Monday, May 31, 2010

चिरनिद्रा


फोन पर जब वो हाय सागर बोलती तो दोनों तरफ कुछ मिलावट सी होने लगती... उसकी आवाज़ में मेरे नाम का अर्थ घुल जाता... मंथर सी चाल होती और होते गहरे भाव... गर उस वक्त सिर्फ इन दो शब्दों का आडियो ग्राफ खींचा जाए तो एक सरल रेखा भर उभरे, इतनी संयत जैसे लता मंगेशकर का रियाज़, आधी नदी के बाद का स्वच्छ पानी, पीली रौशनी में गुसलखाने में रखा पहला कदम,

इन शब्दों से लगता मेरे जिस्म के शराब में किसी ने बर्फ का टुकड़ा डाला है, वही बर्फ पहले सीधे अंदर जा कर पैठी है फिर उठकर ऊपर आती है और तैरने लगती है. मैं आँखें बंद कर उसकी आवाज़ से गुज़रता तो अपने को एक अँधेरी गुफा में पाता जहां मेरे ही शरीर की झिल्लियों की तस्वीर लगी है और कोई इंस्ट्रक्टर फलाने- फलाने जगह पेन्सिल की नोंक रख बता रहा हो कि बाबू! मुश्किल है .... तभी मेरे पार्श्व में ऐसा संगीत बजता जैसा राजेश खन्ना को लिम्फोसर्कोमा जैसी कोई संगीन बिमारी बताने पर बजता है....

जब मैं उसे बताता कि लोग मेरे साथ बड़े दयनीयता से पेश आते हैं तो मेरा निशाना लोग नहीं बल्कि वही हुआ करती... उससे बात करते-करते मुझे माइग्रेन से दोस्ती हो गई है. मैं उससे बताना चाहता हूँ कि माइग्रेन अब सिर्फ दर्द नहीं देता... मेरे जिस्म से सूरज निकलता है और सांझ बन डूबने लगता है... मैं निर्विकार उसे डूबते देखता हूँ ... मेरी प्यारी अठ्ठनी खो गयी है  दरअसल इस उम्र में भी मैं झूठ बोलते पकड़ा जाता हूँ तो नज़र ऐसे ही चुराता हूँ.

वो पूछती कि दिल्ली का हाल क्या है (पर मैं सोचता कि दिल से सीधे दिल्ली का सफर इतना करीब तो नहीं, लोग कैसे इतनी जल्दी में इतना सफर तय कर लेते हैं) तो मैं उसे बताता हूँ कि दिल्ली अपने में मस्त है, इस साल कॉमन वेल्थ गेम होने वाला है, वो चहक उठती है...

मैं उसे बताता हूँ कि यह कॉमन लोगों की वेल्थ (धन) का खेल है और अबकी महारानी एलिजाबेथ बहुत व्यस्त रहने के कारण नहीं आएँगी बल्कि राजकुमार चार्ल्स आयेंगे, जिससे तारीफ के शब्द सुनकर बिपाशा बसु थिरक उठी थी. रानी मुखर्जी ने राजकुमार चार्ल्स से मिलने के लिए मंहगी जूलरी और कपडे ख़रीदे थे और उससे मिलने को अपना सौभाग्य माना था.... जो कुछ साल पहले इंडिया आये थे और जलियांवाला बाग हत्याकांड में शहीद होने वालों को शहीद मानने से इनकार कर दिया था... हाँ तो दिल्ली और सेंसेक्स की उछाल में धंसा पूरा भारत मस्त है.

वो कहती है तुम्हारी जुबान बहुत कड़वी है, तुम निगेटिव सोच के आदमी हो और ये बता कर मेरी सोच को बदलने की सलाह देती है...

मैंने हेलो-हेलो का बहाना करता हुआ फोन काट देता हूँ... ताकि बात फिर हाय सागर से शुरू हो सके और मैं उससे इस बार कह सकूँ कि मैं तुम्हें (जिंदगी को) एक पूरा दिन स्मूच करना चाहता हूँ ताकि मेरी जबां मीठी हो सके, उस दिन मुझे शराब पीने की जरुरत ना हो और किसी खुले पार्क की छिटकी धूप में अपने माइग्रेन रूपी दोस्त को सहलाते हुए मैं हमेशा के लिए सो सकूँ. चिरनिद्रा.

Wednesday, May 26, 2010

जन-गण मंगल दायक जय हे


सुबह के साढ़े आठ बज रहे है. सुनहरी धूप खिली है. मध्धम हवा चल रही है, सड़के जैसे धुली हुई हैं. हर तरफ चहल-पहल है. लगता है कुछ होने वाला है जिसके लिए सब उत्साहित हैं. हमारे जैसे बच्चे तो रात भर सोये भी नही. यही लगता रहा अभी ज़रा एक देर में सुबह हो जायेगी पर कैसी होगी सुबह ! क्या शमशेर बहादुर के कविता जैसी लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने  या फिर...  नहीं उस वक्त मंटो के कहानी कतई याद नहीं आई कि आज़ादी के बाद भी सब कुछ वैसे का वैसा था. पेड़ वहीँ खड़े थे, आदमी भी वही थे और हालत भी वही थे... सच्ची, कतई ऐसा कुछ ख्याल नहीं था... कसम से.

मैं बड़ी हसरत से तकता हूँ तिरंगा, देखता हूँ आसमान, राष्ट्रगान जब आरोह-अवरोह में बज रहा होता है तो पुलकित होता हूँ, ठिठक जाता हूँ, मोहित होता हूँ, हर्षित होता हूँ और भाव-विहोर हो जाता हूँ. और जब बैंड जन-गण मंगल दायक जय हे की ऊँची छलांग लगाता है; तभी आकाश में तीन लड़ाकू विमान केसरिया, उजला और हरे रंगों का धुंआ छोड़ते हुए तिरंगे पर फूल बरसता हुआ गुज़रता है, तभी  हर बच्चा अपने कोरे दिल पर पहली बार हिंदुस्तान लिखता है. यह उसका पहला प्यार होता है.

मैं बड़ी उत्सुकता से पूछता हूँ  पापा वो कौन थे... मेरी आँखों के दिए लहलहा उठे हैं...

पायलट पिता बड़े हैं  इसलिए जवाब छोटा है.

मैं भी पायलट बनूँगा .... मेरी आवाज़ में उत्साह ज्यादा है.

जरुर बनो ...

अचानक मेरी आँखें डबडबा जाती हैं. लगता है कुछ और भी शामिल गया है अब इनमें... शायद पिताजी ने अदृश्य पाइपलाइन के सहारे मेरी आँखों में वही सपना डाल दिया हो...

थोड़ी देर बाद तिरंगा खम्बे में उलझ जाता है. वो लहराना चाहता है पर कोई बंदिश है वहाँ. कोई सिरा उसे फहरने से रोक रहा है. मैं बड़ी देर से इसे देख रहा हूँ और चाहता हूँ कि तिरंगा फिर से लहरा उठे... मेरी इस अवस्था को पिता जी ताड़ लेते हैं. पिता की नज़र अपने बच्चे पर ही लगी रहती है.

तिरंगे को एक सेल्यूट तो दो अपने आप फहराने लगेगा उन दिनों पिताजी की बातों पर बड़ा विश्वास था. पत्थर की लकीर. मैं एक जोरदार सेल्यूट मारता हूँ, तिरंगा सौ गुने उर्जा से आनंदातिरेक हो कर लहरा उठता है. मैं चेहरे पर संतुष्टि भरी मुस्कान आती है. उनकी बातें कितनी सच्ची होती हैं.

मैं बड़ा होता हूँ.

एक बड़े वर्ग के लिए उन्ही दिनों धूमिल लिख रहे थे क्या आज़ादी सिर्फ थके हुए तीन रंगों का नाम है जिसे एक पहिया खींचता है.

"हम भारतीय आकाश के संरक्षक बोल रहे हैं". स्क्वाड्रन लीडर जब यह गर्जना करता है तो मैं पीछे भीड़ को देखता हूँ. दोपहर की चिलचिलाती धूप में भी सबके रोयें बबूल के काँटों में तब्दील हो गए. जाँघों की हड्डियां सख्त हो गयी और रीढ़ की हड्डी सीधी हो गयी. सिर्फ इतना ही नहीं हुआ अब तक जो वेतन, कैंट से सस्ते सामानों का लालच, विशेष सुविधाएँ, लोगों पर पड़ने वाला रूआब आदि का हिसाब-किताब लगा रहे उम्मीदवार एक पल के लिए यह सब भूल जाते हैं. गोया देशभक्ति ऐसी ही चीज़ होती है.

यह सच है कि मैं पायलट नहीं बन पाया और अब यह सपना मैंने अपने बेटे की आँखों में उसी अदृश्य पाइपलाइन से ट्रांसफर कर दिया है. सपने बचे हुए हैं अभी.

अभी वो तुतला कर बोलता है. मैं आजकल उसकी आवाज़ इस शेर से साफ़ करा रहा हूँ

हर चीज़ कुर्बान है इश्क की खातिर,  पर,
मादर-ए-वतन के लिए सौ इश्क भी कुर्बान है

और देखता हूँ कि इससे उसकी जबान वैसे ही साफ़ होती है जैसे भगत सिंह अपनी बन्दूक की नली साफ़ करते थे.

...और ऐसा करते हुए मैं भगत सिंह से कहता हूँ कि हम आपके मुल्क से बेइन्तहां मुहब्बत करते हैं.

Monday, May 24, 2010

व्यावसायिक सिनेमा

  
स्वतंत्रता आंदोलन के दौड में फिल्मकारों ने भी अपने-अपने स्तर पर इस आंदोलन को समर्थन देने का प्रयास किया. तब तक देश में सिने दर्शकों का एक परिपक्व वर्ग तैयार हो चुका था. मनोरंजन और संगीत प्रधान फिल्मों के उस दौड में भी देशभक्ति पूर्ण सार्थक फिल्में बनीं.
           
            स्वतंत्रता के ठीक बाद फिल्मकारों की एक नयी पीढ़ी सामने आई. इसमें राजकपूर, गुरुदत्त, देवानंद, चेतन आनंद एक तरफ तो थे वी. शांताराम, विमल राय, सत्यजीत राय, मृणाल सेन और हृषिकेश मुखर्जी, गुलज़ार और दूसरे फिल्मकारों का अपना नजरिया था. चेतन आनंद की नीचा नगर, सत्यजीत राय की पथेर पांचाली और राजकपूर की आवारा जैसी फिल्मों की मार्फ़त अलग-अलग धाराएँ भारतीय सिनेमा को समृद्ध  करती रहीं. बंगाल का सिनेमा यथार्थ की धरती पर खड़ा था तो मुंबई और मद्रास का सीधे मनोरंजन प्रधान था. बॉक्स ऑफिस की सफलता मुंबई के फिल्मकारों का पहला ध्येय बना और इसी फेर में उन्होंने सपनों का एक नया संसार रच डाला. मनोरंजन प्रधान फिल्मों को व्यावसायिक सिनेमा के श्रेणी में रखा गया.

            एक दीर्घकालीन संघर्ष के बाद स्वतन्त्रता के अभ्युदय से भारतीय अस्मिता और सृजनशीलता को एक नयी शक्ति मिली और उसकी अभिव्यक्ति के नए आयाम खुले. फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कल्पनाशील फिल्मकारों की एक नयी पक्ति सामने आई. इस दौड की ज़्यादातर फिल्मों की विषय-वस्तु हालाँकि पलायनवादी थी मगर उनमें मनोरंजन का तत्व इतना अधिक था कि लोगों ने उन्हें बेहद पसंद किया. रोमांटिक और पारिवारिक कथावस्तु वाली फ़िल्में इस दौड में में खूब बनीं. खवाजा अहमद अब्बास ने परदेसी, शहर और सपना, दो बूंद पानी तथा सात हिन्दुस्तानी जैसी फिल्में बनाकर अपनी एक अलग जगह बनाई. चेतन आनंद की नीचा नगर पहले ही चर्चित हो चुकी थी. उनके भाई विजय आनंद और देव आनंद ने अपनी फिल्म निर्माण संस्था खोली तथा गाइड समेत कई उम्दा फिल्में बनाई. राजकपूर ने सामाजिक सरोकारों से युक्त आग, आवारा, श्री चार सौ बीस और जिस देश में गंगा बहती है जैसी फिल्मों के जरिये रंगीन सपनों का एक अद्भुत संसार रचा. सिनेमा इंडस्ट्री ने राजकपूर को ग्रेट शो मैन के खिताब से नवाजा. पचास के दशक में भी बी. आर. चोपड़ा, हृषिकेश मुखर्जी, मोहन सहगल, गुरुदत्त और सत्येन बोस जैसे फिल्मकारों ने कुछ उल्लेखनीय फिल्में बनायीं.

            भारतीय सिनेमा के एक दौड में कपितय ऐसे फिल्मकार भी उभरे, जो भव्य पैमाने पर फिल्में बनाने के अभ्यस्त थे. के. आसिफ और कमाल अमरोही की गिनती इसी कोटि के फिल्मकारों में होती है. के. आसिफ के मुग़ल-ए-आज़म भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के समान याद की जाती है. कमाल अमरोही की पाकीज़ा सेल्यूलाइड पर लिखी एक खूबसूरत कविता बन गई.

आभार : दृश्य-श्रव्य जनसंचार प्रविधि

Saturday, May 22, 2010

समानांतर सिनेमा और दर्शकों की बेरुखी


समानांतर सिनेमा को प्रारंभिक दौर में काफी दर्शक मिले. मगर बाद में धीरे-धीरे इस तरह की फिल्मों के दर्शक कम होते चले गए. अस्सी और नब्बे के दशक के आखिर में सार्थक सिनेमा का आंदोलन धीमा पड़ गया. प्रकाश झा और सई परांजपे जैसे फिल्मकार व्यावसायिक सिनेमा की तरफ मुड गए. श्याम बेनेगल बीच में लंबे समय तक टेलीविजन के लिए धारावाहिक बनाते रहे. समानांतर सिनेमा की अंदरूनी कमियों के कारण भी यह आन्दोलन सुस्त पड़ने लगा. कारण यह हैं :-

सार्थक सिनेमा आंदोलन से जुड़े फिल्मकारों ने अपने चारों ओर एक ऐसा कल्पनालोक रच डाला है, जिसमें से निकलना ना वे चाहते हैं और ना उनके लिए अब मुमकिन रह गया है.  उनके इस कल्पनालोक कला के लिए तो भरपूर स्थान है, पर व्यवसाय के लिए नहीं. जबकि इस मत पर कोई दो राय नहीं हो सकती है की कला और व्यवसाय में एक वैज्ञानिक रिश्ता होता है. यह रिश्ता ही कला को लोगों से जोड़ता है.

चलताऊ फिल्मों के भीड़ के बीच जब दो-एक साफ़-सुथरी फ़िल्में आई तो इन्हें पहले अच्छा सिनेमा कहा गया. बाद में यह समानांतर सिनेमा हो गया. शुरू में मुख्यधारा की फिल्मों और समानांतर सिनेमा का कोई दर्शक वर्ग अलग-अलग नहीं था. पर जल्द ही प्रयास करके दर्शकों के बीच भी एक रेखा खींच दी गई. समानांतर फिल्मों के साथ-साथ समानांतर दर्शक वर्ग भी खड़ा हो गया. इससे नुकसान ही हुआ. फिल्मकार को अब उस समानांतर दर्शक वर्ग की ज्यादा फ़िक्र थी और वह उसी को ध्यान में रखकर फिल्में बनाने लगा. नतीजा यह हुआ कि समानांतर सिनेमा मुख्य दर्शक वर्ग से पूरी तरह कट गया.

उस समय भी और आज भी व्यावसायिक सिनेमा में भी कुछ अच्छी सिनेमा बनीं, पर अच्छी फिल्मों और कला फिल्मों को एक नहीं माना गया. हृषिकेश मुखर्जी की सत्यकाम या गुरुदात कि प्यासा अच्छी फिल्मों थीं, पर इन्हें कला फिल्म का दर्जा नहीं दिया गया. गुलज़ार की आंधी या किताब हो या हृषिकेश मुखर्जी की आनंद या फिर शेखर कपूर की मासूम में अच्छी फिल्मों के वे सभी गुण इनमें हैं पर यह सिर्फ अच्छी फ़िल्में हैं कला फिल्म नहीं. इसीलिए तमाम फिल्मकार और पूरा का पूरा मीडिया यह मानता है कि कला फिल्मों की शुरुआत मृणाल सेन कि भुवन शोम से हुई.

कला फिल्मों के निर्देशक अपने को पूरी तरह ईमानदार कहलाना पसंद करते हैं. उनकी यही व्यावसायिक ईमानदारी जब कैमरा पर हावी हो जाती है तो कैमरा कथ्य को पकड़ने के बजाय दृश्य को पकड़ने लगता है. सत्यजीत राय की शतरंज के खिलाडी या प्रकाश झा की दामुल याद करें तो कोई दृश्य अगर शुरू हुआ तो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता. कई मौके पर ऐसा लगता है कि निर्देशक कैमरा ऑन करके भूल गया है.  बेमतलब प्रतीकों, खंडहरों और चुप्प अँधेरे को कैमरा फोकस किये रहता है दर्शक इनमें भी मतलब खोजने की कोशिश करते रहते हैं.

सवाल उठता है कि ऐसी गतिहीन और घटनाविहीन फिल्में दर्शक आखिर क्यों देखें ? गोविन्द निहलानी की आघात और अर्ध्यसत्य को लें. अर्ध्यसत्य में निहलानी का कैमरा और दर्शकों का सोच, दोनों कि गति में पूरा तालमेल है. लिहाजा फिल्म को व्यावसायिक सफलता भी मिली. पार्टी, तरंग, राव साहब, मैस्सी साहब, यह वो मंजिल तो नहीं, दामुल जैसी कला फिल्मों को भी यह विडंबना रही कि सिनेमा जैसा मीडियम जिस गति कि अपेक्षा रखता है, वह इनमें नहीं थी.

गतिहीनता के साथ-साथ कल्पनाशीलता का आभाव भी सार्थक सिनेमा को ले डूबा. कुछेक को छोड़ दें तो ज़्यादातर फ़िल्में ऐसी बनी हैं, जिन्हें देखने के बाद यह सवाल पूरी शिद्दत के साथ उभरता है कि आखिर इन्हें बनाने का मकसद क्या था ? प्रदीप कृष्ण की मैस्सी साहब और सुधीर मिश्र की यह वो मंजिल तो नहीं जैसी फिल्में देखकर दर्शक के मन में यह सवाल उठे बिना नहीं रहता कि समसामयिक दौर में इन फिल्मों की क्या प्रासंगिकता है ? मैस्सी साहब का कथानक जो आज़ादी के पहले का है, वह भी अंग्रेजी उपन्यास जानसन पर आधारित, जो मूलतः इंडोनेशिया कि पृष्ठभूमि पर लिखा गया है. प्रदीप कृष्ण ने थोड़े-बहुत फेरबदल के बाद इसे भारतीय पृष्ठभूमि में फिल्माकर पेश कर दिया है. इस फिल्म में कल्पनाशीलता का अभाव साफ झलकता है.

            तथाकथित सार्थक सिनेमा कि एक त्रासदी यह भी रही है कि वह नकारात्मक दृष्टिकोण को ही प्रमुखता दिए रहा. यह फिल्में जनसाधारण के दुखों और संघर्ष को दर्शाती हैं उन पर चोट नहीं करती. दर्शकों में वैचारिकता नहीं जगाती. मिर्च मसाला (केतन मेहता) में फिल्म का अंत जिस आकस्मिक तरीके से होता है, वह दर्शकों को कोई वैचारिक धरताल प्रदान नहीं करता, उन्हें रास्ता नहीं दिखता, बल्कि उनमें हताशा ही जगाता है. कामुक सूबेदार (नसीरुद्दीन शाह) से बचने के लिए गांव की औरतें उस पर लाल मिर्च का पाउडर फेंकती हैं. पर्दे पर लाल गुबार छा जाता है और यहीं फिल्म का अंत हो जाता है. यहाँ दर्शकों को प्रतिघात या कुदरत का क़ानून का अंत याद आता है, जिनमें हिंसा का प्रतिकार हिंसा से किया गया है. इसमें अतिरंजना भले ही हो पर ऐसी नकारात्मकता नहीं, जिससे नाकामी के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता. इसी तरह पार और आघात के चरित्र भी अंत में असफल ही रहते हैं और कमोबेश यही सब कुछ दामुल में दर्शाया गया है.

            सार्थक फिल्मों के कर्ता-धर्ता सिनेमा के स्टार सिस्टम को कोसते रहते रहे हैं, पर जाने-अनजाने उन्होंने खुद भी स्टार सिस्टम को बढ़ावा दिया है. आज भी सार्थक सिनेमा कि बहस छिड़ने पर ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल या शबाना आजमी के नाम ही बार-बार आते हैं. मंथन’ और भूमिका की उतनी चर्चा नहीं होती, जितनी उन फिल्में में अभिनय के लिए स्मिता की होती है. इसी तरह अंकुर और निशांत के कथ्य पर शबाना का स्टारवाद हावी हो जाता है. आक्रोश और अर्ध्यसत्य के कथानक से अधिक ओमपुरी की चर्चा होती है. पार याद की जाती है तो नसीर के उम्दा अभिनय के लिए. कारण साफ़ है कि सिनेमाई जादू को आप स्टार सिस्टम से जुदा कतई नहीं कर सकते. फिर उसे कोसने से क्या लाभ ?




(दृश्य-श्रव्य जनसंचार प्रविधि से साभार)

Wednesday, May 19, 2010

सागर-ओ-मीना


मैं जब शराब पीने वाला होता हूँ तो धरती रुकी हुई सी होती है कुछ कहने को बेताब पर कहती कुछ नहीं. या कहना नहीं चाहती. एक उमस जैसा माहौल होता है गोया जब तक बरसे ना, गर्मी बनी रहती है. यह बिलकुल वैसा ही होता है जैसा जब तक कोई कविता मन में घुमड़ते हुए कागज़ पर ना आ जाये. एक बार कागज़ पर आ गई, अपना बोझ खतम. घंटा टेंशन, और वैसे भी टेंशन लेने का नहीं देने का!!! कम से कम कुछ घंटे के लिए तो आदमी हल्का हो जाता है.

घूमती है धरती जब पीता हूँ शराब, डोलती है धरती, सांस लेने लगती है जब पी कर चलता है शराबी.

शराब की तलब होना सेक्स की इक्छा रखने जैसा कुछ नहीं है. हाँ इसकी शुरूआती तलब आप फोरप्ले से जोड़ सकते हैं. यह कहना मुठमर्दी ही होगा कि मैं जब फ्रिज का दरवाजा खोलता हूँ तो बोतलों के गर्दन पर ठहरी ठंडी बूंदें देखकर मेरा दिल दारु पीने का नहीं करता बल्कि तब तो लगता है कोई नयी दुल्हन अलसुबह सबसे नज़रें बचाते नहाकर बाथरूम से नंगे पैर निकल रही है जिसकी आधी गीली बदन पर ठहरी बूंदें अमृत के माफिक लगती है.

लोग गलत कहते है कि शराब आदमी को बेसुध करती है मुझे तो लगता है की यह ज्यादा सोचने को देती है अलबत्ता यह विवाद का विषय है कि आपके सोचने का सलेबस क्या है ...

अच्छा बताइए क्या रैक पर रखे बोतलों की छाया आपको किसी दानवाकार जैसी लगती है? मज़ा तो तब है जब आप पैग बना कर इसे सामने रख दें और पीने के बारे में सोचें... ये बिलकुल किसी जवान युवती को सामने सोफे पर बिठाकर थोड़ी दूर से अंतरंग बात करने जैसा है. तो ख्याल और शराब आपस में मिलकर जो एक माहौल तैयार करते हैं वही तो सुरूर है .. इसके बावजूद मुझे लगता है की शराब और शराबी विविधताओं से भरे दो अलग-अलग कौम हैं पर इनका आपस में मिलना एक खालिस मिलन होता है.

अब आपके मन में आक्षेप जैसी बातें आ रही होंगी की मैं शराब पीने को बढ़ावा दे रहा हूँ, इसके पीने का प्रचारक हूँ, या मुझे इसके विज्ञापन का ब्रांड अम्ब्रेस्डर बनाया गया है जिसकी मैं दलाली कर रहा हूँ, बच्चों को बिगाड़ रहा हूँ, संस्कृति को ठेस पहुंचा रहा हूँ, धर्म, संस्कार, जिम्मेदारी फलंना, चिलाना आदि-आदि तो साहिब ऐसा कुछ नहीं है, मैं बस शराब के मुत्तालिक अपने जेहन में उठती बातों को बस लिख रहा हूँ.

हाँ तो क्या मुझे याद दिलाएंगे की मैं कहाँ था... अच्छा !

अब देखिये सबकी अपने वजहें होती है पीने की. रवि बाबू क्यों पीते थे यह नहीं पता चला आज तक, उनकर को बाप भी बी.डी.ओ. हैं, प्यार तो खैर रवि को क्यों कर होगा ! शायद हो भी सकता है पर वो उसके गम में तो नहीं पीएगा, अरे बचपन से जानता हूँ उसको मैं. वो चचा ग़ालिब के भक्त थे. जुगाड हुआ नहीं के तड से शेर दागते थे गर वुजू से ही मिल जाए शराब तो कौन सजदा करता है

हाँ तारा बाबू के अपने घर की कुछ पिराबलम थी वो जगजीत बाबू का गज़ल थोडा तोड़ कहते थे तेरी आँखों में हमने क्या देखा, सौ बोतल से ज्यादा नशा देखा.  बड़े मीटर में गाते थे शाहबजादे.

बिक्की बाबू तो शर्तिया प्यार में पीते थे यह दीगर है की वो किसी को बताते नहीं थे की कौन छम्मक्छल्लो से उनका टांका भिड़ा हुआ है पर गाते तो शिव कुमार बटालवी हो जाते थे मैंनू जब भी तुसी हूँ याद आये, दिन-दिहाड़े शराब लय बैठा

वहीँ सुदीप जी सक्सेसफुल ना हो पाने के गम में पीते और पीते टेम सबको समझाते चलते थे कि नशा शराब में होती तो नाचती बोतल”.

उनसब से मेरे बारे में पूछिएगा तो कहेंगे कि मेरे दिमाग में केमिकल लोचा हुआ है. और मैं अपने लिए एक किताब ही कोट कर दूँगा.

ऊँगली पर गिनता हूँ तो लगता है साला और कोई नहीं बचा चार ठो दोस्त और सब बेवड़ा ... जा ! च्च... च्च... एक्को गो संस्कारी नहीं... जय हो.

खैर मैं अपनी बात करूँ तो जब घने दोपहर में घर से बाहर होता हूँ तो शराब मुझे रोनाल्डो का हाफ पिच से सीधे गोल में दागा गया किक लगता है, गोरान ईवान सेविच का सर्विस जैसा लगता है.

देव बाबू (देवदास) इस मामले में बड़े लक्की थे... उनके साथ कोई ना कोई डोलता रहता था. खैर... अमीर आदमी थे इसलिए बड़े लक्की भी थे.

राजेश बाबू (राजेश खन्ना) कैसा जान घोल देते थे. उनका तो मुंहें था अजीब सा, सबको समेट लेते थे. रुलाने को जुटा लेते थे और हर बात के बात सिर झुलाकर कन्विंस करके यू-टर्न मार लेते थे, पुष्पा ! आई हेट टियर्स रे वो पीते हुए ही जंचते थे फिर काहे का यह लाल रंग कब मुझे छोड़ेगी !

... फिलहाल फ्रिज खाली है और और मेरे सामने परसों ठेके पर से उड़ाया हुआ बासी, महका हुआ ठर्रा है (आपके लिए भभका हुआ) और लोटे के सर्कल में पूरी धरती इसमें समायी हुई लग रही है. कुछ उजले कीड़े जैसा उड़ रहा है और मैं उस में झांक कर देखता हूँ को पूरे चेहरे की तस्वीर उभर आ रही है. तो शराब में चेहरा है, चेहरे पर शराब नहीं है. बस... बस अब मत कहलवाईये... साला बात है कि जुराब का धागा... पकड़ के खींचा तो उधड़ता ही चला गया.

Tuesday, May 18, 2010

राज़ की बातें लिखी और खत खुला रहने दिया



किशोरावस्था से जवानी की ओर जाती तुम्हारे बचपने का यह उच्चतम स्तर होगा. अब तुम थोड़ी गंभीर हो जाओगी. अल्हड़ता दूर जाने लगी होगी. होंटों पर लिपस्टिक लगाकर आईने में देर तक नहीं हँसती होगी अब करीने से तुम्हें लिपस्टिक लगाना भी आ गया होगा. तुमने अब दुपट्टा ठीक से पिन-अप करना सीख लिया होगा.

मेरी आँखों में अब तक वही मंज़र कैद है कि तुम रेत पर ठीक किसी नदी की तरह अपने सीने से आँचल हटाकर मेरे शहर को बसाई हुई हो. तुम्हारी गुदाज़ बाहें मेरे आगोश में मसक रही है. कसमसाई हुई तुम कभी मेरे आस्तीनों से खेलती हो, झेंपती हो और कभी टूट कर प्यार करती हो. यूँ कभी-कभी बीच में जब मैं भी अपनी आँखें खोलकर तुम्हारे होंठों को अपने होंठ के इतने करीब देखता हूँ तो मेरा दिल धक् से रह जाता है. मैं तुम्हें अपने हैसियत से बाहर जाकर नापने की कोशिश कर रहा हूँ.

कहीं भरी आकाल में तब बारिश हुई थी. भूखे को अनाज मिला था. उस दिन किसी किसान के आँगन से बैल नहीं खोले गए थे. कहीं कोई खुदा किसी अभागे पर नेमत बरसाया था. कोई भागा हुआ घर लौटा था और माँ के चेहरे पर पहली बार नूर दिखा था.

कृष्ण ब्रज के बहाने सृष्टि को प्रेम का महत्ता बता रहे थे. सुकरात ने सत्य की खातिर जहर पी थी. समंदर बार-बार चाँद को छूने के लिए आवेग से उठा था. झील पर पानी पीने आई सुनहरी हिरणी कुचालें भर रही थी. गाय के खुर ने गोशाले में उत्पात मचाई थी.

... और कालिदास दूर बैठे कहीं कोई विराट महागाथा लिख रहे थे.

... अगले दिन तुम मुझे रात में कई बार अकचकाकर नींद टूटने कि शिकायत करती हो.

मेरी आँखों में अब तक वही मंज़र कैद है कि किसी पेड़ कि ओट लेकर मैंने बारिश में तुमसे आसमान देखने को कहा था. यह और बात है कि इतना प्रेम कहाँ से बरसा था यह रहस्य हम दोनों आज तक समझ नहीं पाए.

मेरी आँगन की मिटटी ने तुम्हारे गमले में कोई नया पौधा अब तक खिला दिया होगा. तुम्हारी यह शिकायत कमजोर पड़ गई होगी कि मेरे बाल बहुत देरी से सूखते हैं. उम्मीद है, इन गर्मियों में एक साथ कई सूरज निकला करते होंगे. गुलमोहर और अमलतास पर झमाझम फूल आया है अलबत्ता तुम्हारे गालों पर पिम्पल्स आने के दिन खत्म होने को आये होंगे.

... आज यही खुशखबरी देनी थी कि मैं तुम्हें पूरी तरह से भूलने में कामयाब हो चुका हूँ.

Thursday, May 13, 2010

पहला प्यार



पहला प्यार 
(सब-टाइटल : निम्नमध्यम मोहल्ले का प्यार )

शादी के बाद रश्मि लाल रंगों में लिपटी पहली बार अपने मायके आई है... गोरे-गोरे हाथ, भरी-भरी चूडियाँ, करीने से लगाया हुआ सिंदूर, बहुत सलीके से पहनी हुई साडी, मंगलसूत्र, डीप कट ब्लाउज, बाजूबंद... कुल मिलकर ऐसी बोलती संगमरमरी मूरत कि कोई पुराना आशिक देख ले तो अबकी तो मर ही जाए... लिखित गाईरेंटी, स्टाम्प पेपर पर, तीन इक्का, खेल खतम.

सोनू के दूकान के पास से जब रश्मि गुजरी तो ऊपर वर्णित स्विट्ज़रलैंड की वादी को देखकर सनसनाहट में उसने अपने होंठ काट लिए.... एक सिसकारी भरी और सारी ताकत किस्मत जैसी किसी अदृश्य चीज़ को गरियाने में लगा दिया...

सोनू, रश्मि का पुराना आशिक, कक्षा आठ से उसके ट्यूशन-कोचिंग के दिनों से उसके आगे-पीछे डोलता हुआ.

रश्मि जब भी घर से निकलती तो उसे गली के मोड से कोलेज और कोलेज से गली के मोड तक सशरीर छोड़ता सोनू. उसके बाद रश्मि को अपनी आखों से उसके बेडरूम तक छोड़ता था... आज उसके प्यार में बर्बाद होकर उसी मोड पर सी.डी. की दूकान खोले बैठा है जो अब कितनी भी घिसी हुई सी.डी. चलने में एक्सपर्ट हो चुका है, वो एक ग्राहक को जो उसे सोनू भईया बुलाता है उसे बता रहा है कि ये सी.डी. साली चलेगी कैसे नहीं, इसपर दो बूंद पानी डालो, सूती कपडे से पोछो फिर चलाओ और देखो... क्योंकि ग्राहक की शिकायत थी की भईया यह सिनेमा हर हाल में देखे के है, शंकरवा बोला है कि इसमें हीरोइन कपडे उतारकर कर हीरो से फोटू बनवाती है.

उसके पास राम तेरी गंगा मैली, मेरा नाम जोकर, आस्था, एक छोटी सी लव स्टोरी से लेकर सलमा की जवानी, रंगीला बुढ्ढा, वन एक्स, डबल एक्स और ट्रिपल एक्स जैसी सी. डी. हैं...  जहां आवारों का जमघट है और फलाना फिलिम में ढीमकाना सीन तक के चर्चे हैं विथ एक्सप्रेशन एंड ऐक्ट...

यों सोनू का जिंदगी का सिलेबस बस काफी सिमट चुका है, सुबह उठकर माई के हाथ का चाय पीना, नहाना, तुलसी में जल देना और दस बजे तक दूकान खोल देना.. इन सबके बीच में तुलसी में जल देते वक्त मुई गर्दन रश्मि के घर के तरफ मुड ही जाती थी... गोया यही एक कॉमन चीज़ रह गई थी...पर इससे पहले भी सिलेबस कहाँ ज्यादा था... घर के उलाहने थे, थोड़ी सी जिम्मेदारी थी, रोज का आटा-दाल, नून का घटना था और इन सब में गड्ड-मड्ड होते सोनू के मन में बसी रश्मि थी.

हाँ तब सी.डी. की दूकान नहीं थी, थी तो बस एक सायकल जिसपर लड़कियों को हीरो फिल्मों में ही बिठाकर हरे-भरे पगडंडियों पर घुमाता हुआ ठीक लगता है... आगे बैठे हुए लड़की और उसके कानों में आई लव यू कहता लड़का, इसे करते हुए दोनों आनंदित होते है और आप देखकर... जब लड़की आगे बैठती है तो सीन कैसा रोमांटिक लगता है पर पीछे बैठते ही सीन कैसे संघर्षवाला लगने लगता है रे बाबा, दुपहरी जाग जाती है

रश्मि भी उसी हेरोइन के तरह होती तो जिनगी केतना खुशहाल होता, ना.. ना वो तो है हेरोइन... इसमें कोई शक नहीं, गर्दन झुकाकर हँसती है तो कैसे सरसों लहलहाने लगता है खेत में, गेंहू की सारी बालियाँ हहरा उठती है, लगता है कोई राह बनाते जा रहा हो पर उसकी छाया तक न दिखती हो, जुल्फन को झटका देती है तो लगता है कि किसी बात को फेर से कहेगी... खैर... होता है, चलता है, दुनिया है... सोनू सोचता है.

तो आज रश्मि दूकान के सामने से क्या गुजरी सोनू फ्लैश्बैक में चला गया... उफ़ क्या दिन थे, अंग्रेजी के पासपोर्ट के पैसे से फोन करना, छोटू के हातों मुरब्बा भिजवाना, कैसे रस ले के खाती थी जुगनी (रश्मि का प्यार भरा नाम) झूला पर झूलते हुए, रेनोल्ड्स के लीड में लपेट कर चिठ्टी देना, चुम्मा लेने की कोशिश करते ही उसका हाथ छुडा के इठलाकर भाग जाना...... यह लड़कियां लास्ट मोमेंट पर हाथ छुडा के काहे भाग जाती है, समझ नहीं आया आज तक ... सोनू सोचता है.

होता है, चलता है, दुनिया है...

(जारी...)

* * * * *

Note: अगला भाग कब लिख सकूंगा पता नहीं, शायद तब जिस दिन मूड फिर कुछ ऐसा ही हो.

बहरहाल यह गीत सुनिए, अबकी भोजपुरी लाया हूँ, माहौल से मिलता-जुलता, गीत के शब्द बड़े सरल हैं, आप सामंजस्य बिठा लेंगे, आपको हिंदी जैसी ही लगेगी, अभिनेता मनोज तिवारी मृदुल हैं जो इस गीत के गायक भी है. वो भोजपुरी फिल्मों के अमिताभ कहलाते हैं... गीत अपने आप में एक पोस्ट है, एक लखनवी पान है, आप बस  ध्यान से सुनिए... इट्स अ पर्सनल रिक्वेस्ट :)

ऊपर वाली के चक्कर में...

Tuesday, May 11, 2010

दीदी का खत...



बिसरे ज़ख्मों पर नमक जैसे मेरे प्रिय बेटे,

तुम्हारा पिछला खत पढकर यह संबोधन दिया है जिसमें तुमने घर की याद के बाबत बात पूछी है.

नितांत एकाकी क्षणों में घर की याद आ जाती है. जैसे सूप में आपने आँखें फटकते हुए, फटे हुए ढूध का खो़या खाने में नमकीन आंसू का जायका तलाशते हुए या चावल चढाने से पहले उसे चुनते हुए हुए आनाज और कंकड के फर्क पर शंकित होते हुए... फिर अपनी पत्थर होती आँखों को कोसते हुए...

अबकी साल भी आम के पेड़ में मंजर खूब आया है और सांझ ढाले उनसे कच्चे आम की खुशबु घर के याद के तरह आनी शुरू हो गयी है... अब यह कमबख्त रात भर परेशान करेगी.

तुम्हारे घरवालों ने मुझे कहाँ ब्याह दिया, हरामी ने जिंदगी खराब कर दी. ससुराल जेल की चाहरदीवारी लगती है और मैं सजायाफ्ता कैदी सी.

मैंने ना ही कोई विवादास्पद बयान दिया, कोई विद्रोही तेवर वाली किताब ही लिखी है. कोई सियासी मुजरिम हूँ जो मुझे ससुराल में नज़रबंद रखा गया है.

मैं क्यों अपने घर से निर्वासित जीवन जी रही हूँ ? कहीं यह तुम दोनों दोनों पक्षों की मिलीभगत तो नहीं ??? मर्द तो दोनों जगह कोमन ही होते हैं ना ???

टेशन से छूटने वाली गाडी में भी उतना ईंधन नहीं होगा जितना भावुक ज्वलनशील पदार्थ एक ब्याही औरत के पास होता है... फिर भी रेल है कि आगे बढ़ ही जाती है पर मैं ???

भैया अपनी जिंदगी में सो कैसा फंसा है जो बाईस साल में कभी खुशी से मिलने नहीं आया और बाबूजी ने कोई चिठ्ठी नहीं लिखी.

तुम्हारे बाप को मेरे बेटे की फिकर नहीं है; वो यह भी नहीं जानते कि इस जून में उसने इंटर पास कर लिया है पर मुझे तुम्हारी याद आती है. मेरे दुश्मन बेटे, मैं उम्मीद करूँ तुमसे कि तुम इस परम्परा को तोडेगे और बूढी होती अपनी दीदी से मिलने आओगे!

अंत में, सुना है तुम्हारे बहन की भी शादी होने वाली है, और तुम उससे बहुत प्यार करने का दंभ भी भरते हो ? तो क्या मुझे जैसे को तैसा' वाली शाप देने की जरुरत है ??? 

लिखना

तुम्हारी अभागी दीदी

अंजन
*****



note : हमलोग पिताजी की बहन को दीदी बुलाते हैं.



अबके बरस 
भेज 
भैया को बाबुल... (फिल्म : बंदिनी)



Saturday, May 8, 2010

वसीयत


सत्रह की उम्र जैसे पगडण्डी पर लुढकती कोसको की गेंद... कबड्डी-कबड्डी की आवाज़ लगाती बिना टूटन की साँस... हर चौकोर खाने में चपटा सा टुकड़ा रख कर कित-कित खेलती साक्षी जब आईने में शुरू से खुद को देखती तो लगता दुनिया यों उतनी बुरी भी नहीं है जैसाकि बाबूजी कहते फिरते हैं... 

सूना सा गला सादगी के प्रतीक थे... और नाक-कान में नारियल के झाड़ू की सींक... दो चोटी कस कर बांधना... फिर एक सिरे से पलक खोलती तो एक ही चीज़ की कमी लगती- बिंदी की .... तो ये लगाई बिंदी और हो गयी तैयार साक्षी.. अब देखो इतने में कैसी खिल उठी है. अब ज़रा सी देर में धूप भंसा घर के खपरैल के नीचे सरकेगी और वो होगी खेल के मैदान में सबकी छुट्टी करने.

लेकिन श्रीकांत का क्या ? उसके बारे में क्या सोचा है उसने ? जिसने खेलने के बहाने इनारे पर बुलाया है...

पर मेरा मन तो खेलने का है पर श्रीकांत जो दूसरे गांव से मिलने आया है वो भी स्कूल के ब्लैक बोर्ड पर इशारे से  लिखकर उसने पहले ही बता दिया था और मैंने आने की हामी भी शरमाकर भरी थी, उसका क्या ? बड़े उम्मीद से विनती की थी उसने!

साक्षी के आँखों में श्रीकांत का चेहरा घूम जाता है...

प्यार में बड़े समझौते करने पड़ते हैं दीदी भी यही कहती है... तो साक्षी आज इनारे पर ही जायेगी.

तुम हमेशा यहीं क्यों मिलने बुलाते हो श्रीकांत, साक्षी एक अनजाना सा सवाल करती है.

क्योंकि अपने गांव में कोई और यादगार जगह नहीं है. श्रीकांत को जैसे सब पता है.

क्या यादगार है यहाँ ? ज़रा मैं भी तो जांनू...

क्या नहीं है, हर दुल्हन हल्दी लगने के बाद पहला स्नान यहीं करती है. यह इनार गवाह है कई ....

अच्छा तो तुम वहाँ तक पहुँच गए ... श्रीकांत बताता ही होता है कि बात काटकर साक्षी उसे रोक देती है.

तुम लड़कियां कोई अच्छी बात पूरा क्यों नहीं करने देती ? अबकी श्रीकांत सवाल करता है

क्योंकि हम उसके बाद उसमें बंध जाते हैं श्रीकांत

तो क्या तुम्हें बंधना पसंद नहीं ? श्रीकांत की बेसब्री बढ़ जाती है

है ना ! अच्छा चलो पानी में दोनों एक साथ अपनी परछाई देखते हैं....

श्रीकांत ने हामी भरी... दोनों ने पानी में एक साथ झाँका, कुएं का पानी बड़ा साफ़ था. अभावों के दिन थे पर एक ही फ्रेम में दोनों आ गए... परछाई में दोनों ने एक एक-दूसरे को देखा... साक्षी ने अपने तरीके से श्रीकांत को माँगा और श्रीकांत ने अपने जहां का कोना-कोना साक्षी को दे डाला... और इसी पल की तस्वीर दोनों के मन में सदा-सदा के लिए खिंच गए.

 *****
खाई है रे हमने कसम...

Friday, May 7, 2010

आ जाओ कि.....



दोनों जोड़ी आँखें देहरी पर कब से टिके हैं... ऐसे समझो कि मैंने अपनी आँखें वही रख दी हैं और अब मैं अंधी हूँ...  दरवाजे पर मनी प्लांट लगा रखा है ताकि वो भी तुम्हारे आते ही पैरों से लिपट जाएँ... मैं कसम से बिलावजह बच्चों को डांटना छोड़ दूंगी ...

लगातार पछिया चलने जो पेड़ पूरब के ओर झुक गए हैं... पानी देने पर भी गमले की उपरी मिटटी पपरी बन उखड गयी है. तुम्हारे जाने के बाद से द्वार को गोबर से नहीं लीपा  है.

आ जाओ कि तुम्हारे आँखों के डोरे की गहराई नापे बहुत दिन हो गए.. कम से कम यही देख लूँ कि उन समंदर में अपने लिए कितने ज्वार-भाटा बचे हैं... आ जाओ कि तुम्हारे आँखों में खुद को ब्लिंक होना देखे बहुत दिन हो गए हैं... 

इन दिनों तो चाँद के पास भी एक तारा दिखाई देता है.. दीवार पर बैठकर पाँव हिलाते तुम्हें सोचते हुए जाने कितने सूरज को डूबते देखा.... कि सूर्यास्त तो बहुत देखा सूर्योदय देख लूँ ..

आ जाओ कि अब साँसें घनीभूत हो चुकी हैं और हवा का कितना भी तेज झोंका इन बादलों को उड़ा नहीं पायेगा; यह आज बरसना चाहती हैं...

सिर में तुम्हारे यादों की धूल जमने से मेरे बाल बरगद की लटें हो गयी  हैं.. और बदन पर तुम्हारा कुंवारा स्पर्श रखा है...आ जाओ के अब मेरी इंतज़ार की मोमबत्ती फड़फड़ाने लगी है... आ जाओ कि लोगों ने अपनी विरह तो देख ली अब मिलन भी देख ले... 

आ जाओ कि मुझे चूल्हे में हाथ जलने का पता हो जाये... आ जाओ कि मेरी अनुभूतियाँ जिंदा हो जाये.. मुझे इस धुंधले पहाड़ों में किसी का अक्स ना नज़र आये... आ जाओ कि पलंग के नीचे फैंका रूठा वो पायल ना-ना करते हुए नाच उठे... आ जाओ कि मुझे उजाले से प्यार हो जाये... मैं सिगरेट को फूल लेंथ की सांस देकर जिलाने की कोशिश छोड़ दूँ...

आ जाओ, इस लाश में जान भर दो

...कम से कम मुझे अपमानित करने के लिए ही आ जाओ....

आ जाओ कि तुम्हारी माँ को मिरगी का दौरा आना बंद हो जाए.

*****

Tuesday, May 4, 2010

रेड लाइट...



दे भिखारी !
बच्चे ने जब बस में बैठे लोगों को इस तरह जोर से संबोधित किया तो लगा पूरी दुनिया को कह रहा हो. यह वही बच्चे हैं जिनके लिए ट्रेफिक जाम होना हमारे उलट ज्यादा फायदेमंद होता है..


दुनिया के खेल भी निराले हैं... जब हम बारिश का आनंद लेते हैं तो उसी दिन शाम को मोहल्ले में हाट नहीं लग पाता और कुछ बेहद जरूरतमंदों की कुछ भी कमाई नहीं हो पाती तुर्रा यह कि अगले दिन कई अखबारों में यह पढ़ने को मिलता है कि बारिश के कारण फलां फसल में कीड़े लगने के कारण वे खराब हो गए.

तो बच्चे ने दुनिया को दे भिखारी का नारा दिया था... जिन्हें कोई और नारा देना चाहिए था... यह हिंदुस्तान के मुस्तकबिल है... मेरी जबान भी कितनी गन्दी है एकबारगी तो ख्याल आया हुजुर का मुस्तकबिल बुलंद हो.

संसद भवन के गलियारों से कितना उलट है प्रगति मैदान के सबवे में खड़े एक साथ तीन को इशारे से निपटाते किन्नड...  यहीं बन रहा है आजकल कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए एक लोहे का पुल... समय भी अब कम है ना... शीला सरकार को अपनी लाज जो बचानी है...

और उसी के नीचे नेशनल स्टेडियम के गेट पर लाल बत्ती पर भारत की तरक्की को चुनौती दे रहे हैं यह बच्चे सिर्फ दो शब्दों दे भिखारी से

बाबू गजरा ले लो! 
एक करुण प्रार्थना... एक लड़की मेरे पास आकर कहती है.

आँखों में बहुत बेबसी रोक रखी है उसने, तो क्या अब वो गिर जायेगी ? नहीं तो, जिसने पीठ पर अपना भाई भी बाँध हो, उसका बाँध इतना कमजोर नहीं होगा!!!

बस रुकी है और एक बच्चा नकली दाढ़ी, मूंछे लगाये लगातार करतब दिखा रहा है, इन्हें नट कहते हैं. दोपहर के डेढ़ बजे ऐसा वे भूखे रह कर कर पाते हैं मेरा एक दोस्त बताता है.

शीशे के किनारे बैठे सभी बुतों ने करतब देखा है पर पैसे नहीं निकाले.... खीझ से उसी बच्चे ने बुतों को भिखारी नाम से पुकारा था.

सहसा, जोर का ठहाका !!!!
निष्क्रियता देख पायदान पर खड़े कुछ आवारे, जो मुफ्त में घर लौट रहे है, एक ने २ का सिक्का फैंकते हुए कहा
ले बेटा इसका सिगरेट पी लेना
 फिर एक जोरदार ठहाका !!!!!!

गजरे वाली लड़की नीचे उतर कर भी मुझे लगातार देख रही है... मैं बचने की कोशिश कर रहा हूँ पर लगता है यह निस्तेज कातर नज़र मेरी पीठ से चिपक गयी है.

बस चल पड़ती है... मुझे अशोक चक्रधर याद आते हैं...

मसखड़े के साथ मसखड़ी हो गयी,
जाओ बाबू जाओ, बत्ती हरी हो गयी

एक नज़र इधर भी




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