को सांत्वना देती रहती। मुंह में बार बार खूब सारा पानी आता। पानी लेना चाहती लेकिन रूक जाती।

लेकिन यह क्या, थोड़ी देर बाद ही वो फिर से हंसती, आंख अब भी भीगे रहते, होंठ और जीभ छलछलाई हुई रहती, कान भी लाल रहते फिर भी अपने चेहरे पर बहुत सारा आत्मविश्वास लाकर कहती - तुम क्या जानो चचा, ये खाने में कित्ता मज़ा आता है ! अरे कुछ नहीं है पहला फांक जीभ पर लगता है लेकिन असली मज़ा तो तब है जब पानी भी ना लो। मन हरिया जाता है कसम से। कैसा भी मन हो इसको खाओ तो मिजाज बुलंद हो जाए और दुनिया साफ साफ दिखने लगे। 

चाचा और छुटकी दोनों साथ साथ हंसने लगते। छुटकी अपनी समझदारी और खुले बयान पर। चाचा उसके आत्मविश्वास से किए गए कबूलनामे पर। थोड़ा उसकी नादानी और मासूमियत पर भी। हंसी एकाकार हो जाती और एक पल के लिए ग्राहक और दुकानदार का भेद मिट जाता।

छुटकी को और भी बहुत सारी सहूलियत हो गई थी। मसलन खुल्ले पैसे की दिक्कत नहीं रहती उसे। जरूरत पड़ने पर कुछ पैसे चाचा से भी मिल जाते और सबसे बड़ी बात तेल लगे कागज़ के टुकड़े मिलते। इससे छुटकी किसी पर फोटो पर वो कागज़ रख कर उसकी उपरी आकृति हू-ब-हू बना लेती और पूरे क्लास में सबसे अच्छी चित्रकार का दर्जा पा लेती। 
कई बरस गुज़रे... चाचा अब भी उस सरकारी स्कूल के मेन गेट पर खड़े हैं, ग्राहक कई आते हैं पर छुटकी जैसा कोई कहां, लूंगी खींचने वाली, जि़द करके भूजा बनवाने वाली, पानी लेने से इंकार करने वाली और तीखेपन के सरूर में जिंदादिली से बात करने वाली।

आज छुटकी के सामने खुला संसार है और चाचा के पास एक बेहद बंद भूजे की दुकान। कभी कभार बस एक हंसी की याद पर चैंकते चाचां मेन गेट से कमरे तक का रास्ता भी बेहद सूनसान। दरार पड़े, सूखे और कराहते। एक वीरान अंधेरा। 

Tuesday, August 16, 2011

मुझको देखे बिना करार ना था, एक ऐसा भी दौर गुज़रा है




ठीक है, ठीक है आपने उसका गर्दन चूमा था और खुद को वहीं छोड़ आए हुए चार साल होने हो आए। लेकिन उससे क्या ? इस दौरान अड़तालीस महीने गुज़र चुके, कई मौसम गुज़र गए। आसमान में बादलों ने यहां से वहां तक और मुहल्ले के बच्चों ने इस छोड़ से उस कोने तक रेस लगाई। दुनिया में मंदी आई फिर इससे उबरते हुए फिर से मंदी की कगार पर खड़ी है। कई पड़ोस की लड़कियां भागी और गर्भवती होकर अपने घर को लौट आई। कईयों की रातों रात शादी हो गई। निषेध आज्ञा वाली ज़मीन पर घर उठ गए उनमें किराए लग गए। और आप प्यार का रोना रो रहे हैं ? लानत है आप पर ! छि:

आप कहेंगे लेकिन इस दौरान रेलवे ट्रैक पर बारिश होकर बह गई। कितनी ही गाडि़यां अपनी पटरी से उतर गई। दुनिया आखिर फिर से अपने पुराने खेमे में ही है न। लड़की किसी ने किसी से साथ ही है न। गिने हुए विकल्पों में आदमी जी या फिर मर ही तो रहा है न। लोग या तो कुंवारे या शादीशुदा ही तो हैं न। मौसम में जाड़ा, गर्मी, बरसात ही तो आई न और सबसे सबसे बड़ी बात प्यार करने के दौरान आप भी तो होंठ से पैर की उंगलियों तक होते हुए पुनः होंठ पर ही पर ही हो लौटे न। आपने कौन सी नई जगह ईज़ाद कर ली? 

मैं आपकी खुद की तय की गई यात्रा अर्थात् उपलब्ध्यिों पर हैरान होते हैं और आप मेरे दिनचर्या की यात्रा पर ताज्जुब जाहिर करते हैं।

आखिर अपने प्यार को अतीत में घटे हुए प्यार की याद दिलाना क्या लगता है आपको कितना शर्मनाक है यह ? क्या है आखिर में मन में ? उस एवज में कुछ और वसूल करना, अपनी शाम खराब करना या उसी रिश्ते को फिर से शुरू करना?

देखो मियां हर बूंद चाहता है कि वो उन हरे चिकने फलाना पत्तों पर रूका रहे। गोया प्यार करते रहना कभी कोई दुख तो रहा नहीं। अगर आप ऐसे में स्थान विशेष पर ही रूक कर मर जाना या वहीं अपनी कब्र खुदवाना चाहते हैं तो आपसे बड़ा चूतिया कोई नहीं। जिसे चूम रहे हो अब अगर उसकी भी रज़ा पूछो तो यही होगी कि नीचे फिसल कर थोड़ी देर में यह उपक्रम  खत्म करो।

तुमने कभी किसी आदमी को गौर से देखा है आजकल ? सभी इस्तेमालशुदा लगते हैं। वे इस्तेमाल होने और इस्तेमाल करने की आदत से लैस हैं। निहायत खूबसूरत इंसान सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। वहीं बला का बदसूरत आदमी भी बुरी तरह से इस्तेमाल हो रहा है। खैर छोड़ो... तुम अपनी ही बात करो, अगर तुम्हीं से ईमानदारी से पूछ लिया जाए कि सुबह से कहां कहां इस्तेमाल हुए और कितनों पर इसका फंदा डाला तो बगलें झांकने लगोगे।

इसलिए मेरी मानो दोस्त कोई किसी का हमेशा के लिए नहीं है। पल विशेष में कब, कौन, कैसे तुमसे टूट जाएगा कह नहीं सकता। 100 प्रतिशत कुछ नहीं है। कभी वक्त तो कहीं आदमी खुद से उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) की तरह काम ले रहा है। 
हम बाज़ार में होने वाले और कर रहे अनेक सौदे हैं।

Thursday, August 11, 2011

गीत हमारे प्यार की दोहराएंगी जवानियाँ


एक एरा जीने का मन होता है। कि जैसे उन्नीस की उम्र में श्री 420 देखे हफ्ता ही हुआ हो और बारिश से रिलेटेड कुछ फिल्मी और कुछ अपनी इल्मी दृश्य गंुथ रहे हों। मन निर्देशक और नायक दोनों हो चला हो। रही पटकथा लेखक की भूमिका तो वो बीत जाने के बाद किसी घोर विरह में निभाई जाएगी (जैसे कि अभी निभाई जा रही है)

तो बारिश ऐसी है कि हवा किधर से आ रही है आज अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। पहले अंधड़ उठा, धूप छांव में बदला, फिर अंधेरा में, नारियल और ताड़ के पेड़ बड़े भोंपू की शक्ल में तब्दील हो गए। सड़क पर हवा के गोल गोल डरावने भंवर बनने लगे और लाइब्रेरी जाने के रास्ते में उस भंवर में सिमटते चले गए। लाइब्रेरी में कुछ खास नहीं करना था। कोर्स की किताबों को दरकिनार करते हुए आषाढ़ का एक दिन और धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए दो यादगार प्रेम पत्र लिखने थे। प्रेमिका को इस सदी की सबसे महान और खूबसूरत खोज बताते हुए कुछ मौलिक इन्सीडेंट्स की याद दिलानी थी। परवाहों को किनारे रख कर अमर प्रेम करना था। पत्र में कुछ दृश्य यूं साकार कर देने थे कि लड़की अपना घर बार और हकीकत को भूल बैठे, हमारे पैरों की हवाई चप्पल तलवे पर कैसे घिसती जा रही  है यह तो भूले ही साथ ही बाली उमर में मुहब्बत का वो दीया जला दिया जाए कि कोरी चुनरिया पर कोई दूजा रंग ना चढ़े और खुदा ना खास्ता चढ़े भी तो बस आपकी ही याद आए। क्योंकि सुबह सुबह ही किसी प्रेम पुस्तक में यह पढ़ा गया है कि हर मर्द चाहता है कि फलाना औरत उसका पहला प्रेम हो और हर औरत चाहती है कि चिलाना मर्द उसकी आखिरी मुहब्बत हो।

कि अचानक काले बादल घिर आते हैं, एक कचोट उठता है दिल में। सब छोड़ कर बाहर निकल जाते हैं। जाने कहां चलते जा रहे हैं। वही भींगते पेड़, लजरते पत्ते। टप टप गिरती बूंद। एक एक बूंद में प्रतिबिंबित समूची सृष्टि। दिमाग में ढेर सारे फिल्मी सीन। राजकपूर कैसी निश्छल हंसी। कैसी विनम्रता। काहे की चालाकी। मन पर तो सादगी से ही छाया जा सकता है हमेशा के लिए। अबकी मिलेगी तो माफी मांग लूंगा। मिलेगी ? कहां ? कैसे? किस तरह ? हम्म ! वक्त क्या हुआ ? साढ़े बारह में लाइब्रेरी से निकले थे। बहुत अधिक तो पौने दो हो रहे होंगे। उसके स्कूल की छुट्टी हो रही होगी। अभी एम जी रोड से उसकी बस गुजरेगी। दिखेगी क्या ? अगर खिड़की किनारे हो तब? चांस लेने में क्या जाता है। चलते हैं। खिड़की खुली होनी चाहिए बस। मैं तो कैसे भी पहचान लूंगा। वो मुझे देख पाएगी, पहचान सकेगी ? इतनी जल्दी में ? क्या फर्क पड़ता है, मुझे अपने मर्ज का इलाज करना है। यूं मारे मारे फिरते और इस हालत में देखेगी तो उसे दुख ही होगा।

बस गुज़र चुकी है। लड़के को एहसास भर ही हुआ है कि उसने उसे देखा है बस एक क्षण के लिए। निकलना, भींगना, चलना सफल रहा। एक पेड़ के नीचे बैठा है। सिनेमा के कुछ सीन फिर हावी हो जाते हैं। मीनार की छत होगी, अंधेरा होगा बस एक हाथ तक की दूरी तक दिखने जितना प्रकाश होगा। बारिश होगी। ठंड से कांपते हम दोनों होंगे। मुड़ी तुड़ी गीली सिगरेट होगी। थरथराते होंठों से उसको जलाने की कोशिशें होंगी। नीचे हर जगह पर हम कैमरा रख देंगे। क्लोज अप जहां इमोशंस लेगा, लांग शाॅट कविता के रूप में तब्दील हो जाएगी। यादगार सीन हो जाएगा। यही तो है सिनेमा। भोगा हुआ सच और कसक को पर्दे पर उतारना। जो नहीं हो पाया यहां साकार कर देना। और जो हो सकता है अधिकाधिक संभावना को दिखा देना। मरे और बुझे हुए हृदय में भी प्राण फूंक देना। आखिरकार प्रेम का संदेश देना। यही तो है सिनेमा। वाह राजकपूर वाह। तुम्हारे बहाने हम कितना कुछ सीख रहे हैं जान रहे हैं। मैं जानता हूं मुझे ये लड़की नहीं मिलेगा। जिंदगी इतनी भी फिल्मी नहीं लेकिन यह एहसास... ! इसका कोई जोड़ नहीं। प्रेम का कोई नहीं।  
ये शहर जियेगा हमारे प्रेम में. लड़का हिलता है। चिल्ला उठता है - प्रेम का कोई जोड़ नहीं। जैसे किसी ने झकझोर दिया हो। 

अब शब्द नहीं सूझ रहे। जिंदगी भी कैसी होती है न। अचानक मिली खुशी पर चहक उठते हैं और जब बहुत जतन से कुछ पाते हैं तो संतुष्टि दिल में अजगर की तरह पसरती जाती है। नहीं मिलता है तो कहने को कितना कुछ होता है- आंख भर आंसू के साथ ढेर सारी शिकायतें, बेशुमार बेचैनी, खारा समंदर जैसी जुबान, व्यक्तित्व में कसैला व्यवहार। मिल जाए तो बस एक शांत चुप्पी। बहुत अधिक तो खुदा के लिए भी - शुक्रिया।

Wednesday, August 10, 2011

जिंदगी: पृष्ट संख्या __ पैरा संख्या__.




ऐसे ही नहीं बनी जिंदगी। परिशिष्ट मिला कर 159 पृष्ठ। उसी में भूमिका भी। प्रकाशक और अनुवादक की ओर से कहा गया भी। विषयवार क्रम भी। फलाना आॅफसेट छपाई सेंटर, शहादरा, नई दिल्ली वाला पेज भी। इत्ता ही नहीं गुज़रा था जीवन। 159 पृष्ठों जितना। साॅरी 140 पृष्ठों जितना। 

कई बार संभोग के बाद पैदा करने का ख्याल आया था। फिर बहुत कम तो आठ महीने लगे ही होंगे धरती पर आने में। इस दौरान कितने जागते सोते सपने ! प्रसव पीड़ा के बाद हफ्ते दस दिन तक तो मां के शरीर में जान ही नहीं। पीली पड़ गई थी। कैसी बिस्तर पर पड़ी पड़ी थकी रहती थी। फिर भी खुश ? काहे भाई ? तो बगल के पालने में एक संतोष लेटा है। और बहुत सारी संतुष्टि होंठो पर एक ढीली किंतु मुस्कान खींच लाने में सफल हो ही जाती थी। हर बार पालना डोलता तो कतरा कतरा बढ़ना होता। फिर भी यह गौण हो गया। 

एक अरब दुःख सहे तो कुछ एक पैराग्राफ लिखा गया। कई साल गुज़रे तो उसे एक हाइकू में तब्दील कर दिया गया। कुछ अपने लिए जुटा कर रखा गया तो दिलदारी इतनी कि उसे दूसरों को याद करते हुए कुर्बान कर दिया।

जैसे बड़ा लज़ीज़ व्यंजन था। मौर्या लोक पे एक अलग अलग शहरों से कामगार दोस्त एक करवट बदलती शाम मिले थे और दुकान वाले को टाईट ग्रेवी वाली मेनचूरियन बनाने को कहा था। कितने तो प्याज थे, भूने हुए उसमें, चटख रंग था। प्लेट में डालो तो तिरछा करने पर भी धीरे धीरे ग्रेवी लरज़ती थी। बस वही स्वाद था। जिं़दगी थी। बाकी सब नेपत्थ्य से आती आवाजे़। सामने विवेकानंद की आदमकद मूर्ति उसके नीचे लिखा - उठो, जाओ और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो से आंख बचाते हुए, इग्नोर करता। पल पल बढ़ता अवसाद भी था लेकिन धीरे धीरे यह इल्म होने लगा कि अपने ही अंदर एक ड्रम भी है जहां यह जमा होता जाएगा। खेल जो खेला जा रहा था परदे पर बस उसी की अहमियत थी। उसी ने ज्यादा से ज्यादा पृष्ठ लिए।

कुछ देने के लिए जीवन भर प्रयासरत रहता। एक प्रयास यह भी कि देखें इसे कितने लोग पकड़ रहे हैं और लोग इन चीजों को खोज कर इसके पीछे आएं, मेरे पीछे नहीं। थेसिस, शोध-पत्र सब। बस कुछ ही पन्नों में सिमटा हुआ। चाहा जा सकता तो किताब बड़ी हो सकती थी लेकिन यहां भी जीवन का दर्शन वही। बस एक इशारा। सिग्नल पकड़ सकते हो तो पकड़ लो। लापरवाही में एक परवाह। अपने को नकारते हुए एक महान उद्देश्य का ज्ञान।

देखते ही देखते सजल आंखों में एक बांध बनता है और सामने नदी तैयार हो जाती है। सेतु बनाने में व्यस्त कलाकार फिर नहीं रहता। रहती है - 159 पृष्ठों की एक बेहद मामूली किताब। इस कमज़ोर इशारा। जैसा कि एक लेखक ने लिखा है - पत्ते को छुपाने की सबसे अच्छी जगह है जंगल।

शब्द ढ़ाढस दे पाता न रूमाल आंसू पोंछ पाता। 

Tuesday, August 9, 2011

पाषाणकालीन औजार हुआ करता, भिड़ता फिर जा कर घड़े की खास मिट्टी बनता





दृश्य बिल्कुल वैसा ही होता है, रात भर के जागे होते हैं, गोली लगी छाती का उपचार गर्म चाकू से करते हैं, सुबह आठ बजे तक पीठ और सीने को पट्टियों से कस कर बांधते हैं और दस बजे उजली शर्ट पर कस कर टाई बांधकर एक हाथ में बैग लिए दूसरे में घड़ी जो कि सीढि़यों से उतरते हुए पहनी जानी है, पैर पटक कर उतर गए।  पैर पटक कर यों उतरे कि रात भर जिन ख्याल और खुद से बहस में उलझे रहे जो जब किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा तो क्रूर होकर हिंसा पर उतर आए। एकबारगी लगे कि इन्हीं सीढि़यों पर सांप की तरह वो समस्याएं रेंग रही हैं और अगर हम हौले से उतरे तो वो पैर से लिपट जाएगी। ऐसे में बेहतर है उन्हें निर्ममता से कुचलते हुए निकल जाओ। क्योंकि यहां से जो दिन शुरू होता होता है वह आपका नहीं है। 

आप इसे अच्छी तरह अपने दिमाग के अंतिम नसों तक रेंगने दें कि वह किसी और की अमानत है। अब आप बहस करेंगे कि रात भर भी तो किसी न किसी उधेड़बुन और समस्याओं में ही रहा वो समय तो आपका था आपको अपने लिए जीना था वो आपको क्यों नहीं मिला ? जब आप यह दलील रखते हैं तो रतजगे छिपाने के लिए और ताजगी के लिए बनाया गए शेव की आड़ से आपके चेहरे की निरीहता झलकने लगती है और चूंकि आप दिल से महसूसते हुए ऐसी बात कह रहे हैं तो आंखें झुक कर फर्श और दीवार के मिलन स्थल पर इधर उधर दौड़ रही होती है। 

ऐसा लगता है कि अब आपके आंख पर पर वो सारी समस्याएं टंग गई हैं और आप उन समस्याओं को यहां वहां ही सही कहीं व्यवस्थित करना चाहते हैं लेकिन चिकने फर्श और दीवार के बीच कोई जगह नज़र नहीं आती। आपको खोल दिया गया है अलबत्ता अगर आपकी शर्ट उतारी जाए तो पीठ और सीने पर कस कर बांधी गई पट्टी वैसे ही नज़र आएगी। जब सामने वाला आपको घूर कर देख रहा होता है तो चुपके से एक डर समाहित होता है कि कहीं इसे वो पट्टियां दिख तो नहीं रहीं। आप उसका ध्यान भटकाने के लिए बेशुमार बोलने लगते हैं, गति बढ़ जाती है लेकिन यह भूल जाते हैं कि आपकी आवाज़ अब लिजलिजी हो चुकी है और घट रही यंत्रणा की प्रतिक्रिया उसमें प्रविृष्ट कर चुकी है। जो यातना आपने अपने आप को दी है और अब आपकी आवाज़ से रिसने लगा लगा है और अब जबकि आप सामने फर्श और दीवार के मिलन स्थल पर देखते हैं तो वहां कमर भर एक गरिष्ठ दलदल नज़र आता है जो उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। बहस करने वाला कोई मंसूबा लिए चला जाता है और आप उस दलदल को हैरानी से देखने लगते हैं आपको लगता है कि उसमें जंगली सूअर या भालू जैसा कोई विचित्र जानवर है जो लगभग डूबा हुआ है और दलदल में फंसा जूझ रहा है। 

हालांकि दिन का समय है चारों तरफ धूप है किंतु दृश्य घिनौना है, आपको उससे नफरत होने लगती है। आप छै: जैसी कोई अतिघृणास्पद संबोधन उच्चारते हैं और तेज़ी से पलटते हैं कि आपके दिल में प्रेम का हुजूम उठता है। सुनाई देता है कि हज़ारों हजार लोग कोई नारे लगाते हुए आ रहे हैं आप फिर पलटते हैं और आपको उस जंगली सूअर या भालू पर तरस आता है। आप बिना कपड़े उतारे दलदल में कूद उस जानवर को (जो कि अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है) गले लगाना चाहते हैं। बुक्का फाड़ कर रोना चाहते हैं। प्रतिकार करता उस जानवर पर आप रीझ चुके हैं। दरअसल यह दयनीय प्रेम है जो संवेदना से व्यक्त होती है। किसी बच्चे भिखारी पर जब आपको तरस आता है। जैसे हीर रांझा फिल्म में नायिका जब दुनिया को खुदा, खौफ और कयामत का वास्ता देकर अपने नायक को गले लगाती है। यह पे्रम की पराकाष्ठा है। आप जानवर को दलदल से निकाल कर उसके चेहरे को अपने हथेली में भर उसकी आंखों में आंख डाल कर मां बेटे की तरह रोना चाहते हैं। उसे अपने जैसा बना देने का ख्याल आता है। (सच्चाई यह है कि यह ख्याल नहीं आता अपने आप होता जाता है) अब देखिए आप क्या करते हैं -

जानवर के कोहनी, घुटने, माथे के किनारे, हाथ के अंगूठे और पैर की उंगलियों के छोटी उंगलियों पर जो लड़ने के दरम्यान चोट आई है उसे सहलाते हैं। यह ठीक है कि आप पर अगर एक ईंट मारी जाए तो आपका बदन जो कि पहले से किसी प्लास्टिक मशीन से बंधा है, वो भी खुल जाए। ऐसे में आप रोते जाते हैं और अपना सेहत उसे दे देना चाहते हैं। अपने बदन को रगड़ कर निकली गर्मी उसकी चोटों पर रखते हैं। आह ! कैसा सुख। 

आप क्या करने निकले थे, क्या कर रहे हैं और जब वो नहीं मिला तो कोई तीसरी ही घृणित और आंख चुराती हिस्सों में लिथड़े हुए कूड़ेदान में कूड़ा बीनने वाले की तरह अचानक मिले एक बंधी हुई पैकेट पर सारे दुख निसार कर चुके हैं।

अगर विडम्बना ना हो तो देखिएगा कहीं वो उपयोग में ली जा चुकी नैपकिन ना हो। मैं आपके हक़ में यही दुआ करता हूं और समय रहते आपको आगाह करता हूं। इससे ज्यादा मैं आपके लिए और कर भी क्या सकता हूं। 
बहरहाल... अब आप दूसरा, नया पैकेट खोलिए।

Friday, August 5, 2011

लरजता दुपट्टा और बिना संगीत चुम्बक लगा लय पकड़ता, भूलता फिर थिरकता गीत


तुम कोई गीत गाओ। तुम कोई गीत गाओ ना। तुम गाओ ना कोई गीत, प्लीज़। मुझे बहुत बेचैनी हो रही है। शायद बिस्तर पर कराहते ये अंतिम दोपहर हो। मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। बस इतना सा संतोष कि तुम हो आसपास ही कहीं। तुम दिखो भी मत लेकिन बस इतना कि मैं मन लगाने के लिए कोई सिनेमा देखता रहूं तो सीफलएल बल्ब की रोशनी में तुम्हारी परछाई किचन में हरकत करती दिखे। परदेदारी का घर ही हो जाए। हमारा रिश्ता लक्ष्मण सीता सा ही हो जाए कि चेहरा देखे बिना जब भी पैर छूने झूकूं तो पायल की बनावट  से तुम्हें पहचान सकूं। 

इन दिनों आंखों में अदृश्य से आंसू आते हैं। कमी महसूस होते होते यूं भी लगता है कि आंसू चल निकले हों लेकिन हाथ फेरो तो गाल सूखे मिलते हैं। ऐसा भी लगता है कि बड़े से टेबल पर नंगे बदन लिटा कर मेरे छाती पर सुलगते कोयले पर धिपा हुआ आयरन रख दिया गया हो।

एक अरसा हुआ मेरे बदन के कपड़ों ने कल कल बहती पानी की धार नहीं रोकी और जो फुर्सत इन दिनों बगल से होकर निकल जाती है के जिसका चेहरा पहचाना हुआ तो है लेकिन जिसकी आंखों में इन दिनों ऐड़ी उचका कर नहीं झांक पा रहा हूं। ये बिस्तर ही मेरी जान ले लेगी जहां सदियों से बुखार में मैं तप रहा हूं। तुम्हें याद है एक बार तुमने कहा था बुखार में किया गया प्यार अलटीमेट होता है। है तुम्हें याद ? पूरी उमर मैंने इस बुखार में ही प्यार किया है।

आह ! पड़े पड़े ही मैं महसूस कर सकता हूं कि चापाकल के हत्थे पर हौले हौले दबाव पड़ रहा है और उसका वासर घिस कर भी लगातार पानी दे रहा है। मैं उठ नहीं सकता लेकिन मुझे लगता है इस घुन लगे शरीर में ही पूरा आंगन करवटें लेता है। नंगे बच्चे खेलते हैं, बेरोजगार देवर उलाहना सुनता है। सास से बहूओं को फरमान मिलता है कि आज मेले में जाने के लिए वे अपने बालियां ननद को दे दे। पूजा रूम के कमरे की रोशनदान से आती अगरबत्ती की सुगंध क्या खोजने निकला है ? 

इतनी बीमारी के बाद भी शाम होते ही ऐसा क्या है कि मेरा जिस्म रूप, रंग और आकार बदल महकने लगता है और मैं किसी मज़ार पर का सूफी संत हो जाता हूं। इश्क की खंजरी बजती है और अपने जिस्म की अंतिम वसीयत में वैराग्य लिखता हूं। भेष बदल जाता है और खुदा से मिल जाता हूं।

तुम याद आ रही हो, नशे में... । जिसके छोटे अक्षरों में लिखे नाम से कन्फ्यूज्ड लड़की का चेहरा निकलता है। जिसके बाल बरसों से नहीं धोयी गई और कई शक्लों की मिट्टी और धूल से जिसके बाल बरगद की लटों जैसी बन आई है। तुम नंगे पांव तिरते तिरते चल रही हो आंगन आंगन। मैं रिसता रिसता मर रहा हूं अपने में समेटता आंगन। 

मेरे होंठ टेढ़े हो रहे हैं...... तुम छत पर बेख्याली में उल्टे उंगलियों से धोए हुए गेहूं फैलाते हुए कोई गीत गुनगुना उठी हो। 

मैं पीला खेत बन गया हूं और तुम किसान।

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