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इस किले के नीचे किसकी सल्तनत है




पांव तो पार्क से ही कांप रहे थे। ज़मीन समतल थी लेकिन चार कदम आगे पर उठी हुई लगती मानो किसी और का चश्मा लगा कर आसपास का जायजा ले रहे हों। कहीं ढ़लान भी लगता तो लेकिन ज़मीन तो समतल थी तो पूरे बदन में एक चोट सी लगती। सब झूठा पड़ रहा था अपने अंदर भी और सामने से देख रही होती दुनिया के सामने मैं भी। यकायक उसे देखा तो एक तेज़ प्यास लगी। बस गुदाज़ बाहों वाली लड़की को थाम लेना चाहता था। विकल्प बस दो ही थे या तो अपने बाजू में उसे तौल लूं या कि खुद बुरादा बन बिखर जाऊं। खत सामने आया तो यही लगा कि सामने रखा वो चेहरा मंजिल को सामने पा कर रो रहा है पर कागज़ों को हथेली से रगड़ने भर से कब प्यास बुझती है ? शिद्दत में गालों के मसाम खड़े हो गए। 

हर्फ महके तो लगा कत्ल-ओ-गारत की ज़मीन पर खड़े हैं। यहीं कहीं खुदा भी रहता होगा। वैसे खतों में हमने कई खुदाओं को छोटा होते देखा है। अपना वजूद खोते आशिक देखे हैं और अदृश्य सीढ़ी के आखिरी पायदान पर लटके रिश्ते देखे हैं। कुछ और भी देखा है जो हाशिए पर पर था मगर अब वो वहां भी रहा रही। पता नहीं मुंह के बल किसी पठार पर गिरा होगा या किसी दलदल वाली खाई में। 

गर खतों में नाम नहीं लिखे जाते हैं तो वो यूनिवर्सल हो जाता है। तो मानो कभी मैंने तुम्हें भी कुछ लिखा हो। उसमें जो लिखा था उसका कोई मुकम्मल जवाब तो तुम्हारी जानिब से नहीं आया। मैं उम्मीद करूं अबकी इस सवाल का जवाब दोगी। तमाशाबीन दुनिया ने जब देखा कि कुंए में पानी की चिकनी सतह पर एक सांप फिसल रहा था तो उसे पत्थर मारा गया (गौर करो यहां सांप सामने नहीं है जो यह तरकीब अपनाई जाए कि पहले उसकी रीढ़ तोड़ी जाए) क्या वो सांप किसी दो ईंट के बीच जगह खोज पाया जो अंतिम दूरी तक रेंग कर खुद को बचा सके? जहां डर विहीन माहौल हो?

मजमून को परे रखो और बताओ कि कभी रोते हुए संभोग किया है? और किया है तो फिर उसके बाद क्या किया ? क्या खलास होने के बाद तुमने कमरे की छत देखते हुए उसके बालों में कुछ खोजने की कोशिश की थी और उसने क्या  इतने के बाद भी तुम्हारे ही गर्भ में छुपने की कोशिश की थी कि रोज़ का ये टंटा खत्म हो ?

तुम्हारे आगोश में है क्या ऐसी तरावट
डूबे जाते हैं, उबरे जाते हैं और 
मुसलसल ये दोनों वहम भी काबिज रहता है।


{चित्र/ख़त : गुरुदत्त का लिखा ख़त जिसे उपलब्ध कराया लहरें वाली पूजा ने. काहे का शुक्रिया !}

Comments

  1. अब तो खतों पर ph.d ही कर लो..:)

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  2. हिंदी कमजोर लगने लगी खुद को ही थोड़ी देर के लिए सागर भाई...समझने में टाइम लगा...पर जब समझ आया तों सुंदरता ही सुंदरता दिखी....बहुत बढ़िया...

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  3. वैसे खतों में हमने कई खुदाओं को छोटा होते देखा है। अपना वजूद खोते आशिक देखे हैं और अदृश्य सीढ़ी के आखिरी पायदान पर लटके रिश्ते देखे हैं।
    beautiful...

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  4. उन्हे तो अभी भी खतों में अपना नाम लिखने का डर रहता है क्यों?

    सागर की बूंदों का ज़नून ख़त के कोने में छिपा है...

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