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ऐसी उदासी बैठी है दिल पे...




कैमरा घूमता हुआ पर्देदार बाथरूम को दिखता है, जहां शुरू में अँधेरा है पर आसपास चंद मोमबत्तियाँ जलने के बायस पीली रौशनी ने घेरा बना रखा है और इसी के वज़ह से देख पाने लायक उजाला है... यह देख कर देखने कि जिज्ञासा और बढ़ जाती है ठीक वैसे ही जैसे थोडा दिखाना और बहुत छिपाना

पृष्ठभूमि में बांसुरी बजता है.

कैमरा फिर बाथटब पर फोकस करता है, जिसमें रखे गुलाब की पंखुड़ियों के बीच निर्वस्त्र नायिका नहा रही है, सीन पीछे से लिया जा जाता है... नायिका बाथटब में गर्दन पर हथेली लिए उठती है, उसके लगभग कन्धों को छूते बाल बेहद अनुशासित हैं.....इसी दरम्यान अँधेरे और पीली रौशनी से मिलकर थोड़े सुनहरे और तम्बाई  रंग के रौशनी के बायस नायिका का भीगा हुआ, गदराया पीठ जिसमें कई करवटों के पेंच हैं और जोकि गालिबन गोरा है, नमूदार होता है. उठते वक्त उस गीली धडकती दीवार पर गुलाब कि एक पत्ती भी चिपक जाती है. जो तुरंत ही बगैर किसी सराहे के गिर भी जाती है... फिर नायिका अपनी आखिरी अंगूठी भी उतारती है


... और दर्शक फटी आँखों से एकटक निहारे जा रहे होते हैं, सोचने-समझने की शक्ति क्षीण हुआ जाती है, एकाग्रता अपने पराकाष्टा पर होती है लेकिन उसी पल में कुछ और भी देखने को चंचल हुआ चाहती है. यह एकाग्रता और चंचलता का अनोखा संगम होता है, जैसे उठकर जाने का ख्याल तो आता है पर उठ नहीं पाते... एक गैर-इरादतन दीवार खड़ी हो जाती है...  मन का हिरण देह के जंगल में कुचालें भरते हुए यहाँ से वहाँ दौड़ने लगते हैं, पलकें हल्की गर्म होने लगती है.

अचानक नायिका कुछ उठाती है और अपने हाथ की नस पर ब्लेड रखकर, 
नहाये हुए शराब और गुलाबी पानी में अपने खून का रंग घोल देती है. दरया में भगदड़ मच जाता है... जिस्म का खून, बाथटब के पानी से लोहा लेने लगता है, हलचल मच जाती है, नायिका की आँखें भर आती है, गले की हड्डी खींच जाती है... और दर्शक एकबारगी यह नहीं सोच पाते कि ऐसा करते हुए वो राहत महसूस करेगी... उसके चेहरे पर मुस्कान घुल चुकी है. कैमरा उसके प्रसन्नचित्त चेहरे को होल्ड करके रखता है. और पूरे सीन की सारी खूबसूरती पीठ से निकल फिलोसोफी में घुलने लगती है.

इस तरह, सारे आनंद, सारी सुविधाओं के बीच दर्द यह बताना नहीं भूलता कि बेटा मैं शाश्वत रूप से तेरे साथ हूँ.
यह बिलकुल ऐसा ही लगता है जैसे...

स्वीमिंग पूल में बड़ी हसरत से तैरने उतरे, थोड़ी देर बाद अघाकर डूब मरे फिर लाश भारी हो तैरने लगा.


Comments

  1. वैसे ये पिक्चर अच्छी थी....देखा जाये तो कंगना पिछले दिनों ऐसी इमागे में बांध गयी थीं....खैर इस टिपण्णी का यहाँ क्या मतलब....बेवजह

    हाँ एक बात तो कहना ही भूल गया ....गाना मेरा पसंदीदा है

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  2. ाभी देखी नहीं। आभार।

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  3. रोमांच न जीने देने का, खुद को।

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  4. हाँ ! फिल्म मुझे भी बहुत अच्छी लगी थी, अपनी जिंदगी जैसी, उदासी से भरी हुई. और कंगना, एक तो उसकी खूबसूरती और दूसरे दर्द भरी आवाज़...

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  5. मुझे फ़िर तबाह कर
    मुझे फ़िर रुला जा
    सितम करने वाले कहीं से तू आ जा...

    मैं ज़िंदा हूँ लेकिन कहाँ ज़िंदगी है...
    (इसे पोस्ट पर कमेंट न समझा जाय..)

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  6. आपका अंदाज़े बयाँ किसी फिल्म से ज्यादा रोचक ...

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  7. रिपिटेटिव...! ये तो हुई पहली बात

    अब दूसरी बात..
    बांसुरी बजता है.= बांसुरी बजती है..
    गदराया पीठ = गदरायी पीठ
    भगदड़ मच जाता है = भगदड़ मच जाती है

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  8. @ ओह कुश ! शुक्रिया भाई,

    मैं सोचता था वर्तनी सम्बन्धी गलतियों पर मैंने काबू पा लिया है या फिर अब नाम मात्र कि गलतियाँ होती होंगी... इस बार ज्यादा है.. यह सिलसिलेवार सोचने का कारन लिखते जाने से है... अभी दुबारा से मैंने भी पढ़ी तो वाकई अबकी कुछ ज्यादा है सचमुच... मुझे भी इस लिंक पर अमल करना होगा
    http://nayibaat.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html

    रही रिपिटेतिव कि बात तो कुछ 'लम्हों' का सिर्फ दोहराव ही नहीं होता बल्कि वे ही हमें आगोश में ले लेते हैं अलबत्ता हम मछली कि तरह कभी कभी फिसल जरूर जाते हैं पर कब तक ? कल ये गाना देखा था तो पसंद आई... पसंद आई तो लिख भी डाला कुछ लेकिन मकसद दूसरे हिस्से को एक्सप्लोर करना था पर कामयाब पहले हिस्से में हुआ ...

    सोचालय यही तो है... दर्ज करना जो दीखता जाये और जो दिखने से रह जाये ... तो आदमी, एहसासात यह सारे रिपिटेतिव ही तो हैं, शक्लें भी तो.

    जैसे आपने खुल कर कही आगे भी कहिये... रही इस ईमानदार रिपिटेतिव कि आपकी बात तो ऐसे हालात में वो शायद आगे भी होंगी पर कोशिश रहेगी कि वो परदे के पीछे हो.

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  9. kangana ko jab bhi dekhoo toh ek hee khaya atta hai " एक बिगड़ी हुई मॉडल आधी चड्डी पहने हुए किसी छत के खिडकी पर बियर की बाटल लिए , सुट्टा मारते हुए अपने बेवफा प्रेमी की शिकायत कर रही है ."


    कंगना रावत को अपनी पहली फिल्म से अच्छी पहचान मिली पर उस दिन से उस ने एक ही role करने की ठान ली .

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  10. bahut badhiya post...aap bahut acchhaa likhte hain.

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  11. लाश भारी हो तैरने लगा. ..लगी और ऐसे ही अनेक उदाहरण प्रवाह रोक रहे हैं ट्ब में डूबने का. :)

    देखी तो नहीं फिल्म...

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  12. क्या कहा जाये! अच्छा है!
    उदास होने की बात पर अंसार कम्बरी की कविता याद आती है!

    फ़िर उदासी तुम्हें घेर बैठी न हो
    शाम से ही रहा मैं बहुत अनमना

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  13. पता नहीं फिल्म है जा जिन्दगी ...जो भी हो जिन्दगी इन सबके बिच खुद अक फिल्म बन के कलेंडर की तरह लटकी है...दर्शक देख रहे हैं...कुछ और हसरत से...जिन्दगी मर रही है ..हमारी कल्पना पर कुछ पतित कल्पनाएँ हावी हैं........

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