कभी-कभी बहुत उदास लगते हो. क्या बात है? ज़िंदगी तो यूँ ही सामान किश्तों में खर्च होती जायेगी. तरक्की करने से ज्यादा ज़रूरी है, हर पल को जीना. दौड़ने से ज्यादा अच्छा है, नजारों को देखते हुए, मौसम को महसूसते हुए, हवा की छुअन का अनुभव करते हुए चहलकदमी करना. है ना ?
पढ़ा था...ये बताना है, कुछ जवाब भी देना है...उसके लिए फुर्सत से वापस आउंगी.
ReplyDeleteआप जैसे हैं, वैसे ही बने रहें, लोगों को बदल लेने दें।
ReplyDeleteकभी-कभी बहुत उदास लगते हो. क्या बात है?
ReplyDeleteज़िंदगी तो यूँ ही सामान किश्तों में खर्च होती जायेगी. तरक्की करने से ज्यादा ज़रूरी है, हर पल को जीना. दौड़ने से ज्यादा अच्छा है, नजारों को देखते हुए, मौसम को महसूसते हुए, हवा की छुअन का अनुभव करते हुए चहलकदमी करना. है ना ?
:(
ReplyDeleteबहुत खूब, लाजबाब !
ReplyDeleteबीतने-रीतने का संकेती बियोग भी प्रिया-बियोग से कम नहीं होता ! फिर भी .. '' लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है '' !
ReplyDeleteसागर सर, ये उदासियाँ लम्बीं नहीं चलनी चाहिए. शाम के समय पार्कों में पक्षियों का चहचहाना तो मुझे यही सन्देश देता है.
ReplyDeleteस्पष्ट पढ़ नहीं पाई .....
ReplyDeleteलेखक बड़ा हो रहा है... अच्छा शगुन है!!
ReplyDeleteसुना था आइना बोलता है...यहाँ तो लिखता भी है...
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