Tuesday, October 28, 2014

एक बस दिल में अब यही ख्याल आता है



कूथता हूं कराहता रहता हूं
खुद को शरापता रहता हूं
दिल मेरा मुझको लानतें भेजता रहता है
बरामदे में पड़ा किसी बूढ़े सा खांसता रहता है
जबकि ये जानता हूं कि लिख सकना अब बस अपने लिए है
ये एक हस्तमैथुन करने की आदत सी है
दिन निकलते रहते हैं बोझ बढ़ता जाता है 
कोफ्त पलता जाता है खुद पर शक बढ़ता जाता है 
न लिख पाना हस्तमैथुन न कर पाने से भी ज्यादा बड़ी खीझ है

हां, पहले लगता था एक नदी भर रो सकता हूं 
सबका और किसी एक का भी हो सकता हूं
आज लगता है मेरी आंखें एक नदी भर सोख सकती है
एहसास से बालातर हूं
मैं सबसे बेखबर हूं
आज न किसी का रहगुज़र
और न किसी का रहबर हूं

रात आ ही जाती है दिन भी हो ही जाते हैं
कैलेण्डर पर साल महीनों के पन्ने बदल ही जाते हैं
मगर दिल है कि मेरा पत्थर हुआ जाता है
बेग़ैरत, खुदगर्ज और कमतर हुआ जाता है

राह आगे अब न कोई दिखाई देती है
मुझको मेरी ही रूलाई नहीं सुनाई देती है 
वक्त की यह कैसी व्यंजना है
मैं जो भी करना चाहूं कब मना है
पांव बढाता हूं न पीछे खैंच पाता हूं 
अब तो करूं या न करूं ये भी न सोचता हूं
ज़िंदगी उधार की लगती थी तो नियम से चुकाते थे
तलवों में गर्मी उफनती थी गरज कर जोश से गाते थे

शिकायतें किसी से रहीं नहीं क्या करूं
मैं किस लिए जीऊं, मरूं, क्या लड़ूं
उठा था, उठ कर कुछ कदम ही अभी चला था
मैं अपनी पूरी ताकत से दीवार से टकरा गया था
दीवार ने कहां मैंने तो खुद को ही गिराया है
सामने की दुनिया कहां तमाशाबीन है 
मेरे लिए अब खुद उठना तौहीन है 

अब न मरने पर भी जवाल आता है
आंखें अब इस कदर सूनी हैं कि 
हल्की सर्दी की इस सांझ में पहाड़ों के धुंध में मिल जाने को होता है
एक बस दिल में अब यही ख्याल आता है 

Thursday, September 18, 2014

दो कौड़ी के दो ड्राफ्ट ख्याल



हालांकि मुझे रेखागणित में कभी दिलचस्पी नहीं रही लेकिन फिर भी बस्ते में एक कम्पास बॉक्स का रहना लाज़मी था। यह अनुशासन के लिए नहीं था क्योंकि मुझे कभी उसकी फिकर ही नहीं रही अलबत्ता कम्पास बॉक्स के अंदर एक तह मोटे गत्ते का बिछाकर तब के गुप्त कोड, तब के मासूम लव लेटर जिसमें बहुत रोने-रूलाने और कसमों वादों के बाद एक चुम्मी पर आकर बात रूकती थी। और तुर्रा ये कि तब चुंबन के आगे कुछ नहीं जानते थे। सोच नहीं चलती थी। और अब..... चुंबन से आगे ही सोचते हैं। उससे कम सोच नहीं पाते। 
तब कम्पास बस्ते का सबसे कीमती हिस्सा होता था क्योंकि कई बार इसमें नेपाली, भूटानी, बांग्लादेशी टका और सिक्के होते थे जिनका कोई इस्तेमाल नहीं था लेकिन जाने क्या था उस उम्र में कि इसे देखने भर से दिल को तसल्ली मिलती थी। उन करेंसी पर वो अनचीन्हे अक्षर, अपने देश की मुद्रा से अलग तरह के रंग, वे डाक-टिकटें.... उफ्फ वो उम्र जब कोई मुहावरे में कहता था-दिल्ली बहुत दूर है। तो पलटकर पूछ बैठते थे- कितने प्रकाशवर्ष दूर! 

***

मेटरलिस्टिक मैं कभी नहीं रहा। शायद यही वजह है कि शहर में ये चीज़ें मुझे जरूरत के बाद बोझा लगने लगती है। यही कारण है कि अब गांव जाता हूं तो पैर में हवाई चप्पल डालने के बाद बस और कुछ नहीं चाहिए होता है। और राह चलते यह सोचकर मुस्कुराता हूं कि कितनी शांति है न? न कदम कदम पर पर्स की जरूरत और न फोन की घनघनाहट। 

मेटरलिस्टिक आज भी नहीं हूं। आखिर महंगे फोन, कैमरा, गजेट्स लेकर भी क्या खोजते हैं उस पर - आखिरकार आदमी ही न। बिना संपर्कों के तो फोन चाहे एप्पल का हो या ऑरेंज का या टोमैटो का। होगा तो एक डब्बा ही न।

संपर्क साधने के आज इतने तरीके हैं - एसएमएस, ई-मेल, ऑरकुट, वाइबर, लाइन, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, गूगल प्लस, वी चैट, ह्वाट्सऐप। आदमी को आदमी के करीब लाने की कोशिश में बाज़ार बनाते ये तकनीक....। मरते और पत्थर हो रहे दिलों के बीच रोज़ तकनीक का एक नया साफ्टवेयर खड़ा हो जाता है लेकिन प्यार..... प्यार तो शिफ्ट हो रहा है।

मैं गलत हूं तो मुझे सही कीजिए। जिस तरह की दुनिया अब बनती जा रही है आपको नहीं लगता कि आने वाले दिनों में विजुअल्स भी अपनी अहमियत खो देंगे? दृश्य के साथ हो रहे इतने प्रयोग ही तो कहीं हमें कहीं संवेदनहीन नहीं बना रही ? कैमरे के साथ हो रही ऐसी अभ्यस्तता! गोया जिंदगी की हर धड़कन को ही कैमरे पर लाने की कोशिश की जा रही है। हम न जाने क्या देख लेना चाहते हैं। हम न जाने क्या पा लेना चाहते हैं।

कान में हेडफोन लगाकर तेज़ संगीत सुनते हुए अपने सर झटकने में हमें पता नहीं चलता कि मेट्रो में बगल की सीट पर बैठा आदमी अचानक से बेहोश हो गया। कारण तो दूर की बात है। दरअसल उस गीत को सुनते हुए हम ऐसी प्रतिति देना चाहते हैं जैसे हम सबसे ज्यादा अलमस्त, फक्कड़ और बिंदास हैं लेकिन उसकी कई शर्तें हैं। क्या इसे अपने में मगन होना कह सकते हैं? क्या अपने में मगन होने का अर्थ बदल गया है? हम किसी चीज़ में मगन होते हैं, अपने में कहां? हमें इस तरह किसी चीज़ में मगन देखकर हमसे कोई पानी की बोतल चाहकर भी मांगने की जहमत नहीं उठाता। हमने आंखें पढ़ना इतना कम क्यों कर दिया? हम सबको यही संदेश देना चाहते हैं न कि कोई हमसे कोई मदद न मांगे, सभी हमसे दूर रहें? लेकिन हमें जरूरत हो तो सभी उपलब्ध रहे। वरना हमें शिकायत हो जाती है। हम न जाने कहां जा रहे हैं। इस ‘न जाने कहां’ को इन्जॉय कीजिए । 

Thursday, September 4, 2014

Hold to record. Send to release.

बाहर बारिश है। मैं एक रेस्तरां में अपने बॉस के साथ बैठा हूं। मेरे सामने चार लड़कियां बैठी हैं। एक का मेरी नज़रों से संवाद कायम हो चुका है। बॉस ने यह भांप लिया है। इसलिए मुझे अब चार जोड़ी नज़रों को संभालना है। मैं जुकाम में हॉट कॉर्न एंड सॉर सूप पी रहा हूं। उनसे मिलती नज़र अब परिचित होने को है। वो मेरी ओर देख कर गर्दन घुमाती है और अपनी बाकी तीन सहेलियों में घुलने की कोशिश करती है। कई बार रेस्तरां का आकर्षण चाय की प्याली में आया सुगर का वो टुकड़ा होता है तो चाय में थोड़ा घुल कर भी थोड़ा सा बच जाता है। इसके आगे वो घुलने से इंकार कर देता है।

वो अब अपने कपड़े बार बार ठीक कर रही है। कभी कॉलर को खींचती है कभी शर्ट के नीचे का दोनों प्लेट मिलाकर नीचे खींचती है। इससे उसके दोनों ओर के बटनों के बीच की फांक सिल जाती है। हम हल्के परिचय के बाद भी थोड़े असहज हैं। 

बिल आता है। बॉस पे करते हैं। मैं अपनी मोबाइल समेटता हूं। नज़र एक बोसा। आंखों से बाय कहता हूं लेकिन पलकें इसे संभाल लेती हैं। एक आकर्षण का पटाक्षेप होता है। बाहर बारिश अब भी है लेकिन जाने क्या बरस रहा है....

Tuesday, September 2, 2014

वो शहर में है। मैं उसकी गुरुता में....



ये एक अजीब सा दिन है। हैरानी नहीं कि साल के कुछ दिन अजीब से होते हैं। कभी कोप भवन में घुसकर बिला वजह ज़ार-ज़ार रोने का दिन होता है। कभी बिना मतलब यहां वहां घूमने का। कभी सारी नैतिकता अनैतिकताओं का चोला उतारकर किसी के साथ कुछ भी कर लेने का, कभी कूट कर इस तरह मालिश करवाने का कि बदन का रोआं रोआं रूई के फाहे सी हवा में तैरते हुए रूक-रूक कर ज़मीं की तरफ आए। कभी बारिश में गलथ कर भीगने के बाद एकदम जमी हुई शिकंजी पीने का, फिर भी गीले कपड़े पहने रहने का और चिकन सूप छोड़कर आइसक्रीम खाने का। 

आज का दिन अजीब, कुछ अजीब वजहों से है। वो सुबह से ही मेरे शहर में है। एक मीटिंग के सिलसिले में आई हुई। मैं उसके ख्याल में गुम हूं। अब तक टेलीफोन पर एक दिलकश आवाज़ जो कई बार दृश्य में बदली है। जिसकी रूक-रूक कर बोलने में कई बार उसका परेशान होना उभरा है। जिससे मुझे उसके माथे पर पड़ रहे बल का पता चला। कभी मेरी एक चुंबन की इल्तज़ा को जिसने इग्नोर करते हुए अपनी लट झटकी है। कभी किसी बात में जिसकी बहुत लाड़ था। आधी रात किसी लम्हें में कमज़ोर होकर जिसने मेरी बाहों पर अपना सर रखा है। कभी बहुत ठहर ठहर कर, समझा समझा कर जो बोलती है। और कभी कभी तो बोल भी नहीं पाती लेकिन जिसके द्वारा उच्चारित अक्षरों के बीच के अंतराल उसके बोले जाने वाले शब्दों से ज्यादा बोलते हैं। वो जो एक मोम का बदन है, तमाम जज्बातों का शीशा है, वो सुबह से इस शहर में है। 

मैं सोचता हूं कि क्या क्या कुछ कर रही होगी वो। भागकर मेट्रो पकड़ रही होगी। फाइलें संभाल रही होगी। टैक्सी का दरवाज़ा बंद कर रही होगी। किसी कैंटीन में बैठ कर उत्तपम ऑर्डर किया होगा उसने। गाड़ी के शीशे से अगर उसे कोई दिख जाता होगा तो लगता होगा कहीं वो मैं तो नहीं। मेरे चेहरे को याद कर सामने वाले अपरिचित चेहरे में समानता ढूंढ़ने लगती होगी। दिल की धड़कन थोड़ी सी जाग जाती होगी। सोचने लगती होगी अगर इस आदमी की हाईट थोड़ी छोटी कर दी जाए, आंखें गहरी और नशीली हो जाए तो यह सागर हो सकता है। कई बार तो लगता होगा, हो न हो ये वही है, क्या पता इतने दिनों में बदल गया होगा। 

कुछ रिश्ते अपने में इतने उलझाव लेकर आते हैं कि हमें अरसे तक पता नहीं चलता कि आखिर हमें उसका करना क्या है। टेलीफोन पर की कुछ आवाज़ों से रिश्ते भी उसकी तरह हवा में टंगे रहते हैं। ये बेतार रिश्ता है। इसमें कई बार मिलने की इच्छा नहीं होती। और कई बार तो ये दिल होता है हम उसे ऐसी जगह से देखें जहां से वो मुझे न देख पाए। प्रेम के ये दांव पेंच सुखद है।

सारा दिन हम एक ही शहर में यहां वहां भटक रहे हैं। वो सचिवालय में है तो मैं दफ्तर में। अब वो लोधी रोड पर है तो मैं बंगाली मार्केट में। अब वो कनॉट प्लेस आने को है तो मैं निज़ामुद्दीन के रास्ते में हूं। हम दोनों एक ही दिन में चूहे बिल्ली का खेल खेल रहे हैं। 

आज सुबह धूप भी अच्छी खिली थी। बर्फ जैसे सफेद बादलों के पीछे से सूरज चमक रहा था। फिर धूप-छांव का खेल चलने लगा। फिर छांव ही छांव थी। तब बादल ही बादल आए। फिर बारिश ही बारिश हुई। दिल्ली की चमकती हुई सड़कों पर नीम के पत्तों के मार्फत होती बारिश.....

आबे हयात बरस रहा है मियां! आबे-हयात। 

Wednesday, July 2, 2014

कलम का हुस्न





लिखने-पढ़ने संबंधी सामग्री को लेकर मैं ज़रा सीनिकल हूं। हर कुछ दिन पर स्टेशनरी के दुकानों वाली गली के चक्कर लगा आता हूं। हर दुकान में झांक लेता हूं। दुकानदार अब पहचानने लगा है। मेले में एक बच्चा जैसे चकरी, घिरनी, बरफ के रंगीन गोले और लाल शरबत की ओर जैसे आकर्षित होता है वैसे ही मैं स्टेशनरी की दुकान में लटके रंग बिरंगे फ्लैग्स्, मोटे पन्नों वाली डायरी, विभिन्न शेड्स के इंक, कैंची, फाइल कवर, स्टेपलर, रबड़, टैग, पिन, स्केच पेन, हाईलाइटर, प्लास्टिक पिन, मार्कर, ग्लू स्टिक (नॉन टॉक्सिक), स्टिक स्लिप, एच बी पेंसिल, कंपास, लंबे आकार के निब वाली कलम, स्केल, चॉक, डस्टर, बॉल पेन, चित्रकारी में रंग भरने के लिए अलग अलग रंग की शीशी, स्ट्रोक ब्रश, स्टॉम्प, लिफाफे, स्लैम बुक, र्स्पाकल पेन वगैरह की ओर खिंचता हूं। पंखे के नीचे किसी स्पाईलर बाइंडिंग किए हुए स्क्रिप्ट के अमुक अमुक पेज़ पर लगे ये रंगीन फ्लैग जब हवा में फड़फड़ाती है तो लगता है प्यार करने के दौरान अचानक बज उठे किसी फोन के दौरान कोई तरूणी अपने आशिक की कमीज़ के गिरेबान से खेल रही हो। कमीज़ के कॉलरों और बटनों पर उसकी उंगलियों की वो सरसराहट..... काग़ज़ पर रखी तिरछी कलम हो या उस पर दौड़ती कोई पेंसिल जैसे मन के सारी उलझनों का पारा झड़ रहा हो। मन में उमस बनकर घुमड़ रहा ख्याल पूरी तरह पन्नों पर बरस रहा हो जैसे।

निब वाली कलम तो मुझे कोई विरासती एंटीक पीस लगती है जिसे संभाल कर रखा जाना चाहिए। यह वह नायाब मोती है जो सीप के गर्भ को सार्थक करती है। बच्चे की बंद हथेली में अठन्नी जैसी। अलग अलग कोणों से निब पर पड़ता प्रकाश परावर्तन अद्भुत फ्लैश उत्पन्न करते हैं। 

लक्ज़र के रोलर पेन से जब उसकी निब निकल रही होती है तो लगता है स्लो मोश्न में स्टेज पर हुस्नपरी उतर रही हो। मोटे कमर वाली इंक पेन जब बिना ढक्कन मेज़ पर लुढ़की रहती है तो लगता है अल्हड़ मंदाकिनी अपनी जांघें ढकना भूल गई है। इन स्टेशनरी को ध्यान से देखें तो लगता है इनमें जबरदस्त सहचर्य है। इनकी बनावट बताती है कि इन्हें शिद्दत से इस बात का एहसास होता है कि हम दूसरों के लिए बने हैं।

एक स्वीकारोक्ति यह भी है कि किसी कारणवश मेरी हाथ में जब भी किसी और की कलम आई है तो मैं उसकी गुणवत्ता जरूर आंकता हूं। अगर वह कलम जम गई तो मैंने कई बार उसे हथियाने की कोशिश की है। इस मामले में बिल्कुल देहाती औरत हूं जो इस बात पर भरोसा करता है कि चुराई गई कलम से ज्यादा बेहतर लिखाता है। तो जैसा कि कृष्ण कहते थे-फूल और फल की चोरी, चोरी नहीं कहलाती, वैसे ही कलम के गाइब होने को मैं चोरी करने की श्रेणी में नहीं रखता। जैसे किसी से कुछ लिखने तो लो और थोड़े टाइम तक उसे फंसा कर रखो और देना भूल जाओ। सामने वाला अगर इतना ही उस्ताद हो और आपको टोक ही दे तो - ओह्! हां। सॉरी। ये लीजिए। सॉरी। छह शब्द में मामला क्लियर। लेकिन यहां एक बात जो साफ करनी जरूरी है बहुत महंगे कलम पर मेरी नीयत नहीं डोलती। अव्वल तो मेहनत की गाढ़ी कमाई से उसके खरीदे जाने का हमें सम्मान करना चाहिए साथ ही उसे बेचैन करने का मुझे कोई हक़ नहीं। यहां दिल्ली में मैंने कुछ शौकीनों को बहुत महंगी कलम अफोर्ड करते देखा है।

एक बात और बहुत महंगी कलम बस खुद की संतुष्टि के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला उपकरण है। जरूरी नहीं कि उससे आदमी वैसा ही कमाल लिख भी पाता हो। क्योंकि मैंने जाना है कि लाख आपके पास शानदार डायरी और कलम हो लिखने की हूक या बेहतरीन वन लाइनरर्स ट्रेन की टिकट लेने के लिए खड़ी लाइनों में फंसे होने, डाला पर पीली धोती बांधने, गंडक पार करने के दौरान उस पार ठूंके किल्ले के तार खींचने, मंडी में नेनुआ खरीदने के दौरान किसान से हुए नोंकझोंक के बाद के मूड खराब होने, सिनेमा हॉल में डीसी टिकट न मिल पाने के बाद स्पेशल क्लास में बैठने, और ऐसे ही कई मौकों पर सूझते हैं और तब यही बीड़ी के बण्डल पर लिपटे कागज़, सिगरेट की डिब्बी, सिनेमा के टिकट, राशनकार्ड पर निकलते हैं। मेरे एक मित्र ने अपने जीवन की पहली और आखिरी शानदार कविता अपनी प्रेमिका के शादी के कार्ड पर लिखी थी और उस कविता में एक-एक शब्द ईमानदारी से उतर आया था। उसने उस एक कविता में ही अपने अतीत का दाह संस्कार कर डाला था। बहरहाल, हम जैसे लोग जिनके पास बची रह जाती है हर बार बहुत सारी कोर कसर वो लिखने के फील्ड में आ जाते हैं।

हां तो मैं परसों ही उत्सुकतावश स्टेशनरी की दुकान पर गया और रेनांल्ड्स की एक नई चमचमाती कलम खरीद कर लाया हूं जिसकी भरपाई ओवरटाइम करके की जाएगी।

इसी क्रम में मंटो का यह कथन और अमोस ओज़ के उपन्यास का यह अंश उल्लेखनीय है।

Wednesday, June 25, 2014

विदाई का रोना


Symbolic Picture

अंजन दीदी उम्र में मुझसे बहुत बड़ी होते हुए भी मेरी पक्की दोस्त थी। सुपारी खाने की शौकीन थी सो इसके बायस उसके दांतों में कस्से लगे हुए थे। हंसती तो चव्वे में लगे कस्से दिखाई देते। हर दो-चार दिन पर सरौते से एक कटोरी सुपारी काटती। मैं कई बार उससे कहता- एकदम ठकुराइन लगती हो। रौबदार जैसी। मेरी मां और उसमें भाभी-ननद का रिश्ता होने से एक दूसरे से छेड़छाड़ और आंचलिक गालियों का लेन देन होता रहता था। खासकर दीदी जो शुरू से गांव में रहने के कारण खांटी पकी हुई थी। वो मेरी मां को दृश्यात्मकता भरे गालियों से नहला देती। गालियां देने के उस मकाम पर मेरी मां भी उसके आगे नतमस्तक हो जाती। उसकी बेसुरी आवाज़ में वे आंचलिक गालियां और भी भद्दी हो जाती। ये मुझे बड़ा नागवार गुज़रता। एक बार मैंने दीदी से कहा भी कि मेरे पिताजी यानि अपने भैया, दादी के सामने तो तुम गाय बनी रहती हो लेकिन अकेले में ऐसी गंदी गंदी गालियां! उसने अपनी दोनों बांहें मेरे गले में डाल दिया। कुछ पल अपनी लाड़भरी आंखों से मुझे मुस्कुराते हुए घूरा। फिर कहा - शहर में रहने वाले मेरे बहुत पढ़निहार और अच्छे बच्चे! गालियों से उम्र बढ़ती है। सारे संकट टलते हैं। दुर्भाग्य कटते हैं। विपदा का समूल नाश हो जाता है। लेकिन उसके लिए भलमनसाहत चाहिए होती है। उदार होना पड़ता है। यह एक अधिकार भरा प्रेम है जो अपने आप दिल से छलक छलक आता है। बियाह शादी में इसलिए भी गालियों भरे गीत गाए जाते है। यह रिश्तों के मिठास को दर्शाता है। बात मुझे जम गई सो याद रख लिया।

अंजन दीदी की आवाज़ बेसुरी होकर भी बड़ी अलग सी थी। परिवार में शादी के उत्सव पर जब उसे कोई गीत उठाने को कहा जाता तो उसकी फटी हुई आवाज़ पर सब हंसते। औरतों का एक झुंड दरवाज़े के चौखट पर माथे पर पल्लू लिए बारातियों के लिए गाती- 'बहनचोद निकलो हमारे घर से। चावल भी खाया, दाल भी खाया। मिठाई को रखा पॉकिट में।' छोटे छोटे अंतरों वाले इन गानों को यदि विजुवलाइज़ किया जाए तो आदमी गीत रचने वाले गीतकार की तरल बुद्धि पर बलिहारी जाएं। इसी तरह एक गीत ऐसा भी था जिसका अर्थ यह था कि दूल्हा अपने बाप का असली बेटा नहीं है। दरअसल दूल्हे की मां निम्फ्रोमैनियक है। उसे अनैतिक यौन संबंध बनाने का चस्का कुछ इस तरह लग चुका है कि वो गांव के हर आदमी जिसमें सगे-संबंधियों के साथ-साथ, जानवर तक शामिल हैं। इनमें सिर्फ स्त्री संबंधी गालियां नहीं मर्दों के लिए भी गालियां होती। 

दीदी ये गीत अपने खिंचे गले से मगन होकर गाती। सुनने वाले हंसते तो वो भी हंस देती। जबड़े में लगा कस्सा उभरता और मेरी चेतना के एल्बम में उनकी एक तस्वीर क्लिक हो जाती। तब लगता क्या है आदमी! संस्कृतियों के बीच अपनी मौलिक आदतों, स्वभावों, जूनूनों का एटेंडेंस लगाता हुआ एक ज़िंदा किरदार!

आगे चलकर दीदी की भी शादी हुई। कोहबर गाए गए। मगर अपनी विदाई के अवसर पर वह ऐसा दहाड़ मारकर रोई कि सुनने वालों को जैसे सदमा लग जाए। मैं आज तक भूला उस दिन को भूल नहीं पाया हूं। वह बड़ा हृदयविदारक दृश्य था। इस समय रोने की एक विशेष लय होती है जो एक ही तर्ज पर वह किसी चक्की के पाटों की तरह घर्र-घर्र चली जाती थी। तर्ज कुछ यूं था -

अं हं हं हह........ हो बाबू आबे तोरा खाना के एत्ते दुलार से खिलैथों हो 
(पिताजी अब आपको इतने प्यार से खाना कौन खिलाएगा)

अं हं हं हह......... खाय घड़ी पंखा के झुलैथों हो 
(आपके खाते वक्त अब पास में बैठकर पंखा कौन डुलाएगा)

कलप कर रोना और आदत में शुमार बहुत बारीक बातों का साथ में तालमेल था। अंजन दीदी को अक्सर जुकाम रहता था सो ज़रा सा रोने से नाक लाल होकर गीली हो जाती थी। आंखों पर आंसू ढुलके होते मगर इतने सारे क्रियाओं के बीच ताज़ा आंसू गाल पर नहीं लुढ़कते थे। 

विदाई के समय यह रोना सबके लिए था। सबके लिए मतलब सबके लिए। मसलन बारी बारी से गले लगते हुए जब वो किसी दुलारे बच्चे के पास जाती तो उसके लिए-
अं हं हं हह...... नुनू हो स्कूली के टास्क आबे के करैथों हो
(प्यारे बच्चे तुम्हें अब तुम्हारी पाठशाला से मिले होमवर्क कौन कराएगा)

पड़ोस की काकी के पैर भी और गले साथ साथ लगती। पैर शिष्टाचारवश और गले स्नेहवश। और फफक कर कहती -
अं हं हं हह.......काकी हे, केना जीबै आबे हम तोरा बिना......
अं हं हं हह.......के आबे तोरा सुतला में खटिया के नीचा एक लोटा पानी राखथौं.......
अं हं हं हह.......हे काकी हे के हमरो माथा पे तेल ठोकी के चोटी बान्तै हे.....

(काकी, मैं अब तुम्हारे बिना कैसे जीयूंगी? कौन अब तुम्हारे सोते में खटिया के नीचे एक लोटा पानी रखेगा? काकी, दुपहर बाद मेरे माथे पर कौन तेल ठोक कर मेरी चोटी बांधा करेगा.....)

फिर वो नेह में भीगी मेरे गालों पर अपनी नर्म नर्म हलेथी लगाकर कहती- 
अं हं हं हह......... लल्ला रे......हमरा भुली जैभे? भुलिहैं न रे अपनो दीदी के....
(प्यारे, मुझे भूल जाओगे? भगवान के लिए अपनी दीदी को कभी मत भूलनाा। मैं तुम्हारे याद के सहारे ही वहां रहूंगी.....तुम भी मुझे याद रखना)

फिर कान के पास आकर कहती - दोकानदरवा के यहां आबे एक्को पैसा उधार नै छै। चिठ्ठी लिखिहैं बेटा।
(पड़ोसवाली दुकानदार के पास अब कोई उधार बाकी नहीं है। अब वो तुमसे पैसे मांगे तो बता देना। कहीं वो तुम्हें ठगने की कोशिश न करे। समय समय पर मुझे खत लिखना )

इस रोने में रोज़मर्रा की उन आदतों का जिक्र होता जो दिनचर्या का हिस्सा होता और जिसे अब मिस किया जाना था। कई बार लगता ये रोना खुद के लिए नहीं बल्कि सुनने वालों को रूलाने के लिए ज्यादा किया जा रहा है। कितनी देर तक कोई इसे अनसुना कर सकेगा? जहां आपने एक भी पंक्ति पर ध्यान दिया दिल बुरी तरह से डूबने लगता। मजबूत से मजबूत कलेजे वाला भी इसे सुन बिफर पड़ता।
 
इस रोने में एक और खास बात थी। कि जैसे यह सुनियोजित लगता। जैसे इस रस्म में प्रजेंस ऑफ माइंड की बहुत अहमियत लगती। लड़की भावुक होकर सिर्फ बिसूर ही नहीं रही होती है, बल्कि गले लगने के बाद सबके कान के पास कुछ पर्सनल और काम की बातें भी करती जाती है। उसके पास सबके लिए एक खास संदेश होता है। जैसे वह काकी को बताती कि अब तो मैं जा रही हूं। अब मैं यहां की जिम्मेदारी से मुक्त हूं तो मेरे बाद जो भी मेरा काम संभाले उसके लिए वो अलां-अलां चीज़ फलां-फलां जगह रखी हुई है।

इस दौरान उसकी गीली आवाज़ भावुकता और व्यावहारिकता के बीच कहीं झूलता हुई होती। जैसे अलगनी पर से आखिरी कपड़ा जब उतारते हैं तो उसके रस्सी के तनाव में आया विचलन जो धीरे धीरे कंपन में बदलती है। 

देखा जाए तो लगता है, विदाई पर यूं बुक्का फाड़ कर अचानक से रोने का यह हुनर लड़की अचानक से सीख लेती है लेकिन गौर करें तो ये पौध तैयार होती है जब वह लड़की तीसरी कक्षा के आसपास होती है। जब उसकी सीनियर सहेली या दीदी उसे कहती है-चल आज फलाने टोला के चिलाने अंगना में ढिमकाने की विदाई है। और बालों में बिना तेल, कमर पर कोई बच्चा लादे वह लड़की अपनी खोई खोई आंखों से यह दृश्य देखती है। और इस तरह बड़ी होती जाती है। और हंडी में चढ़ी अधहन की तरह समय के साथ पकती रहती है। और अपनी विदाई के दिन फट पड़ती है। और उस ऐन मौके पर इतने दिनों से सकेरी हुई सारी भावनाएं और आदतों की दनादन उल्टी करने लगती है। अंजन भी ऐसे ही बड़ी हुई थी।

मैंने कई साल से अंजन दीदी को कोई खत नहीं लिखा है। आज वो सुबह से याद आ रही है। और उसका रोना मेरे दिल को सिसका रहा है। आज उसके लिए मेरे दिल में गाली आ रही है।

Thursday, June 19, 2014

B. last seen yesterday at 10:22 PM



मैं उसके बारे में जितना सोचती हूं उसकी होती जाती हूं। एक उम्र के बाद खूबसूरती मायने नहीं रखती। पहचान वालों की मुस्कुराहट, मोटे लोगों के किसी खास पर उसकी अपनी खास मौलिक प्रतिक्रिया, फलाने का संशय, चिलाने का चिंताग्रस्त होकर घूमना, मीता का अनजाने में सीटी बजा उठना, किसी काले के आंखों की चमक, किसी गोरे की माथे की सिलवट, गंजे का खिखिलाकर हंसना, बूढ़े की भलमनसाहत दिल को भली लगने लगती है। कुछ के सीने के बाल याद रह जाते हैं, कुछ की बेसुरी आवाज़ भी मन को हांट करती है। कुछ के मेकिंग लव के दौरान बने क्षण याद रह जाते हैं। कुछ के जुबान से निकला शब्द सहलाते हुए से लगते हैं, कुछ की आवाज़ ही आराम दे जाती है। 

मुझे उसके प्यार करने का तरीका बहुत पसंद है। यह सच है कि वह मुझे पसंद करता है लेकिन एक स्त्री होने के नाते जाने अनजाने मेरा सिक्थ सेंस मुझे यह भी इंगित करता है कि उसकी यह चाहना मेरे शरीर के कुछ खास अंगों के प्रति ज्यादा है। वह मेरे गोरे रंग को लेकर अक्सर हैरतजदा रहता है। हम जब मिलते हैं, मेरा मतलब हमारा जब कभी भी बाहर मिलना होता है, कनॉट प्लेस के के एफ सी में, हौज खास के बरिस्ता में, ग्रीन पार्क के कोस्टा कॉफी में मैंनें उसकी आंखों में झांकते हुए कुछ और अनजाने रास्तों की तरफ खुद को ट्रैक से फिसलता पाया है। 

यह अजीब है कि 28 साल बाद भी मैं प्यार के मसलों में उदार हूं। और लगता है अब जैसे यह आदत ही बन गई है। मैं चीजों को वैसा का वैसा नहीं ले पाती जैसा वह कहा या किया गया है। उल्टे यह जरूर लगता है कि मैं उसमें थोड़ी अपनी सोच मिलाकर ग्रहण करती हूं। या कभी कभी जब अपनी स्वभाव के उलट जब जानबूझ कर थोड़ी से अपना विचार रखती हूं, वैसे ही दूसरों की बातों में अंर्तमन में यह अनुमान लगा लेती हूं कि शायद इसका मंतव्य भी कुछ वैसा ही हो। दरअसल प्यार नाम की इस शै को आप बहुत हल्के में नहीं ले सकते। यह कई जगह निशान लगाता हुआ निशाना करता है। या शायद प्यार को हल्के में लेकर ही जिया जा सकता है। कुछ भी हो यह ताउम्र मुझ जैसी लड़की के लिए अपने बालों को संभालते रहने जैसा है। हां इन बालों पर जिसपर आड़े कुछ वक्तों में आपको झल्लाहट भी होती है और कई बार जब किसी उधेड़बुन में हों या आपके बॉयफें्रड के साथ यदि हो रहा फ्लर्ट अपने सीरियस होने के उस मकाम पर पहुंच रहा हो जब उसमें तेज़ सांसों की मिलावट होने की गंध आने लगे, वह आपके हाथों के रोओं को सहलाते हुए, आपकी बांहों की तरफ बढ़ने लगे, उसके होंठ सूखने लगे, इन हरारतों से आप अपना दम साधने लगें और किम्कत्वर्यविमूढ़ता की स्थिति आ जाए। अब इस एकआध को जीयें या उसे यही से धकिया दें कि लड़ाई मन में चलने लगे। वैसे इस तरह के अनुभव के साथ साथ आप पर्टिकुलर इस अनुभव शब्द के बारे में आप क्या सोचते हैं? मुझसे शेयर कीजिएगा। लेकिन मुझे लगता है कि अनुभवों का दोहराव दरअसल अनुभव नहीं होता।

मैं अनालाइज बहुत करने लगती हूं। हां तो मैं कहां थी?। हां तो हमारा जब भी बाहर मिलना होता है। यप। यहीं थी मैं। वह मेरे प्रति ज़रा चौकन्ना रहता है। थोड़ा आगे की तरफ झुका हुआ। मुझे ज्यादा से ज्यादा कंफर्ट फील कराने की आड़ में चिंतित। जूझता हुआ सा। ऐसे वक्तों में हमारी आंखों एक दूसरे से बहुत ज्यादा मिलती है। कई बार मिलती है लेकिन कई बार वह नज़र बचा भी ले जाता है। जैसे उसे इस बात का पता होता है कि मैं उसकी आंखें पढ़ना चाहती हूं। चूहे बिल्ली के इस खेल में मैं मुर्गी की तरह कुट-कुट करते हुए उसे चुग लेती हूं। 

सरेआम उसके कोहनियों के स्पर्श में एक आग्रह है। ऐसा लगा है जैसे वह बंद कमरे में ही खुल सकने को अभिशप्त है। कुछ प्रमी होते हैं ऐसे खासकर दक्षिण पूर्व एशिया में। वे प्रेम में कई स्तरों पर जूझते हैं, यही वजह है कि मैं उन्हें एक सम्मानित प्रेमी नहीं मानती। इसके उलट वे एक डरपोक पिता, कंजूस बेटे और बीवी से चार बच्चों को जनकर भी वे शिखंडी पुरूष होते हैं। वे पूरी जवानी प्रेम करने के बाद अपनी खोल में घुसे चले जाने वाले चूहे होते हैं और तब उन्हें वो दुनिया सुरक्षित लगती है। यह सच है कि इंसान रूप में हम प्रेम करने को बाध्य हैं लेकिन मैं इसे हम स्त्रियों की खूबी मानती हूं कि हम प्रेम कर उन पुरूषों के उलट ज्यादा उदार, ज्यादा साहसी और निडर हो जाती हैं। माफ कीजिए, अगर आप मुझे ऐसे में आवारा समझेंगे तो मैं आपकी इस दयनीय सोच पर 'हुंह' भी नहीं कर सकती। 

वह मुझे रूचता है। मुझे ठीक ठीक याद है। उस दिन वह परतों वाला टी-शर्ट पहने था जिसका गला दो बटन से खुलता था। बिना मीन्यू देखे वह ऑर्डर देकर अपना सर नीचे झुकाए बैठा था। गौर से देखने की शुरूआत दरअसल ऐसे लम्हों में ही होती है जब सामने वाला आपसे अंजान हो। मैंने उस दिन उसके शरीर के खूबसूरती के बारे में महसूस किया। एम सपाट चौड़ा सीना जो उस वक्त और समय के बनिस्पत ज्यादा ही चौड़ा लग रहा था। वो शेव की हुई छाती थी जिसपर हल्के हल्के बाल उग आए थे। मैंने ख्याल किया वे अपने में उमस सेमेटे छाती है। मेरी उंगलियां कसमसाई। मन हुआ उनपर उल्टे हाथ उंगलियां फिराऊं। प्रेम करने का उद्वेग ऐसे ही रूटीन से हटकर अचानक से जगता है। दरअसल नाजो अदा से छूने का मन ऐसे ही कुछ चोर लम्हों में होता है। मेरी सांसे छोटी पड़ने लगी। अपने युवा प्रेमी की इस तरह कामना करने से मेरे ज़हन में उसकी उभरी हुई पिंडलियां, उसके जांघों की मजबूत पकड़, उठी हुई हड्डियां और उसकी गर्म सांसों से मेरा उलझाव उभर आया। पुरूष इस तरह कहां हमारी सेक्सुएलिटी के बारे में सोच पाते हैं! ऐसे अंतरंग पलों में खुद मेरी पीठ में एक तनाव उभर आता है। पीठ के कैनवस पर सर्दियों के दिन लद आते हैं और लगता है दो किस्सापसंद औरतें वहां ऊन कांटा लेकर लगातार फंदों पर फंदे बुनती जा रही है। और तब मेरी पीठ को आंच की जरूरत होती है।

Tuesday, June 17, 2014

'शीर्ष'क आने तक गया थक

नए कमरे की बाथरूम की दीवार पर बहुत सारी बिंदियां सटी हैं। कंधे तक सीमेंट की पुताई की गई उन दीवारों पर बिंदियों की लड़ी अपने लाल होने के बायस ही उभरती प्रतीत होती हैं। बाथरूम की दीवारें नीम नींद में अधमुंदी आंखों से देखती है। जब नल खुलता है और पानी की धार गिरती है तब सीमेंट की पुताई वाली वे दीवारें सौंधी-सौंधी महकती है। दीवार की तन्द्रा टूटती है। वे सारी बिंदियां कमर की ऊंचाई पर चिपके हैं। जब नहाने बैठता हूं तो वे बिंदियां एकदम सामने पड़ती हैं। कई बार नहाना विलंबित कर उन बिंदियों से मूक संवाद करने लग जाता हूं। वे भी मेरी तरह वहां नहाने बैठती होगी। अपने बदन पर पानी डालने डालने तक उसे ये अपने माथे पर से ये बिंदी जल्दबाजी में हटाई होगी। कई बार तो एक दो मग अपने शरीर पर डालने के बाद चेहरे पर हाथ फेरने के क्रम में उसकी उंगलियों से टकराई होगी तब जाकर उसे इसे हटाने की सूझी होगी। ऐसा हर जगह होता है। गांव में चापाकल के पास बैठकर नहाती औरतें पेटीकोट अपने उभारों के ठीक ऊपर बांधने के बाद चुकुमुकु बैठकर चापाकल पर ही बिंदियां साट देती हैं। नदी में डुबकी लगाती औरतें पास के पत्थर पर इसे साट जैसे अपनी हाज़िरी लगा कर भूल जाती हैं।

वहां ये बिंदियां उन अनपढ़ औरतों के भूले कि किए गए हस्ताक्षर हैं। याद रखने की होड़ में उनमें वे छूट गई आदतें हैं जो उन्हें कुछ भला बनाती हैं। खुद की शिनाख्त को भूलवश कुछ यूं छोड़ते क्या उसने कभी यह सोचा होगा कि जिसे मैंने कभी देखा नहीं आज इतवार के इस दोपहर ढ़ले बाथरूम के एकांत में मैं उसके बारे में सोच रहा होऊंगा। यह तय नहीं है कि चार प्याला लगाने के बाद, गीले माथे बिंदियों की संख्या कितनी है, हो सकता है मैं जिस बिंदी को घूर रहा हूं वो एक ही हो लेकिन मुझे बहुत सारी नज़र आ रही हो। 

स्त्रियां अपने होने के निशान को कैसे कैसे छोड़ती हैं! तवे पर अंतिम रोटी सेंक लेने के बाद बंद आंच पर एक चुटकी आटा डाल देने में। रात के खाना होने के बाद भी रोटी वाले डिब्बे में आधी रोटी बचा कर रखने में। कपड़े में मेरी जिंदगी में भी कुठ ऐसी औरतें हैं जो छूटती नहीं। वे किन्हीं न किन्हीं आदतों, स्वभाव की वजह से मन में घर बनाए हुए है। उनकी याद नहाने के बाद भीजे कंधे पर रखी गीले ठंडे एहसास हैं। 

XXX

प्रिय बहार,

सोचकर अच्छा लगता है कि इस घटिया दौर में जब लेखकों और कवियों की साख दांव पर लगी हुई है, जब आमजन की नज़रों में वे एक संदेहास्पद पात्र बने हुए हैं, जब गिनती के कुछ चमकदार चेहरे अतिसाधारण लिख रहे हैं फिर भी तुम्हारा विश्वास उनमें लगातार बना हुआ है। दरअसल हमलोग पलायनवादी स्वभाव के हैं। रंगे हुए सियार। चीज़ों से हमारा लगाव बदलता रहता है। ज्यादातर चीज़ें हम बस मन लगाने के लिए करते हैं। हमारी मातृभाषा में इसे ‘डगरा पर का बैंगन’ बोलते हैं। हिन्दी में कहूं तो जिधर वज़न देखा उधर लुढ़क गए टाइप। तुम्हारी बनावट दूसरी है। जितनी सुंदर तुम हो उतना ही सुंदर सोच और पुख्ता यकीन भी। तुम एक हारे हुए ट्टटू पर दांव लगा रही हो, यह देखकर और भी आश्चर्य होता है। अक्षररूपी ब्रह्म में तुम्हारा विश्वास बना रहे।

Wednesday, June 4, 2014

कोई समझा कर घर ले आए हमको

मैं घर से भागा हुआ वो आदमी हूं जो गुस्से से भागा था। जाते समय के साथ मैं गांव की तरफ और सरकता जा रहा हूं। वहां के रहन सहन सोच पर और हावी होती जा रही है। अपने तरफ की बोली-भाष कान में शहद घोलती है। इस बेरूखी और बनावटी दुनिया में पुकार का सम्बोधन मात्र दिल को झकझोर देता है। जिस दिन वहां से चलने के लिए ट्रेन में बैठता हूं तो एक मायूसी छा जाती है। मन बैठने लगता है। उत्साह मुर्झा जाता है। एक मुर्दानगी छा जाती है। रेलगाड़ी अपने रास्ते पर बढ़ती है और मैं यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि घर छोड़कर ठीक कहां किया? ऐसा क्यों है कि यहीं खुद को पूरा पाता हूं। हम साला लोअर मीडिल क्लास लोगों के लिए समाज में सर्वाइव करना और भी मुश्किल है। बीच के रास्ते ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। ऑटो चला नहीं सकते, कचरा उठा नहीं सकते, पढ़ाई एक बोझ है जिसके लिए मां बाप से पेट काट-काट कर जैसा भी पढ़ाया। अंधविश्वास और प्रगतिशीलता का चंवर डुलाता यह समाज अपने आप ही मुग्ध है। लानत है ऐसे समाज पर जो अब तक पाप-पुण्य और अच्छे बुरे के दलदल में लिथड़े हुए कीड़े की तरह रेंगते हुए विकास के दंभ में जी रहा है। असल में लोअर मीडिल क्लास एक भौंडी सी खुद को परिभाषित करती हुई सी गाली है जो जैसा है उसे मेंटेन रखने के लिए, इज्जत बनाए रखने के लिए जी रही है। 

 कभी कभी लगता है मैं नहीं सक सकता यहां। जबरदस्ती यहां बना हुआ हूं। खुद को साबित करने का जैसे एक दबाव है। ये जगह मेरे लिए नहीं है। मुझमें इतनी ऊर्जा नहीं है। मैं जीत नहीं रहा हूं जिए रहा हूं। मैं ऑफिस में काम करके, मीटिंग अटैंड करके, क्लाइंट की ब्रीफिंग लेकर, बॉस के साथ प्रजेंटेशन करके, रेडियो, टीवी के लिए लिखकर, रिकॉर्डिंग लाइनअप अप करके, वाइस ओवर आर्टिस्ट के साथ उठते बैठते हार रहा हूं। ये पुर्नजन्म भी होता तो कोई बात थी। अपने अतीत की आईडेंटीटी मिटाकर जीना ज्यादा बोझमुक्त रखता। यही सालता है। रोशनी और उम्मीद की तरह हम अपने आज़ादी से जीने के स्वाद को भी चखते हैं और एक बार यदि उसका स्वाद लग गया तो ये उतारे नहीं उतरता। क्यों ख्याल आता है कि हम कौन थे? समय का कैसा फेर है और कैसी प्रगति है कि करियर का सही चलना ही हमारी सफलता का पैमाना बन गय है? एक सुखद बचपन और शानदार किशोरावस्था के बाद प्रेम की विफलता के बाद यह जीवन की असफलता है। मेरे जैसे कई युवा इस रोग को, इस दर्द को, मन की अंधेरी सुरंग में रेंग रहे इस एहसास को जी रहे होंगे। इस पैमाने पर हम खारिज हो चुके लोग हैं। नियति मुझे कल को भले बंबई ले जाए लेकिन मैं रिवर्स गीयर में चलने वाला आदमी हूं। 

जितना मैं घर से दूर रह रहा हूं, घरेलू होता जा रहा हूं। दाल-भात, लिट्टी-चोखा, चूड़ा-आम, सत्तू के अच्छा कुछ भी नहीं लगता। गोबर से लीपे हुए आंगन से ज्यादा साफ और गरिमामयी कुछ नहीं लगता। वहां मैं सुबह के साढे पांचे से शाम के सात बजे तक एक पैर पर खड़े रहते हुए भी नहीं थकता। रात को जल्दी गहरी नींद आती है। आधी जरूरतें घट जाती हैं। खर्चे कम हो जाते हैं। मुंहामुही सबका हालचाल लेते हैं। चेहरे को वहां पढ़ना आसान हो जाता है। वहां की किस्सागोई धड़कती है। 

गांव की आदत मुझपर कुछ इस तरह तारी रहती है कि रात के तीसरे पहर नींद में लगता है कि मैं भागलपुर के बाज़ार में हूं। जहां चिरौता बेचने वाले, मछली खरीदने की गुहार और जल्दी से जल्दी जंक्शन पहुंचाने की अपील जब आपस में गुंथ जाती है। मुझे एक एक आदमी को रोककर बात करने का मन होता है। उसकी बोली भाषा में रम जाने का दिल करता है। जिक्र हो गया तो अब उसी भाषा में लिखने को ऊंगलियां कसमसा रही है- 

-कि हो कहां घॉर भेल्हों?
-तोरे गामों के छिकियै।
-गांव भेल्हों लत्तीपुर, थाना बिहपुर आ जिला भागलपुर।
-देखलिहौं नय पहिनै कभी गामों में अहील्लि पूछलिहौ।
-अच्छा त तोंय गंगा के ई पारो के भेल्हो?
-आंय हो चाहै कि छहो तोंय सब? उन्हरको लोग सनी गंगा के ऊ पार बोलै छय। ई पार और ऊ पार के कि मतलब?
-मतलब त यहै कि एन्हेंय बोलल जाय छै बाप दादा के जुगो से
-यहै?
-तबे कि। 

मैं उसके जैसा बोलना चाहता हूं। मैं अपना सवाल खुद बोलने के बाद उसका उत्तर बन उसके गले से निकलना चाहता हूं। एक गंवई आर्त स्वर, उसका पंक्चुएशन, उस पैनी नज़र का तंज अपनाना चाहता हूं। अक्सर पुआल की खूशबू आती है। गीले भूसे में चोकर मिलने की। लाल साग की जड़ों के साथ मुलायम गीले मिट्टी की। मैं भी अपनी मिट्टी से उखड़ गया हूं बाबा। गांव के बुखार में अक्सर रहता हूं। वह मेरे अंग-अंग तोड़ता रहता है।

कोई समझा कर घर ले आए हमको।

Friday, February 7, 2014

महक सांवला रंग रखती है।


बात 2005 की है। फाल्गुन का ही महीना चल रहा था। खेत में सरसों झूमते थे। धूप नहीं भी होती तो लगता धूप के छाया की हल्की पीली पतली परत की चादर खेत में अपना शामियाना डाले रहती। इन दिनों हवा बावरी होनी शुरू हुई थी। हवा नीम के पेड़ पर उसके पत्तों के झुटपुटे में हमला करती... अंदर समाकर अंधड़ गोल होकर घूमती। एक अंधड़ सा उठता और और फिर उसी में गुम होकर खो जाती। स्वेटर का मौसम खत्म हुआ जाता था। हवा में ताज़गी थी मगर कहीं से भी ठंड नहीं लगती थी।

फिलहाल शाम के पौने सात बजे थे। अंधेरा था। रोशनी के नाम पर करीब बीस मीटर की दूरी पर एक मकान के छज्जे पर लगी चालीस वाट की नियॉन बल्ब का हल्का पीला प्रकाश था। 

महक मेरे सामने कुछ कदमों की दूरी पर आदतन क्रॉस लेग्स की मुद्रा में हल्के तिरछे होकर प्लास्टिक पाइप से बुनी कुर्सी के घेरे में फूल के मानिंद हौले से रखी हुई थी। नारंगी रंग के शॉर्ट कुरते में एक सांवली लड़की जिसका गला वी आकार में कटा हुआ था। हल्के नीले रंग के लांग स्कर्ट में लिपटी.... जब हवा चलती तो जैसे स्कर्ट पूरी तरह उसके पैर से लिपट कर पनाह मांगती..... और तब मुझे उसकी टांगों की लंबाई का सही सही अंदाज़ लग पाता था।
महक को देखते रहने की भूख मुझमें हमेशा से थी। बस मन नहीं भरता था। 

उन दिनों मैं उसे जी भर देखता और वापसी में घर लौटते वक्त देखे और महसूस किए गए उसके रूप के पूरे विवरण को मन ही मन दोहराता था। लेकिन अगली सुबह होते ही वे सारी डिटेल्स जो रटकर याद किए गए थे, भूलने लगता। जो थोड़ी बहुत धंुधली सी याद बनी रहती उस पर भी संदेह होने लगता। इसे मिटाने के लिए उस शाम को फिर मैं उसे नए सिरे से देखना शुरू करता और तब मैं कन्फर्म होना शुरू करता कि महक का रंग सांवला है। इस एक वाक्य को याद रखने के लिए मैंने एक बार सिगरेट के डिबिया पर भी लिख लिया था कि महक सांवला रंग रखती है। लेकिन वे दिन ही कुछ अजीब थे। और घर आकर कई बार उस एक लाइन को अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर, आठवीं में पढ़ने वाले विद्यार्थी की तरह पालथी मार कर पीठ आगे पीछे करता हुआ ज़ोर जो़र से बोलकर रटता था।
उस शाम जब बल्ब की हल्की पीली रोशनी अंधेरे से अपना जंग लड़ रही थी मैंने गौर किया कि उसने कंधे के नीचे उसने कभी बाल बढ़ाए ही नहीं। जब मैंने कहा - सुनो तो तो हल्के से मेरी ओर तिरछी हुई। गले में पड़ी उसकी सिल्वर चेन किसी खास कोण पर आकर चमक उठी। उसकी तत्काल गवाही में मैंने कहा कि बाल तुम्हें उतने ही चाहिए जितने में तुम उसे झटक कर हमपर बिजली गिरा सको। उसने थोड़ा सगह होकर कहा - क्या मतलब ?
मैंने कहा - खेलने की एक लगातार आदत। एक बीच की एक ऐसी कड़ी जो ज्यादा परेशान न करने के नाम पर व्यस्त रखे।

वह खिलखिला कर हंस पड़ी। यह उसकी पहली प्रतिक्रिया थी। अंधेरे में मुझे सिर्फ उसकी हंसी की आवाज़ साफ साफ सुनाई पड़ी। मैं हंसी को महसूस भी कर सका। इसका गवाही भी उसके गले में पड़े चेन ने दी थी जब वो उसकी खिलखिलाहट पर जुगलबंदी करते हुए उसी कोण पर चमकती जा रही थी। 

मगर सच कई तरह के होते हैं। मेरे बोले गए इस सच ने उसे दूसरे तरह से छुआ था। यह कमेंट उसे साज श्रृंगार के हिसाब से चुभा भी था और कहीं गहरे पैठ कर उसे भीतर तक गुदगुदा भी गया था। 

मुझे आभास हुआ कि वह दोबारा से हंसते हुए अबकी अपना सर नीचे की ओर ले गई है और कुछ सेकेंड बाद फिर अपने बालों को समेटते हुए ऊपर उठी है। अबकी उसकी आंखों में ढेर सारी गीली शरारत थी और पकड़ लिए जाने की हंसी। उसने झट अपनी कलाई से हेयर बैंड खोल कर खीझ में मेरे चेहरे पर फेंकी। बैंड मेरे ठुड्डी पर लगी और एक ज़मीन पर एक चक्कर लगाकर लुढ़क गई।

मैंने कहा - मैंने तुम्हें पकड़ लिया है और यह हेयर बैंड मारने वाली घटना बस अपनी झेंप को मिटाने के लिए की गई एक बदले की कार्रवाई है....

उसका कुरता हर जगह से हिलता रहा। वी आकार वाली जगह से, नीचे कोरो के पास से, पीछे कंधे के पास लगे टेलर के चिप्पी के पास से, और उभारों के बीच के खाली जगह से। जाने वो कहां से छूआ गई थी कि मैं उसके पूरे बदन का मोमेंटम महसूस कर पा रहा था। वो हिलती रही थी। ऐसा कई बार रोते हुए भी होता है जब गले से आवाज़ नहीं निकलती मगर पीठ और छाती के सारे तंतु हिलने लगते हैं, हिलते रहते हैं। मैं उसे तब भी पूरी तरह नहीं देख पा रहा था मगर इस समय जब वो अंधेरे में भी सामने थी मुझे अपने कल्पना से काम चलाना पड़ रहा था।

कुछ रिश्ते अपने शिल्प में कविता की तरह होते हैं। सेंसुअस और इंटेस भी मगर अपनी अपनी राह पर कायम, अपनी डिग्निटी बनाए हुए चलते हैं। 

हमारे बातचीत में यही एक दीवार थी कि न उठ कर कभी मेरे पास आई, न मैं उठकर कभी उसके पास ही गया।
एक समझदारी होती है कि उन्हें पता होता है कि केले के चिकने तने वाली उन जवान और सांवली टांगों के बीच हथेली रखकर गर्माहट पाने का मुकाबला और कोई विकल्प नहीं कर सकता।

2014 के इस फाल्गुन में महक को देखने भर की भूख आज भी जागी है और उसकी याद आज कॉफी की दूसरी घूंट गले से नीचे उतारते हुए मनी प्लांट को देखते हुए पर आई है।

.... सहसा कॉफी और उसकी महक सांवली हो गई है।

Thursday, January 30, 2014

फिलहाल सिसकी......

अजीब बात है। आप किसी से कहां तक नाराज़ रहोगे, इस ज़माने में। नारियल का सा तो दिल है आपका। अंदर से श्वेत और कोमल और ऊपर से इगो। ऐसे में गर नाराज़ होते हो तो तुम्हारी मर्जी। हो जाओ। न तुमसे वो राब्ता रखेगा कि तुम अपनी नाराज़गी उस तक पहुंचा सको। न तुम गुस्से के मारे उससे वास्ता रख पा रहे होगे। इससे ज़ाहिर ही न कर सकोगे। तो बहुत दिनों बाद घुमाफिरा कर बात वहीं पहुंचेगी कि तुम्हें मुस्कुराना ही पड़ेगा। कितनी शिकायतें कहां तक पालोगे? लेकिन अपने दिल में कहां से क्या तक सोचते फिरोगे? खाने का निवाला, च्वइंगम जैसा लगेगा और लिथड़ता जाएगा जो कि हलक के नीचे उतरने का नाम  नहीं लेगा। ख्याल आएगा तो पानी का एक बड़ी घूंट लेकर उसे बस जैसे तैसे नीचे धकेल दोगे। पेड़ के पत्तों के गुच्छे के नीचे का अंधेरा अपने मन जैसा लगेगा। बाहर का धुंधला कोहरा कहेगा कि देख मैं तेरे मन का प्रतिबिंब हूं। इस कदर तुम्हारे दिलो दिमाग पर काबिज़ हूं कि कुछ भी साफ नहीं  है। सोच का समंदर दूर, बहुत दूर तक हिलकोरे मारेगा। एक लहर उठेगी और कहेगी - निकाले फेंक उसका ख्याल दिल से। दूसरी कहेगी कि होता है, उसे एक मौका और दे। तीसरी कहेगी, ऐसा पहले भी हो चुका है। चौथी - तूने भी तो फलां के साथ ऐसा ही किया था। पांचवीं -जाने दे, हर घटना अपनी कीमत लेती है। इस रिश्ते को भी आखिर कुछ न कुछ चुकाना ही था। छठी- अब से किसी पर यकीन नहीं करूंगा। सातवीं - लेकिन फिलहाल किसके कंधे पर सर रखकर रोएगा ? तू गुनाह से तौबा भी करता रहेगा और फिर इसी चीज़ को किसी न किसी बहाने न्यौता भी देता रहेगा। हाथ में कोई पेंसिल होगी तो एक ही लकीर पर उसे घिसते घिसते लकीर मोटी कर देगा। मुंह में कोई सुपारी होगी तो उसे महीन दर महीन पीसता चला जाएगा। नौवां ख्याल पूरे वारदात को फिर से नए सिरे से सोचने को कहेगा। तू उस पर इस बार थोड़ा सजग होकर अमल करेगा। अबकी संवाद ज़रा ज्यादा संभले हुए होंगे। नपे-तुले होंगे। लेकिन कुछ दूर जाने के बाद फिर एक ज़ोरदार लहर उठेगी। खुद को ठगे जाने का ख्याल पहले से ज्यादा कड़वा बनकर इस कदर हावी होगा कि सोचेगा ज़िंदगी जैसे सबको मज़े देने वाली वेश्या हो गई है। हालांकि वेश्याओं का तेरे मन में बड़ा सम्मान होगा लेकिन जिस तरह लोग उसे बरतते हैं अपना हाल भी कुछ वैसा ही है। कोई भाववश मीठे बोलों का मरहम रख अपना मतलब निकाल ले जाता है, कोई मसखरी कर जांघों पर जली हुई सिगरेट बुझाता है। दसवीं कहेगा - अबकी तेरे पास जो आए तो.... दसवीं (ए) उसके मुंह पर थूक देना। दसवीं (बी) - उसके मुंह पर एक मुक्का जड़ देना। दसवीं (सी) - उसे बुरी तरह इग्नोर कर देना और फिर उसकी प्रतिक्रिया देखना। दसवीं (डी) - उसे कुछ मत कहना। एक शब्द भी नहीं। बस चुपचाप रहना। चूंकि ये सारी चीज़ें इस तरह से खत्म नहीं होती है इसलिए विकल्प डी। फिर क्या होगा? फिर वो कहेगा कि क्या बात है? तुम - (अति उत्साह से, ध्यान तोड़ते हुए) नहीं.....। नहीं तो। वो एक घुन्नापन ओढ़ लेगा और तुम्हें देखता रहेगा। तुम्हारे सब्र का बांध टूटता जाएगा। तुम भूलते जाओगे कि तुम्हें चुप रहना था। तुम्हें इस बात पर गुस्सा आता रहेगा कि वो इतना शांत कैसे है? लेकिन इस नाटक में वो नेचुरल रहेगा। जबकि तुम अतिरेक जोश में तमाम कसमों और तौबा के बाद भी कोई बात नहीं है को साबित करने में ऐसे उपक्रम करोगे कि ऊन का खुल कर लुढ़कता हुआ गोला बनते जाओगे। फिर न संभलने वाले जज्बात का ऐसा सैलाब जिसे बांधा नहीं जा सकता। हो सकता है कि तुम्हारे सब्र का यह बांध भी टूट जाए और तुम आखिरकार रो ही पड़ो..... लेकिन तुमने यह तो नहीं चाहा था। तुम अभी वर्तमान में इतने गुम हो कि सोच नहीं पा रहे कि तुम्हारी एक बार फिर से हार हो चुकी है। और उसकी जीत। हालांकि यह अभी परिभाषित नहीं है लेकिन इस तरह के कुछेक घटनाओं के दोहराव से यह साबित हो जाता है तुम्हें उसकी जरूरत है और आगे भी होगी लेकिन यह उसकी मर्जी और फुरसत होगी कि वह तुम्हारी पीठ थपथपाकर चुप कराने को उपलब्ध है या नहीं।

(फिलहाल सिसकी.......)

Monday, January 20, 2014

नदी में बंसी डालकर हमारे हौसले न तौलो

मैं बूढ़ा हो रहा हूं। इस बात की तसदीक कई लोगों ने की है। शायद अब ऊंचा सुनने लगा हूं। आज सुबह से सीने में बायीं तरफ दर्द हो रहा है। कृषि वसंत के स्पोट्स जो मैंने लिखे हैं, इसके लैवेंजेस की आज रिकॉर्डिंग हो रही है। स्क्रिप्ट अनुवाद करने वाले वाइस ओवर आर्टिस्ट तरह तरह के शब्दों को समझने के लिए मेरे पास आ रहे हैं। मैं डर जाता हूं। इतनी जिम्मेदारी से कभी काम नहीं किया और ये सब आखिरकार ब्रॉडकास्ट और टेलीकास्ट का मामला है। मैं गुमनाम होकर काम करने में यकीन करता हूं। एक मास्टर स्पाॅट लिख दिया, उसके पैसे मिल जाएं, बस।

 लेकिन ये गली आगे जाकर चैड़ी होती जाती है तब होंठ सूखने लगते हैं। जिम्मेदारी से भागने वालों में से हूं इसलिए इन सब कामों की जवाबदेही अपने ऊपर नहीं लेना चाहता। इससे उम्मीदें बढ़ती हैं और उन्हें पूरा करने में लग जाता हूं। सबकी आंखों का तारा बन जाता हूं। लोग मुझमें एक नया रूप देखने लगते हैं। तब लगता है वे मुझे रि-डिस्कवर कर रहे हैं। उनकी आंखों में अपने लिए एक इज्ज़त, खुद को लेकर एक हैरत अंदाज देखने लगता हूं। फिर एक दौर ऐसा भी आता है जब एक निहायत छोटी मगर बड़ी गलती कर जाता हूं..... और इस तरह खुद को एक बेहद सामान्य आदमी परिभाषित करता हूं। मगर तब तक देर, बहुत देर जाती है।

जब काम अपू्रव होता है तो लगता है शायद मुझे यही करना था। कई बार लगता है कि ये मेरा फील्ड नहीं था मैं इस पेशे में धकेल दिया गया हूं। एरिया के सर्किल इंस्पेक्टर की तरह या फिर टैक्स का काम करने वाले जूनियर एडवोकेट की तरह जहां एक समय के बाद यह तय करने की सुध नहीं रहती कि क्या कहां से आ रहा है। बस एक मकसद किसी को खाली हाथ मत लौटने दो। 


मन में इतनी बातें जमा हो जाती हैं कि कई बार छाती लहरने लगता है। एक समतल, धिप रहा इस्त्री लगता है कई बार लगता है उस पर पहना गया शर्ट उसकी आंच जल उठा है। जब कभी कुछ कहीं, मन की लिखने लगता हूं तो जैसे दृश्यों की उल्टी करने लगता हूं। मेरे कुछ बचपन के दोस्त कहते हैं कि मेरी जवानी आई ही नहीं, बचपन के बाद मैं बूढ़ा हो गया। मगर मैं जानता हूं कि मेरी बुढ़ापे की उम्र लंबी है। यह सब लिखते हुए पीठ पूरी तरह पसीने से भीग गई है और किसी बूढी औरत की कमर का दर्द बनकर नीचे उतरने लगी है। 


प्यार में कैसे कोई बर्बाद होता है किसी को उसकी केस स्टडी करनी हो तो मैं उसका नायाब नमूना हूं।
उसके सिग्नेचर में एक अक्षर मेरा भी है। मेरी जिंदगी का वॉलपेपर भी वो और स्क्रीनसेवर भी। इस इतवार तीन फिल्में देखी। एक रूका हुआ फैसला, आई एम और देर रात विमल राय वाली देवदास। फिल्म पर कहने को बहुत कुछ है मगर क्यों मुझे उदासी इतनी खींचती, क्यों मैं तेज़ी से गर्त में जाने की महारथ रखता हूं, क्यों तकलीफ, हर सुख पर अंत में भारी पड़ जाता है, क्यों हर सफलता पर कैमरे की फ्लैश और कचाक होती है मगर असफलताओं पर कोई बाइट नहीं होती? 

बहरहाल आसमान अब भी नीला है जिसमें उड़ते हुए पतंग पर चील भी गोते मार रहा है। जिंदगी जा रही है और हमारा इस पर कोई वश नहीं है। फिलहाल प्रेम और उसका लक्ष्य क्या है? तो अर्जुन का अचूक निशाना जिसके विष बुझे तीर आपके मछली जैसे हृदय की आंख में धंसने पर डिजोल्व हो जाता है और इसके बाद आप जो कहते रहे हैं वो मुझे सुनाई नहीं देता। 

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