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इन दिनों.....

विगत डेढ़ महीन से रेडियो और टी.वी. के लिए स्क्रिप्टों पर काम कर रहा हूं। दिमाग भन्ना सा गया है। कुछ अपनी पसंद का नॉवेल पढ़ने, संगीत सुनने और डायरी लिखने का मन तभी होता है ऐसे किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहा होता हूं। 

दिमाग की हालत हमेशा से बदहवाशी की तरह रही है। सीखता बहुत देर से हूं लेकिन पानी तेज़ी से चढ़ता है। जिस चीज़ से गुज़र रहा होता हूं उसी फॉमेट में दिमाग दौड़ने और सोचने लगता है। अगर किसी उमेठ कर लिखे हुए दिलचस्प नॉवल के पांच पन्ने पढ़ने के बाद उसी तरह से दुनिया दिखने लगती है। आधे होते होते लगता है जैसे मेरी किताब है, उत्तेजना बनी रहती है और पूरा होते होते सारा जोश ठंडा हो जाता है जैसे ऐसी भी कोई खास बात नहीं थी मेरे लिखने में। यही वजह है कि कभी कभी शब्द फीके लगते हैं। 

विभिन्न जॉर्नर में और अलग अलग मीडियम के लिए लिखने में एक बड़ा खतरा एक खास तरह की बीमारी के शिकार हो जाने का खतरा रहता है जिसमें वहीं चीजों को जोकि कागज़ या कंप्यूटर पर लिखी जा रही होती है सामने घटती हुई प्रतीत होती है, लिखने वाला अपनी सोच के मार्फम अपनी कलम की रोशनाई से गुज़रता हुआ कागज़ पर लिखे जा रहे घटनाओं के बाज़ार की शोर में उतर जाता है। इसमें उसे कभी चीजों को दूर से भी देखना होता है तो कभी इतना अंदर जाना होता है कि पाठक/दर्शक/श्रोता को सच्चा लगने लगे। इसे परकाया प्रवेश कहते हैं। साथ ही उस तात्कालिकता मतलब कालखंड में लिखना होता है उस पर एक जिम्मेदारी ये भी कि उस समय भाषा चाहे वो जरूर रही हो लेकिन आपको सामंजस्य बिठाते हुए वो भाषा अंगीकार करनी हो जो बोझिल भी न लगे, जीवंत भी और ज्यादा से ज्यादा लोगों के समझ में भी आ जाए। उस पर से जिम्मेदारी यह कि मिस्टर फलाना और तलाकशुदा मैडम चिलानी के डॉयलॉग लिखने में इतना भी परकाया प्रवेश न कर लें कि स्क्रिप्ट अपनी तयशुदा समय से लंबी हो जाए। वैसे लिखते वक्त कई बार यह दिलचस्प एहसास भी होता है कि सीन दिमाग में फिल्टर होने लगते हैं और लगने लगता है ये वीडियो में ज्यादा इफेक्टिव होगा या ऑडियो में। और कई बार ये सारी बातें आपस में इस तरह गुंथ जाती हैं कि ऊपर लिखी सारी बातें गड्ड मड्ड हो जाती हैं। तब कलम और उंगली मशीन या बकवास करने वाला कोई मुंह बन जाता है और जाने क्या क्या बकने लगता है।

मेरी तमाम काहिली में एक खूबसूरत चीज़ यह भी है कि मैं लिखकर कुछ दिखाने से ज्यादा अच्छा लिखने संबंधी फीलिंग को महसूस कर सकता हूं, उस पर आपसे बातें कर सकता हूं। जैसे लिखना क्या है, लेखन में किन बातों को तवज्जो देना चाहिए, भाषा कैसी हो, उदाहरण कैसे हो, उन उदाहरणों से इंसानी मनोविज्ञान कैसे परिलक्षित हों, उसका रिएक्शन क्या हो, ऐसी भी प्रतिक्रिया न हो कि हमारा अकेले का दिल उसे अपना न सके बल्कि वो हो जो हम छुपा कर रखते हैं। लेखन कैसा हो, उसकी जिम्मेदारी क्या हो, क्या उसे सरोकारों से वास्ता रखना चाहिए?

आज ऐसे ही सुबह बाथरूम में बेसिन के नीचे का एकांत देखकर लगा कि ये कोना कितना तनहा है। पिछले कई दिनों में मैंने अपनी तनहाई कहां खो दी है। ये ठीक है कि अकेला ही लिखता रहा हूं लेकिन फिर भी लिखे जा रहे किसी न किसी घटनाओं के चिल्ल-पों के साथ ही रहा। लगा कि मैं कम से कम तीन मिनट के लिए भी अपने घुटने मोड़ कर उस छोटी सी जगह में बैठ जाऊं। 

असल में तकलीफ की आदत हो जाए तो यही मज़ा देने लगती है। एक नए गाने की तहत जिसकी ये लाइन सुनी तो लगा इस रचनात्मक दुनिया में दिल में छुपे विचारों की चोरी के लिए कहां शिकायत करने जाऊं। गाने के बोल हैं - लहू मुंह लग गया। 

फिलहाल स्टूडियो में कई वीओ आर्टिस्ट आई हुई हैं और दरवाज़े के बाहर उनकी ऊंची हील वाले सैंडिलें रखी हुई है। सपनों की बुनियाद ऊंची है। बहुत ही सख्त चीज़ें मुलायमतर को संभालती है। एक लाल रंग की ऊंची सैंडिल किसी प्यासे चिड़िया की तरह अपनी चोंच खोले हुए है। क्या अपनी व्यस्त जिंदगी में वो वीओ आर्टिस्ट ये सोच सकेगी कि आज किसी ने मेरी सैंडिल को वक्त दिया और फिर मेरे गुदगुदे, मांसल तलवों का ख्याल किया?

तो आप मेरे बिना लिखे समझ रहे हैं न कि लिखना क्या होता है? लिखना वो होता है कि...........

Comments

  1. ओह! इतना दबाव होता है लेखन में..

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  2. कल 07/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  3. असल में तकलीफ की आदत हो जाए तो यही मज़ा देने लगती है। एक नए गाने की तहत जिसकी ये लाइन सुनी तो लगा इस रचनात्मक दुनिया में दिल में छुपे विचारों की चोरी के लिए कहां शिकायत करने जाऊं। गाने के बोल हैं - लहू मुंह लग गया।

    bahut khoob likha hai... achha laga aapko padhna.

    shubhkamnayen

    ReplyDelete

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