Skip to main content

मरियम...





तुम जानते हो सुख क्या है ? बहुत हद तक तो मैं भी नहीं जानती लेकिन फिर भी उसके आसपास का सच महसूस करती हूं। वैसे भी इंसानी एहसासों को पूरी तरह से जानने का दावा कौन कर सकता है? बड़े बड़े मनोवैज्ञानिक भी ग्राफ चार्ट की मदद, सर्वे, प्रतिशतों का खेल, औसत लोगों पर किए गए अध्ययन से ही अनुमान लगाते हैं। पूरी तरह से जानने का दावा वो भी नहीं कर पाता। कभी उनके कथनों पर गौर करना तुम्हें मैं सोचता हूं कि, मुझे लगता है कि, ऐसे मामलों में मुख्यतः ऐसा होता है कि, सामान्यतः लोग ऐसा कहते/करते हैं, मेरा अनुभव या अध्ययन फलाना कहता है, मिस्टर एम के साथ इसी हालात में चिलाना कदम उठाया था, कई इंसान औरत की तरह भी हो सकते हैं, वो पानी की तरह हो सकते हैं, जो ढ़लान देखकर उधर की ओर सरक जाता है। ब्ला...  ब्ला... ब्ला...

मैं अपनी हाल-ए-दिल कहूं तो मुझे आज तक नहीं लगा कि मैं प्यार में हूं। वो जब मेरे साथ होता है तो मुझे बस अच्छा लगता है। जरूरी नहीं है कि मैं उसका चेहरा देखती रहूं। हम पार्क में एक दूसरे से उलट अपनी पीठ सटाए मूंगफली खाते हैं तो भी मुझे सूकून रहता है। और उसके आस पास होने का भ्रम भी मुझे संतुष्ट रखता है।

मुझे उसके लिए चिंता करके अच्छा लगता है। बड़ा सुख मिलता है जब वो बहुत देर से आने के बाद भी मुझसे लिपट जाता है। मेरे सीने में उठती गर्म गुस्से की धधक कुछ ही सेकेण्ड में गाइब हो जाती है। मैं उस पर गुस्सा होना चाहती हूं। कई बार तो बस इसलिए मैं उस पर किए गए गुस्से को महसूस करना चाहती हूं। गुस्सा करने के क्रम में उसके चेहरे पर उगते भावों को देख उसे पूरी तरह समझना चाहती हूं। मैं इसका नाटक भी करती हूं। लेकिन मेरे शब्दों में वज़न नहीं पड़ते। वो आकर मुझे ऐसे थाम लेता है कि मैं घनीभूत बादल की तरह बेशुमार प्रेम बरसाने लगती हूं। उसके पाश एक मर्दाना बरगद की पाश नहीं अलबत्ता एक नवजात शिशु के हाथ की सबसे कनिष्ठा उंगली की तरह हैं जो भूले से कभी किसी अंजान से स्पर्श पर उसमें नेह और अथाह प्रेम का समंदर लुढ़का देती है। लौकी के नए और कोमल लटों की तरह जो सहारा पाने की चाह में घुंघराले हुए जाते हैं।

देर रात जब भी वो मेरे पास सरकता है तो हल्की की रोशनी में वो एक घर से भटका एक बच्चा सा लगता है जो आधी रात की गम की बारिश में मुझे एक गुलमोहर का पेड़ समझ मेरे नीचे पनाह पाने आ जाता है। कई बार तो घुप्प अंधेरे में भी मैं उसका चेहरा देख लेती हूं। वह परेशान मेमने की तरह मुझमें घुसता है, मुझे सर से पांव तक चूमता है। मुझे संभोग के लिए उकसाता है। मेरे स्तनों को यूं दबाता है जैसे उसके जिंदगी में कोई बड़ी भारी कमी हो। वह कितनी ही कोशिश करता है। मेरे उरोजों को हौले से सहलाते हुए मेरी आंखों में देखता है, मुझपर बहुत गर्म सांसे छोड़ता है, मेरी जांघें गुदगुदाता है, नाभि में थिरकन पैदा करता है। मैं उसके खो जाने के लिए क्षेत्र का विस्तार अपनी बाहें और पैर फैला कर करने की कोशिश करती हूं। (यह उसकी नज़र से वासना का क्षण हो सकता है)

पर ऐन वक्त मुझे यह भी लगता है कि कहीं वो मुझको ठंडा समझ छोड़ ना दे। मैं उससे नज़रे मिलाने से बचती हूं ताकि उसकी चाहत अधूरी ना रह जाए। कई बार मैं उस क्षण का आनंद लेने का नाटक भर करती हूं कि ऐसे मामलों में अगर सहयोग ना करो साथी भी ऊब कर निराश हो जाता है। स्तन वैसे भी है क्या ? अगर जोश, वासना और जवानी का उन्माद गैर हाजिर हो तो बस एक मांस का थक्का, बड़ा टुकड़ा भर! अन्य भौतिक चीजों की पूर्ति के बाद का सौंदर्यबोध! मुझे मामूल है जब वो इस क्षणिक तूफान से निकलेगा तो स्तन के पास मेरे दिल में चैन से छुप कर सो जाने की कोशिश करेगा।

मैं तब भी प्रेम, करूणा और वात्सल्य से भरी होती हूं। मेरे हाथ बरबस ही उसके सर के बालों में घुस कंघियां करने लगती हैं। वह मुझे हिलोरे मारता है जैसे सुबह के बाद, शाम को बछड़े को खूंटे से खोला जाता है तो वह चैकड़ी भरते हुए गाय के पास आता है और उसके थनों को जोर जोर से धक्के देता है। शायद पहले कुछ मिनट तक वह खुद को यकीन दिलाता है कि हां मैं सही जगह हूं - अपनी मां की पनाह में। फिर इत्मीनान से दूध पीता है। आंखें बंद कर चुपचाप। उस पर उसके चेहरे पर वो नीरव शांति देखने लायक होती है। परम शांति। लेखक का एकांत। एक पेड़ से टूटकर गिरता हुआ पत्ता भी सुनाई दे। सृष्टि थम जाती है। शाम की रंग और खुशनुमा, गहरी और वज़न में हल्की होती हुई। उसी पल में मैं उसे पुचकारती हूं जैसे गाय अपनी लंबी गर्दन पीछे कर उसके पीठ को जीभ से चाट रही होती है। उसकी रीढ़ की हड्डी और उभर आती है।

मुझे लगता है कि मेरे अंदर मातृत्व का भाव ज्यादा है। मैं प्रेमिका के रूप में मां का किरदार निभाती हूं। इस पंक्ति का सुधारती हूं। मैं प्रेमिका से ज्यादा मां का किरदार निभाती हूं। मुझे लगता है अधिकांश औरतें ऐसी ही होती होंगी। 

यह बिल्कुल वैसा ही होता है जब किसी सज्जन व्यक्ति माहौल देख कर सोच समझ कर अपनी मुंह से गाली निकालता है तो उसका दोस्त टोक देता है कि तेरे मुंह पर गाली नहीं जंचता क्योंकि तू उसका व्याकरण, वितान और लय नहीं जानता। तू बस इस माहौल में फिट होने की कोशिश करने में, खुद को बड़ा समझे जाने की कोशिश में यह कर रहा है। ठीक ऐसा ही हाल कुछ शराबियों के बीच नए नौसिखियों का हाल भी होता है।

तुम खुद को बहुत बड़ा, दुनियादार, और समझदार दिखाने की कोशिश  करते हो । ऐसा करते हुए तुम बहुत निदर्यी, क्रूर प्रतीत होते हो। पर अगर तुम सचमुच उसे जानते हो तो घटनाएं घटित होने के बाद वह बिल्कुल मासूम भोला सा बच्चा लगता है।

हां तो तुम पूछ रहे थे कि सुख क्या है ? बहुत हद तक तो मैं भी नहीं जानती लेकिन........ ब्ला.........  ब्ला....... ब्ला...

Comments

  1. बहुत सुन्दर रचना| धन्यवाद|

    ReplyDelete
  2. बहुत सुंदर लिखा है आपने !

    ReplyDelete
  3. मुझे लगता है कि मेरे अंदर मातृत्व का भाव ज्यादा है। मैं प्रेमिका के रूप में मां का किरदार निभाती हूं। इस पंक्ति का सुधारती हूं। मैं प्रेमिका से ज्यादा मां का किरदार निभाती हूं। मुझे लगता है अधिकांश औरतें ऐसी ही होती होंगी।
    हां...शायद ऐसा ही है.

    ReplyDelete

Post a Comment

Post a 'Comment'

Popular posts from this blog

समानांतर सिनेमा

            आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, “ अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है ” . युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने ‘ बिराज बहू ’ , ‘ देवदास ’ , ‘ सुजाता ’ और ‘ बंदिनी ’ जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं . ‘ दो बीघा ज़मीन ’ को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था “ इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष्टि से देखता है, यह बड़ी अजीब बात

विलंबित ताल

हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है। आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है। जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है। बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है। पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है। कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है। बारिश अपने ब

मूक सिनेमा का दौर

दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियां   महाराष्ट्र   तक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता में   हीरालाल सेन और जमशेद जी मदन   भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में   प्रदर्शित   होकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों में   प्रदर्शित   करें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारा   निर्देशित   फिल्म ' बिल्म मंगल '   तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहला   प्रदर्शन   नवम्बर , 1919 में हुआ।   जमदेश जी मदन ( 1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।   वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंने   कलकत्ता का पहला सिनेमाघर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस   बनाया। यह सिनेमाघर आ