Skip to main content

अवचेतन में बजती धुन...


सारंगी की पहली तान महज़ रियाज़ के वास्ते बजी थी यकायक लगा रेखा यानि उमराव जान अवतरित होकर अब तर्ज़ छेड देगी. लेकिन उस्ताद ने ऐसा समां बंधा और लोगों ने ऐसी दाद दी रिहर्सल रूम लाइव कॉन्सर्ट में तब्दील हो गया. उस्ताद शेर बन कर बजने लगे. ढोलक ने साथ दिया तो माहौल खुशनुमा हो गया. जुगलबंदी सर चढ़कर बोलने लगी. फिजा में नफासत घुल गयी और सारे संगीतप्रेमियों के माथे पर दिन भर की शिकनें समतल हो गयी. बारी-बारी दोनों उस्ताद अपनी पारी आजमाते, एक में भाव विभोर होते तो दूसरा हमारी तन्द्रा तोड़ देता... हम संगीत कि अठखेलियों पर झूम रहे थे... सरस्वती ने अपने गोद में हमें लेकर ऐसा मंत्रमुग्ध किया कि हम अपनी सुध-बुध हो बैठे...

गांव में ऐसे ही किसी उचाट और अलसाई सी दोपहर में गोरखधाम से से कुछ सारंगी वाले आये थे और शाम तक सारंगी द्वार पर बजायी थी. उन दिनों मैं अपनी सारी जरुरी चीजें झोपडी जो कि टाट कि बनी थी, उसमें खोंस कर रखता... उसमें मैंने कई भूले बिसरे धुन भी रख छोड़े थे... जब से घर छोड़ कर निकला तब से जब भी घर को याद किया है मैंने यही धुन अवचेतन में हावी हो गया है. त्योहारों के दौरान मैंने अपने गांव की कई माओं को सारंगी की इसी धुन पर रोते देखा है जिनका बेटा या तो इश्क में गिरफ्तार होकर घर से भागा या नौकरी करने घर से निकला या आत्महत्या की. सारंगी अक्सरहां ऐसे दर्द छेड देती है.

प्लास्टर झडे दीवारों कि छांह में बजाये गए बंजारों कि सारंगी आज भी रात के अंतिम पहर मेरे कानों में बजती है.

आज भी मैं अपने काम से निकल रहा था और पाँव यूँ ठिठके की अपनी पराधीनता मैंने स्वीकार कर ली... अपने मन से कहीं बंधने में कितना आराम है ना !

जरा आप भी सुनिए, शायद कहीं कोई सिर्फ आपकी आत्मा से प्यार करने वाला सूरत आपकी जेहन में उग आये.




प्रस्तुतकर्ता सागर पर Friday, April, 02, 2010

Comments

  1. सारंगी की धुन अपने आस पास कई बार सुनी है.. हमारे राजस्थानी संगीत की एक खास पहचान है..

    ReplyDelete
  2. सच बात ये है कि सारंगी की आवाज, पता नहीं क्यूँ, मुझे बचपन से हीं पसंद है...
    मैंने एक बार, वो जो घर-घर घूम कर सारंगी बजाते हैं और अपना जीवन यापन करते हैं, उनसे सारंगी सीखने के लिए प्रार्थना की थी पर वे नहीं माने थे...
    इस संगीत को उपलब्ध कराने के लिए शुक्रिया. इसे सुनकर मेरे माथे की शिकन भी समतल हो गयी. वाह!
    राम नारायण जी का सारंगी पर राग मालकौंस कभी मिले तो रात दस बजे के बाद सुनियेगा, फिर बताइयेगा.

    ReplyDelete

Post a Comment

Post a 'Comment'

Popular posts from this blog

समानांतर सिनेमा

            आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, “ अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है ” . युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने ‘ बिराज बहू ’ , ‘ देवदास ’ , ‘ सुजाता ’ और ‘ बंदिनी ’ जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं . ‘ दो बीघा ज़मीन ’ को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था “ इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष्टि से देखता है, यह बड़ी अजीब बात

विलंबित ताल

हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है। आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है। जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है। बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है। पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है। कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है। बारिश अपने ब

मूक सिनेमा का दौर

दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियां   महाराष्ट्र   तक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता में   हीरालाल सेन और जमशेद जी मदन   भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में   प्रदर्शित   होकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों में   प्रदर्शित   करें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारा   निर्देशित   फिल्म ' बिल्म मंगल '   तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहला   प्रदर्शन   नवम्बर , 1919 में हुआ।   जमदेश जी मदन ( 1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।   वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंने   कलकत्ता का पहला सिनेमाघर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस   बनाया। यह सिनेमाघर आ