Skip to main content

सरगर्मियां

/जुम्मे का दिन/

आम के बगीचे के बाद सड़क किनारे एक मस्जिद. क़ुतुब मीनार के जैसे एक ऊँची जाती लंबी इमारत. बढ़िया संगमरमर लगा हुआ है और सबसे ऊपर टंगा है एक चमचमाता संकेत चाँद और तारा. ठीक बाजू में एक लाउडस्पीकर जहां से इमाम तक़रीर कर रहे हैं  हमें अपने वालिदेन की खिदमत करनी चाहिए. वजेह उस खुदा, पाक परवरदिगार का सरमाया हम पर है और यह ज़िन्दगी जन्नत है, वालिदेन की खिदमत ना कर के हम खुद को दोजख के लिए तैयार करते हैं. सुपुर्द-ए-खाक के वक्त हमारी ज़िन्दगी मुकम्मल नहीं होती और रूह खुदा से मिल कर पाक नहीं हो पाता. इसलिए गरीबनवाज़ को हाजिर-नाज़िर जान वालिदेन की खिदमत करो.

मस्जिद के ठीक पीछे सड़क उससे लगती हुई बद से बदतर हालत में एक नाला जिसका गंदला पानी जाम है. नाले से सटते ही मुसहरों का टोला जहां के लोग सूअर मार कर, चूहे खा कर, अफीम, गांजा पीकर अपनी लुगाई को पीट कर, बच्चों के कूड़ा उठवा कर गुज़ारा करते हैं.

टोला खत्म होते ही रेलवे लाइन जहां कोई हाल्ट नहीं है एक चाय की दूकान और उस पर कुछ लोगों की बातचीत

पिछली बार का पोलिंग एजेंट (जो बहुत संभव है की इस बार भी होगा) : हम तो कहते हैं इस टोले को कम से कम बड़े वाला ड्रम से तीन ड्रम दारु चाहिए.

एक कार्यकर्ता... पार्टी : अबकी तो देखे के भी पड़ी ई भोसड़ी वाले किसपर ठप्पा लगाते हैं.

दूसरा कार्यकर्ता : जे तो हुई इस टोले की बात, उस पार ?

तीसरा कार्यकर्ता : उधर के लिए आठ राजदूत तैयार है, झंडा-वंडा सब...

पहला : तो अभी यादव इतने से मान जायेंगे ?

दूसरा : और इंतजाम भी है हो, अबकी सबको गंगा पार से इधर बसाना है इसी भूमिहार और बाभन के बीच में

तीसरा : दू साल से फुसला रहे हो, वोट नहीं दिया तब ?

पहला : देगा कैसे नहीं, नदी किनारे बालू पर परवल कब तक उगायेगा ?

पहला : और पासवान ?

तीसरा : उ पटना मुश्किल है भईया

दूसरा : काहे ?

पहला (मुस्कुराते हुए ) : अभी त दोस्ती भी है ?

तीसरा  : लेकिन पिछवाड़े पर लात मारने में केतना टाइम लगता है ? और हेहर हैं आपलोग जो आगे भी लात खाने को तैयार हैं...

पहला और दूसरा (एक साथ ) : अरे मौगी के नखरा और दुधारू गाय के लताड सहे ही पड़े है ... काहे से तू जाने है ना की दोनों से का मिले है ? जाने है की ना ?

तीसरा : (गुटका का पीक फैंकते हुए) : उ त ठीक, कोई जुगाड करते हैं पर हम ?

पहला : का तुम, पार्टी महासचिव बनोगे ?

दूसरा :  उ भी हमरा रहते ?

तीसरा : ना पर कम से कम लाख रुपैया

पहला (हँसते हुए) : हिंदुस्तान ले ले बेट्टा

दूसरा :  ई बकवास सुन रहे हैं इसके लिए का सोचा है (लाउडस्पीकर से आती आवाज़ की ओर इशारा करते हुए)

पहला : जो रे साले, सबके सोचेगा ? अपने जात का सोच, गला साफ़ कर और शुरू कर अभियान

दूसरा : त वही M + Y फार्मूला (मुस्लिम यादव समीकरण )

तीनो (एक साथ) : हे हे हे !

***
(अभियान शुरू हो चुका है, गौरतलब है की बिहार विधानसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं... सो जारी है...)

Comments

  1. अच्छा चित्र खींचा है, मियाँ

    ReplyDelete
  2. badiyaa.. gehre utre ho rajniti mein

    ReplyDelete
  3. पूरा चुनावी समीकरण है समेटे ये पोस्ट...बेहतरीन है

    ReplyDelete

Post a Comment

Post a 'Comment'

Popular posts from this blog

उसने दिल पर चीरा लगाकर उसमें अपने होंठों का प्राणवान चुम्बन के बिरवे रोप दिए।

सौ तड़कती रातें हैं फिर एक मिलन का दिन है। एक हज़ार बद्दुआएं हैं, फिर नेमत की एक घनघोर बारिश है। बारिश कम है जीवन में, प्यास अधिक। इतनी अधिक कि कई बार बारिश के दिन भी प्यास नहीं बुझती। लगातार लगती प्यास हमें मारती है, पत्थर बनाती है। सूखे प्यास का नमी भरा एहसास बारिश वाले दिन ही होता है। दरअसल आज जब मेरी प्यास बुझ रही थी तब मुझे अपने प्यासे होने का सही अर्थ संदर्भ सहित समझ में आया। xxx उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो एक ढाढस सा लगा जैसे कोई एक सक्षम व्यक्ति कारगर उपाय बता रहा हो। वो अनपढ़ जाने किस तरह की शिक्षित है कि वह मुझ जैसे अहंकारी में भी कृतज्ञता का भाव पैदा कर देती है। xxx हमने बहुत कोशिश की एक होने की। लेकिन इसी प्रयास में हमारा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि हमें एक दूसरे की जरूरत हमेशा रहेगी और हम अधूरे ही रहेंगे। यहां तक कि जिस जिस चुंबन में हमने अपने आप को पूरा समेट कर एक दूसरे में उड़ेल दिया, वहीं वहीं हमें अपने विकलांगता का एहसास हुआ। xxx कोई मां बाहर अपने बच्चे को मार रही है। बच्चा ज़ोर ज़ोर से किकियाए जा रहा है। मां गुस्से में उसे और धुन देती है। बच्चे

समानांतर सिनेमा

            आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, “ अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है ” . युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने ‘ बिराज बहू ’ , ‘ देवदास ’ , ‘ सुजाता ’ और ‘ बंदिनी ’ जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं . ‘ दो बीघा ज़मीन ’ को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था “ इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष्टि से देखता है, यह बड़ी अजीब बात

विलंबित ताल

हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है। आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है। जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है। बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है। पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है। कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है। बारिश अपने ब