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पार्क में उड़ता पर्चा...




गन्ने का जूस निकालने वाले मशीन और जीवन में यही समानता है कि दोनों रस भरे आदमी का कचूमर निकाल देते हैं। कहीं कारखाने का मशीन भी ऐसा करती है तो कहीं किसी प्राईवेट आॅफिस में काम करने वाला मुलाजिम का भी यही हाल होता है। नया नया प्रेस ज्वाइन किया हुआ पत्रकार भी पिसता है। तो सिर्फ जवान और खूबसूरत होने की योग्यता, जब बोलने पर हावी हो जाए तो देर रात तक लम्बी शिफ्टों में समाचार पढ़ने वाली टी.वी. एंकर भी, जो चैनल वाले कम पैसों पर नियुक्त करते हैं। मतलब कि शोषण हर जगह है। मंटो से मुत्तासिर मैं सबसे पहले इसलिए हुआ कि उसने पचास बरस पहले यह लिख गया कि मौजूदा दौर किसी इंसान की गोश्त या खून की वाजिब कीमत अदा नहीं करता। अव्वल तो वो अदा करना नहीं चाहता।

लेकिन मैं यह सब तुमसे क्यों कह रहा हूं? जाने कहां से ख्याल आया मुझे कि अधिकतर इंसान भी इंसान से एक खास समय तक ही मुहब्बत रखते हैं गोया वो इंसान नहीं जैसे एक रस भरा आम हो उसे सबसे जवान समय में चूसो और जब लगे कि उसमें कुछ बाकी न रहा हो तो कोई दूसरा खोजने में लग जाओ। इसे मेरी तल्खी से जोड़कर मत देखो कि तुम्हें भी ईश्क में जूनून चाहिए था जो मुझे जैसे आशिक ही कर सकते थे और प्यार में पागलपन के बाद जब हसीन जिंदगी का वक्त आया तो तुमने समझदारी का दामन पकड़ते हुए एक जिम्मेदार मर्द को चुनना पसंद किया। तो मतलब तुम्हारी अपनी जिंदगी के लिए भी तुम्हें कम से कम दो मर्द चाहिए थे।

जो तुम आज हो वही कल भी थे पर जो तुमने कल किया था वो आज तुम्हारे लिए बचपना हो जाता है जिसका जिक्र करना तुम्हें तौहीन लगता है। अपने अक्स पर धब्बा लगता है। मुझे लगता है कि आज थोड़ी देर का दर्द, कष्ट या वियोग का दुख तमाम जिंदगी की सुख सुविधाओं से कमतर है। बहुत भरोसा है तुम पर तो चलो माना कि तुम भी शदीद किस्म की तन्हाई में रोज दस मिनट मर मिट लेती होगी लेकिन कनाडा की उस ऊंची इमारत से जब गगनचुंबी इमारतों को देखती होगी तो, बच्चे को बर्फ पर स्केटिंग करना सीखाती होगी तो, शानदार मोल्स में शोपिंग करती होगी तो और पार्टियों के लिए तैयार होती होगी तो, लजीज़ खाना खाती होगी तो, यक़ीनन मेरा ख्याल ज़हन में नहीं उभरता होगा। 

तुम्हारे मुत्तालिक मेरे दिल में सबसे कमजोर कड़ी यह है कि तुम्हारा दुख मेरे लिए सबसे बड़ा नहीं है बल्कि यह तो सबसे आसान का दर्द है जिसे मैं लिख डालता हूं ज़रा उस दुख के बारे में तो सोचो जो जिसको मैं अंदर ही अंदर जिबह किए जाता हूं और जिसको सफहों पर उतारने में मेरी हाड़ मांस तक कांपने लगती है। अप्रत्यक्ष रूप से यह तुम्हारे धोखे जैसा ही है। मैं इन्हें धोखा और भुलावा देता रहता हूं। मैं याद दिला दूं तुम्हारा धोखा देना कोई बड़ी बात नहीं। जैसा कि खत को पढ़कर तुम्हें महसूस होता है कि मैंने तुमपर तोहमत लगाए हैं। कि मैं बड़ा पाक साफ हूं और तुम्हें ऐतिहासिक रूप से कोई विलेन बना रहा हूं। यही काम कहीं तुम भी कर रहे होते हो बस किरदार बदल जाता है। (मसलन मैं लिखूंगा तो उसमें कोई स्त्री होगी तुम लिखोगी तो बहुत संभव है उसमें वो किरदार पुरूष होगा ) 

ये मौलिक रूप से वही बातें हैं जो मेरे दिमाग में आ रही हैं और मैं बिना लाग लपेट और चाशनी के तुम्हें बता रहा हूं। यह दुनिया देखने की अनुभव से उपज रहा है और इसमें मुझे लगता है प्यार का सिक्का उछालने में पाना और ना पाना को सिक्के के दो पहलू माना जाना अब छोड़ देना चाहिए। एक कविता याद आ रही है कि जिसमें नायक नायिका को प्यार करता है और एक शाम किसी नदी तट पर प्यार कर रहा होता है और उसके जुल्फों से खेलते हुए उसके बालों को गले से बांधकर उसकी जान ले लेता है। फौरी तौर पर कह देना मुमकिन है कि वह प्यार नहीं था क्योंकि अक्सर हम होशमंद होते हुए विवेकपूर्ण परिभाषाएं गढ़ते हैं। 

तो चरित्र में उतरो मेरी जान !

इन दिनों ये जो पर्चे लगातार उड़ा रहा हूं, यह सब भी तुम्हारे मुहब्बत के बाइस है। क्या लिख रहा हूं, इसका क्या मतलब निकलता है यह सब सवाल ऐसे ही हैं जैसे क्यों इतने दिन क्यों जिया, और जी कर क्या हासिल कर लिया, तुम्हें प्यार ही करके क्या मिल गया आदि आदि।

फज़ा में शराब बरस रही है, खून रिस रहा है, और हम अपने पीरियड्स के खत्म होने का इंतज़ार कर रहे हैं। तुम पढ़ कर कहोगे - खुदा खुदा ! हम भी जी कर यही कर रहे है, बस ज़रा गुहार का स्वाद अलग है।


Comments

  1. फज़ा में शराब बरस रही है, खून रिस रहा है, और हम अपने पीरियड्स के खत्म होने का इंतज़ार कर रहे हैं। तुम पढ़ कर कहोगे - खुदा खुदा ! हम भी जी कर यही कर रहे है, बस ज़रा गुहार का स्वाद अलग है

    अरे कसम से ये ही सोच रहे हैं....

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  2. तो चरित्र में उतरो मेरी जान !
    बहुत उलझा हुआ

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  3. फज़ा में सोचलय घुल जाए तो भी नशा कुछ और ही होगा..

    जबरदस्त कलम चलायी है..

    नोट : ऊपर वाली लाइन पिछली दो पोस्ट्स के लिए है..

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  4. काम जितना ग्लैमरस दिखता है, उतना ही गन्ने जैसे पेरा जाता है।

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  5. क़त्ल का ज़ख्म बहुत गहरा लगता है... जिस दिन भरेगा... धोखे का अहसान मानोगे... :-)

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  6. मोहल्ले से गुजरा था..
    एक परचा खूबसूरत मिला

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  7. पता नहीं कौन-सी रौ में हो आजकल...विगत दो पोस्टों की रंगत और आज फिर ये। बदले-बदले से हमारी सरकार नजर आते हैं/घर...ओह सारी, ब्लौग की बर्बादी के आसार नजर आते हैं" ।

    खैर, ...कि तुम खुले आम कह रहे हो "कृपया कमेंट्स को अपनी बाध्यता या मज़बूरी ना बनाएँ. हाँ गलतियाँ और कमियों का स्वागत है. शुक्रिया"..तो कह ही देता हूँ, इतनी धाकड़ लेखनी और अचम्भित करते बिम्बों के दरम्यान चंद लिंग-भेदों की गलतियां हलकान करती हैं। वहीं कुछ बिम्ब महज नये बिम्ब क्रियेट करने की आकांक्षा{महत्वाकांक्षा} में पूरे भाव को मरोड़ डालते हैं। जैसे पोस्ट का पहला जुमला ही...अब गन्ने-जूस वाली मशीन गर रस भरे आदमी का कचूमर निकालने लगे, तो हर मोड़, हर नुक्कड़ पे कैसे-कैसे हादसे होंगे...उफ़्फ़्फ़, सोच कर ही सिहर उठता हूँ। हा! हा!!

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  8. पर अलग अलग गुहारों के स्‍वाद लेने की भी कोई मजबूरी थोड़े ही ना है, हि‍म्‍मत हो तो हुंकारों वाला जीवन भी जि‍या जा सकता है...पागल नि‍राला को जानते हो ना डि‍यर।

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  9. कमेन्ट देना बाध्यता बन गया है, क्यूंकि कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या कहूँ , पर उपस्थिति भी दर्ज कराना चाहता हूँ , ये बताने के लिए कि बेहद पसंद आया ये गद्य ...

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