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लरजता दुपट्टा और बिना संगीत चुम्बक लगा लय पकड़ता, भूलता फिर थिरकता गीत

तुम कोई गीत गाओ। तुम कोई गीत गाओ ना। तुम गाओ ना कोई गीत, प्लीज़। मुझे बहुत बेचैनी हो रही है। शायद बिस्तर पर कराहते ये अंतिम दोपहर हो। मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। बस इतना सा संतोष कि तुम हो आसपास ही कहीं। तुम दिखो भी मत लेकिन बस इतना कि मैं मन लगाने के लिए कोई सिनेमा देखता रहूं तो सीफलएल बल्ब की रोशनी में तुम्हारी परछाई किचन में हरकत करती दिखे। परदेदारी का घर ही हो जाए। हमारा रिश्ता लक्ष्मण सीता सा ही हो जाए कि चेहरा देखे बिना जब भी पैर छूने झूकूं तो पायल की बनावट  से तुम्हें पहचान सकूं।  इन दिनों आंखों में अदृश्य से आंसू आते हैं। कमी महसूस होते होते यूं भी लगता है कि आंसू चल निकले हों लेकिन हाथ फेरो तो गाल सूखे मिलते हैं। ऐसा भी लगता है कि बड़े से टेबल पर नंगे बदन लिटा कर मेरे छाती पर सुलगते कोयले पर धिपा हुआ आयरन रख दिया गया हो। एक अरसा हुआ मेरे बदन के कपड़ों ने कल कल बहती पानी की धार नहीं रोकी और जो फुर्सत इन दिनों बगल से होकर निकल जाती है के जिसका चेहरा पहचाना हुआ तो है लेकिन जिसकी आंखों में इन दिनों ऐड़ी उचका कर नहीं झांक पा रहा हूं। ये बिस्तर ही मेरी जान ले लेगी जहां स...

तोहफ़ा

कविता : समय की अदालत में कवि : अपूर्व शुक्ल फरमाइश /आइडिया : कुश वैष्णव तकनीकी सहयोग : पूजा उपाध्याय , कुश वैष्णव एवं प्रशान्त प्रियदर्शी वोइस ओवर आर्टिस्ट : बाबला कोचर (बबला कोचर दिल्ली के मशहूर एंकर/वोइस ओवर आर्टिस्ट हैं) निर्देशन : सागर साउंड रिकार्डिस्ट : चंकी प्रस्तुति : सागर नोट: कविता बिना पूछे/धमकाए ही ली गयी है. कवि अगर मुकदमा ठोकना चाहे तो स्वागत है.