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समान वार्षिक किश्त

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Comments

  1. पढ़ा था...ये बताना है, कुछ जवाब भी देना है...उसके लिए फुर्सत से वापस आउंगी.

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  2. आप जैसे हैं, वैसे ही बने रहें, लोगों को बदल लेने दें।

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  3. कभी-कभी बहुत उदास लगते हो. क्या बात है?
    ज़िंदगी तो यूँ ही सामान किश्तों में खर्च होती जायेगी. तरक्की करने से ज्यादा ज़रूरी है, हर पल को जीना. दौड़ने से ज्यादा अच्छा है, नजारों को देखते हुए, मौसम को महसूसते हुए, हवा की छुअन का अनुभव करते हुए चहलकदमी करना. है ना ?

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  4. बीतने-रीतने का संकेती बियोग भी प्रिया-बियोग से कम नहीं होता ! फिर भी .. '' लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है '' !

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  5. सागर सर, ये उदासियाँ लम्बीं नहीं चलनी चाहिए. शाम के समय पार्कों में पक्षियों का चहचहाना तो मुझे यही सन्देश देता है.

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  6. स्पष्ट पढ़ नहीं पाई .....

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  7. लेखक बड़ा हो रहा है... अच्छा शगुन है!!

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  8. सुना था आइना बोलता है...यहाँ तो लिखता भी है...

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