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जुगनू



वो मुझसे मिली ना थी पर उसे खो देने का डर मुसलसल बना हुआ था.... वो रास्ता चलते किसी किताब में जिल्द की जगह आइना लगी मिली थी... गाहे बगाहे मैं जिसे पढ़ने के बाद आपका अक्स देख लिया करता था, सर पर धूप थी और इन दिनों पेड़ों के झुरमुट से थोड़ी थोड़ी छांह भी लग जाती थी...


"जरा सी फिकर भी तुम्हारे चेहरे को बिगाड़ देते हैं, देखो जरा मैथ के रफ का पन्ना लग रहे हो...

हाँ तो ठीक ही तो है, तुम्हारी हथेली भी तो ऐसी ही है...ढेर सारी आरी तिरछी लाइनें

पर यह चेहरा नहीं है बेवकूफ

क्या सच में ?

मेरे वजूद में बिना दस्तक कई चीजें आती हैं... और आती क्या हैं फिर डेरा जमा लेती हैं... मैं जबरदस्ती जब भी तुम्हारी कल्पना करता हूँ कोशिश करता हूँ कि तुम्हारे जुल्फों के पार देख सकूँ... पर उस पार कितना अँधेरा है...

... तुमसे परे जो है.

सीढियों पर जब भी उसे अपने आगोश में लेने के लिए बाहों से घेरा डालता, पता नहीं क्यों, हर बार उसे यही लगा जैसे अब चूमने ही वाला हूँ... मैं चाहता था वो मेरी आँखों में देखे और वो चाहती थी उसके होंठों के दरारों से बातें करूँ... मैं जब भी उसके बिना जीने की सोचता तब भी वो पहले शामिल हो जाती.

आसमानी रंग आँखों का धोखा ही तो होता है .

पिछली बार इसी रंग में मुझे उजली धारियां दिखी थी. लंबे लंबे, दूर तक ....बहोत दूर तक... जैसे सुखोई या मिग -२१ धुंआ छोड़ता निकल गया हो.

इन दिनों जब मुझे मुहब्बत एक वाहियात सा फुर्सत में निपटाया गया काम लगता है... चलते हुए मैं अपनी परछाई खो चुका हूँ ... मेरी आँखों में दोनों हाथों के हथेली जितनी नींद भरी हुई है और ढेर सारा नशा ऐसे मैं कहाँ संभव था की मैं तुम्हें अपने आँखों में बसा कर रखूँगा...

मैं पलकें बंद करता हूँ तुम गिर जाती हो.

अच्छा बताओ चूमने के लिए सबसे खूबसूरत जगह कौन सी है ? रेडिफ पर जब किसी ने ये यह सवाल पूछा था तो सबसे ज्यादा वोट्स मुझे ही मिले थे, याद है तुम्हें....

हाँ याद है और ऐसे ही हम करीब आये थे... असम के कामाख्या मंदिर में एक घंटी बजी थी...

आखिरी बार जब फोन पर मैं तुम्हारा माथा चूमना चाहा था

उस्सरत आहा !, एटा सुम्मा दिया(मेरे पास आओ और एक चुंबन दो)

आं हां ! सिर्फ.....पलकों पर.

आह !

क्या हुआ ?

सीने में एक बिस्किट का पैकेट रख्खा था... चूर चूर हो गया, लगता है..."

Comments

  1. Bahut sundar kathanak aur kathya!

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  2. संवेदनशील रचना। बधाई।

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  3. संवेदनशील...रचना तो है ही...मगर तुम एक छोटे से "अनुभव" को..बेहद खूबसूरती से पिरोते हो...ये अच्छा लगा..पहली बात तो मैं चित्र से प्रभवित हुआ, शीर्षक और रचना के बीच का क्या सामंजस्य तुम बना रहे थे वो भी पसंद आया..सबसे अधिक "अच्छा बताओ चूमने के लिए सबसे खूबसूरत जगह कौन सी है ? रेडिफ पर जब किसी ने ये यह सवाल पूछा था तो सबसे ज्यादा वोट्स मुझे ही मिले थे, याद है तुम्हें...."

    और

    सीने में एक बिस्किट का पैकेट रख्खा था... चूर – चूर हो गया, लगता है..."....
    ******************************
    तुमने मेरे ब्लॉग में कमेन्ट की शर्त के मुताल्लिक कुछ लिखा है...वो उनके लिए है, जो मेरे किसी भी रचना के किसी भी स्तर को सिर्फ दो शब्दों से नापते है, वो अपने ब्लॉग्स में कमेन्ट की अपेक्षा लिए, हर ब्लोग्स में "बधाई" जैसे शब्दों को दिए फिरते हैं...तुमसे मुझे कोई शिकायत नहीं है...और न मैं तुम्हारे ज्ञान का स्तर जानना चाहता हूँ...तुम्हारी रचनायें मुझे पसंद है...रवि,अनुराग,और तुम्हारे ब्लॉग को मैं सबसे अधिक पढता हूँ..

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  4. चुनाचे ...मै यही कहता हूँ...एक हिन्दुतान वालो किसी लेखक की रोजी रोटी का सही जुगाड़ कर दो....ताकि उसका लिखना उसका सोचालय....रोजमर्रा की ज़द्दोज़हद में गम न हो जाये ......तुमने फिर साबित किया के एक अच्छा पढने वाला ..कैसे वेरिएशन देता है लिखने में ...
    i like your way.bold..and beautiful ..
    कल मुनीश का एक लेख पढ़ा था .उस पर टिपण्णी नहीं कर पाया ...मस्त लगा मुझे....ब्लोगिंग का सही इस्तेमाल

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  5. सोच कहाँ से शुरू करके कहाँ तक ले गये.. रेडिफ वाला सवाल डालना क्रिएटिव थोट था.. बिस्किट का पैकेट भी जबरदस्त था..
    कुछ दिन पहले जयपुर के लिटरेचर फेस्टिवल में ये सवाल उठा था कि उर्दू शायरी में नए शब्दों का प्रयोग नहीं होता.. हालाँकि शीन साहब, जावेद अख्तर और गुलज़ार साहब ने कुछ नए शब्दों वाले शेर भी सुनाये थे.. खैर! मुझे लगता है साहित्य में भी अब नए शब्दों का चलन हुआ है.. एक ट्रेंड सेट हो रहा है.. और तुम्हारी ये पोस्ट उसमे एक एड ऑन है.. हाँ दर्पण की रचनाये भी इसी किस्म की उपज है.. बोले तो खालिस सोना है..

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  6. इस कहानी के कितने वाक्यों से इत्तिफाक रखती हूँ कह नहीं सकती. तस्वीर से जिन्दा होती है एक शख्सियत और लफ्ज़ दर लफ्ज़ जिस्म पर पैरहन डाले जाती है.

    खुलते छिपते मायने, दिखती और कभी उस दरख़्त के पीछे छिपता एक आवारा उड़ा हुआ मैथ के रफ का पन्ना...पहला पैरा इतना खूबसूरत और कोट करने लायक है कि क्या कहें.

    "तुमसे परे जो है" कितने दिलफरेब ऐसे जुमले हैं इस कहानी में, एक लम्हे के कितने रंग...

    अनुराग जी से पूरी तरह सहमत हूँ...तुम जैसे लोगों के पास इफरात समय होना चाहिए...इस सोचालय का दरवाजा खोल कर कहानियां आती रहनी चाहिए.

    कहानी अद्भुत है, शब्द में, शिल्प में, कथानक में...बस क्या कहूँ.

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  7. वाकई.., मगध में कमी नहीं है विचारों की..

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