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अपने पसंद की विधा चुन लेना

मेरा कान है और फोन पर उसकी आवाज़ है। उसकी प्रवाहमयी क्रिस्टल क्लियर आवाज़। पर मेरे कान की श्रवण शक्ति जैसे मेरे शरीर में घूम रही है। वह मुझसे मुखातिब है लेकिन सुनती मेरी कलाई है। इस बात को उसने मेरे घुटने की हड्डी से कहा है। उसकी उस बात पर मेरे पैर के बाएं अंगूठे ने प्रतिक्रिया दी है। ये वाक्य कोहनी ने लपकी है और उसकी इस बात ने मेरे नाभि को चूमा है। अबकी उसने मेरी आंख से कुछ कहा और अब तो अब मुझसे भी बाहर जा चुकी है, देहरी पर सुस्ताता धूप भी यकायक उठ कर बात तो रसोई में तिरछी होकर घुस आई है। तकनीकी रूप से कोई बैकग्राउंड शोर नहीं है मगर पृष्ठभूमि में कुछ अन्य शोर हैं। हम अपने अपने कुछ काम निपटाते जा रहे हैं। बैकग्राउंड में सिंक में धुल रहे बर्तन की आवाज़ है, वह पानी का शोर सुनती है और कुछ देर के लिए चुप हो जाती है। उस ओर भी कोई फेरी वाला आवाज़ लगा रहा है, वह खुद बीच बीच में अपनी मेड को कुछ बता रही है, मैं चुप हो जाता हूं। हमारे हलचल साझा हो जाते हैं। किसी के प्यार में होना अच्छा है लेकिन मज़ा तब है जब वह संपर्क में न हो। मैं वहीं रहता है जहां मुझे पिछली दफे छोड़ा गया था। जीवन में एक दिन...

इन दिनों.....

विगत डेढ़ महीन से रेडियो और टी.वी. के लिए स्क्रिप्टों पर काम कर रहा हूं। दिमाग भन्ना सा गया है। कुछ अपनी पसंद का नॉवेल पढ़ने, संगीत सुनने और डायरी लिखने का मन तभी होता है ऐसे किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहा होता हूं।  दिमाग की हालत हमेशा से बदहवाशी की तरह रही है। सीखता बहुत देर से हूं लेकिन पानी तेज़ी से चढ़ता है। जिस चीज़ से गुज़र रहा होता हूं उसी फॉमेट में दिमाग दौड़ने और सोचने लगता है। अगर किसी उमेठ कर लिखे हुए दिलचस्प नॉवल के पांच पन्ने पढ़ने के बाद उसी तरह से दुनिया दिखने लगती है। आधे होते होते लगता है जैसे मेरी किताब है, उत्तेजना बनी रहती है और पूरा होते होते सारा जोश ठंडा हो जाता है जैसे ऐसी भी कोई खास बात नहीं थी मेरे लिखने में। यही वजह है कि कभी कभी शब्द फीके लगते हैं।  विभिन्न जॉर्नर में और अलग अलग मीडियम के लिए लिखने में एक बड़ा खतरा एक खास तरह की बीमारी के शिकार हो जाने का खतरा रहता है जिसमें वहीं चीजों को जोकि कागज़ या कंप्यूटर पर लिखी जा रही होती है सामने घटती हुई प्रतीत होती है, लिखने वाला अपनी सोच के मार्फम अपनी कलम की रोशनाई से गुज़रता हुआ कागज़ पर लिखे जा रहे घटनाओं क...

सुषुम पानी से कहाँ बुझती प्यास- दो

जिस रात मैं जितना रोता अगली सुबह आप मुझे उतनी ही धुली हुई मिलती। मुझे आप फिर थोड़ी से बेवफा लगती . मुझे इसमें कोई कनेक्शन लगा। इसलिए मैंने खुद को तकलीफ देना शुरू कर दिया। धीरे धीरे मैं आपकी कक्षाओं में भी रोने लगा।   कितना कुछ समझा पाती है एक शिक्षिका भी? उतना ही जितना किताब बताता है और उसमें मिला अपना अनुभव। लेकिन ये एंडलेस है। चार लाइन फिर उसमें हम भी जोड़ते हैं। मुझे बहुत जोर का आवेगा जब दिल होता अपनी सीट से उठूं और जाकर एकदम से आपकी कलाई पकड़ लूं और कक्षा से बाहर बरामदे में, किसी खंभे के कोने में ले जाकर आपको कह दूं। और जब कह चूकूं तो चेतना इतनी शून्य हो जाए जैसे साइकिल की घंटी की बज चुकी ‘न्’ रहती है। फिर होश लौटे तो पता लगे कि मैंने जो कहा वो अटपटायी जबान में कुछ और था। ऐसे हिम्मत करके वही का वही कह पाने का मौका आखिर कितनी बार आता है। किस्मत में लिखी ही थी नाकामी कभी चुप रह कर पछताए, कभी बोल कर सर्दियों की वो क्लास याद है जब काली साड़ी पर आप मरून रेशमी शाॅल लिपटा कर आई थीं? चैथी कक्षा तक आंचल से शाॅल पूरी तरह उलझ चुका था। आप...

सुषुम पानी से कहाँ बुझती प्यास

वे कैसी मनःस्थितियां हुआ करती थी। समझाना तो बहुत चाहते थे मगर शब्द नहीं मिलते थे। अचानक से हकबका से जाते थे । अंग्रेजी की टीचर हुआ करती थीं। सात बजे सुबह सामुहिक प्रार्थना चल रहा होता था। हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें। और मन विजय नहीं बल्कि परास्त सा हो चुका था। आज सोचता हूं तो अंग्रेजी टीचर देर रात तक पढ़ती होंगी जभी प्रार्थना में जम्हाई ले रही होती थीं। लेकिन तब लगता था कि उनके पति ने उन्हें सोने नहीं दिया होगा। आखिर क्या कुछ करती रही होंगी इतनी रात तक? तब थोड़ी देर के लिए वे हमारे मन में बेवफा सी हो जातीं। दिल करता हाथ पकड़ कर कोने में ले जाऊं और समझाऊं, आपका पति आपसे उम्मीदें रखता है, आपको चूमता है, मैं कुछ नहीं कर पाता। उसके बनिस्पत मेरा प्यार ज्यादा सच्चा है। आप उसे मार नहीं सकतीं। जबकि मुझे अपने घरेलू झगड़े याद करके भी दस छड़ी ज्यादा मार सकती हैं। मैं कुछ हो सा गया है। आपको लेकर मैं रोता हूं, दोस्तों से बचता हूं। जब आप विलियम वर्डस्वर्थ और जाॅन कीट्स की किसी कविता का मर्म समझाती हैं तो शिद्दत से महसूसता हूं कि अभी तो मेरे पास आपकी समझ को छूने की काबिलयित नही...

गौरी, मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे!

गौरी (गौरीशंकर) मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे। तू ही बता न ऐसे में मैं क्या करूं। काकी चूं चूं करती है। काकी बक बक करती है। कुत्ता भौं भौं करता है। भाभी की मुनिया भें भें रोती है। खुद भाभी भी घूंघट काढ़े भुन भुन करती रहती है। सचदेवा पिंगिल पढ़ता है। कठफोड़वा टक टक करता है। देहरी पर बंधी बकरी चकर चकर खाती रहती है, टप टप भेनारी गिराती रहती है और में में किए रहती है। अउर ऊ जो गईया है का नाम रखे हैं उसका कक्का दिन भर मों मों किए जाती है। हमको मरने के बाद बैतरनी का का जरूरत ? इसी हर हर कच कच में जिन्दे बैकुंठ है। आदमी तो आदमी जनावर तक सुरियाए रहता है। भोर हुआ नहीं, पंछी बोला नहीं, अजान पड़ा नहीं, घरिघंट बजा नहीं, रत्ना ओसरा बुहारी नहीं, सुधीर घोड़ा वाला खाना चना गुड़ अंटी में दाब के दौड़ने निकला नहीं कि भर हंडी भात परोस दो बूढ़ा को। भकोस कर हम पर एहसान करेंगे। और उस पर भी मिनट दू मिनट सुई टसका नहीं कि सुनो रमायन। हमारा पेट गुड़ गुड़ करता है। मन हद मद करता है। चित्त थर थर करता है। बैठल ठमा बूढ़ा मौगी जेकां कथय छै। बीनी से हांक रही गित्तु। गौरिया पर साल पारे गए कटहल के अचार संग गर्म भात मिल...

उससे कहो कि आकर मुझसे लड़े

उसकी कोई खबर नहीं लगती। सूचना प्राद्यौगिकी के अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस रहने वाली के बारे में अब कहीं कोई जिंदा जानकारी नहीं है। चंद कतरे उसकी आवाज़ के अपनी जिंदगी में इक जगह सकेर रखा है। वहीं उसे थोड़ा बहुत पा लिया करता हूं। एक पोस्टकार्ड है, गहरे आसमानी काग़ज़ पर उसकी बचपने में लिखी कुछ सतरें हैं। एक फिल्म में काम करना भी। उसके अक्षर आंगन में ढुलकते लोटे जैसे लगते हैं।  उसे कहां कहां नहीं ढूंढ़ता। कनुप्रिया की किताब में, इज़ाडोरा डंकन के जीवन में, आंखों से बोलती किसी म्यूजिकल ब्लैक एंड ह्वाईट फिल्म में जहां दृश्यों के बीच तेज़ पियानो बजता है। मैं उसे खोजता हूं सखुए के पेड़ों के बीच, बदहवाशी के घोंड़ों के बीच, नींद और सपने के जोड़ों के बीच, अपनों से घिरे गैरों के बीच, सेंट ऑफ़ अ वुमेन के डांसिंग सीन के बीच, ज़हन में बॉस से डांट खाते खौफ के रील के बीच, जैसे मुझे अपने शहर का गंगा किनारे बहता गंदला नाला भी पसंद है वह भी मुझे उतनी ही अज़ीज है। भीड़ भरे हाट से थैला भर सब्जी खरीदने से कभी नहीं ऊबा मैं, शाम ढ़ले काठ की नाव से गंगा में डूबा मैं, दूर रहकर भी वो पड़ोसन की तरह ह...

टूटता नहीं ये जादू

होंठ उसके जब भी लपकता हूं, गर्दन से गुज़रता हूं इरादे दरकने लगते हैं, लहू बहकने लगते हैं। मन जैसा कैसा ऊपर नीचे को होने लगता है। दिल होता है किसी चील की माफिक चोंच में दबा कर उसे उड़ जाऊं, इफरात समय निकाल, नितांत अकेलेपन में शिकार करूं नस नस चटका दूं उसकी, अपनी रीढ़ की हड्डियां तोडूं नहीं ही पूरा हो पता पक्षियों का सा ये ख्वाब तो गली के मुहाने पर झपट्टा मार कर पकड़ लेता हूं उसे निचले होंठ को अपने दांतों से महीन महीन कुतर देता हूं दोनों गालों पर अनार उगा देता हूं किसी दुख का बदला लेता हूं जाने कैसी संगति है मेरी, कैसा मनोविज्ञान है बिछड़ने से पहले कर डालो सब तकलीफ कम रहा करेगी वह कहती - एक मिनट रूको, जाना तो है घर ही वापस बस ज़रा लिपस्टिक लगा लूं /एक मिनट का अंतराल, जिसमें- बारी बारी से ऊपरी और निचले होंठ पर लिपस्टिक फिसलता है (मन होता मेरा मैं ही अपने होंठों से वो लाली मिला दूं)/ क्षण भर में बदल जाती वो मैं नहीं बदल पाया सदियों में हर पल में लगती वो खींचती हुई टूटता नहीं कभी ये भोर का -सा जादू !