Skip to main content

आँखों के लाल डोरे में तैरती है शराब. बेजोड़ उदहारण में शराब और नशे का ये वाहियात जोड़ है.





सुबह आंख खुलते ही जो सबसे पहले चीज़ सोची वो यह कि आज पीना है। पीने को लेकर इतना मूड बनाकर नहीं पिया। हमेशा सोचा और पिया। यह बिल्कुल वैसा है जैसे 15 को मेरी शादी हो यह सोच की बात है लेकिन अगर आज 15 ही हो तो आज शादी का काम करना है। अतः आज पीना है। इसके लिए मैं कल रात से ही मूड बना रहा हूं। यह क्या उम्र है कि मुझे हर चीज़ के लिए अब तैयारी करनी पड़ती है। आज की शाम चाहता हूं कि सारी दुनिया शराब में डूब जाए। दिल करता है अखबार में इश्तेहार दे दूं जैसे एनजीओ संस्थाएं आठ से साढ़े आठ लाईट, पंखा बंद करने का आहवान करती हैं। शराब मेरी नस नस में उतर आए। मैं क्या पीयूंगा यह दोस्तों पर छोड़ता हूं लेकिन पीने में मज़ा तभी है जब मैं अपने हलक में थोड़ी थोड़ी देर रोक कर घंूट लूं। जैसे पुराने भोथरे ब्लेड से चेहरे के नीचे शेविंग करते समय कई जगह से खून की धार बह निकले और बहुत इत्मीनान से उस पर फिटकरी लगाई जाए। होता अक्सर ये है कि पी लेने के बाद मैं एक स्त्री में तब्दील हो जाता हूं, एक पतित स्त्री में। नहीं नहीं मीना कुमारी को याद मत कीजिए।

पीना और लिखना बादशादत देती है। कितना भी बूढ़ा हो जाऊं लेकिन शराब और कलम मुझे शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां साहब की तरह मुझे शेर बना देता है। तमाम विनम्रता के बाद भी दबंगई उभर आती है। दरअसल इन दोनों के दायरे में मैं अपनी कुंठाएं जीता हूं। इसका मतलब वो सारे वर्जित और गैर मुनासिब इलाकों की सैर और शिकार पर निकलना है जो मुझे हरे हरे पत्तों के आड़ में बैठ छुपने का भरम देते हैं। 

पीने के इलाके के रडार एरिया में आते ही मेरे अंतर्मन को एक खास किस्म का सिग्नल मिलने लगता है। मुझे सड़क पर भी जैज़ सुनाई देने लगता है। समुद्र उत्पलावन बल का शिकार हो सारी पृथ्वी को ढ़क लेता है। इंसानी रक्त, वीर्य, वासना, जीवन में गहरी आस्था, कर्म और मोह मिलकर एकाकार हो जाते हैं। एक खास कोण पर उपर से पड़ते लाईट की तरह में आठ दस भागों में विभक्त हो जाता हूं। अपने को किसी रंचमंच पर पाता हूं। जहां मंच पर एक धुंधला प्रकाश गिर रहा है। मैं कोने में घुटनों के बल लेटा चीख रहा हूं। जब चीत्कार खत्म हो जाती है, आंसू खत्म हो जाते हैं। चुप्पी की नदी बह निकलती है और सामने बैठे दर्शकों के घुटने तक जम जाती है। वो खुद को बाढ़ से घिरा पाते हैं। वो मुझे बधाई देते हैं कि मैंने उन्हें घुटने तक इस नदी में डाल दिया। हुंह कितने अंजान हैं वो लोग कि मेरे चीत्कार में उनकी चीख भी शामिल थी और वे जहां डूबे हैं वे उनके ही भाव हैं। कैसा परायापन है कि वे अपने अंदर से निकले हुए उन कै को नहीं पहचान पा रहे हैं ! फिर क्यों इंसान इतने मुगालते में जीता है ? 

इसी तरह मेरा हरेक अक्स प्रेमी, छात्र, इंसान, बेटा, भाई और दोस्त में तब्दील हो जाता है। परस्पर वार्तालाप होता है। सभी अपनी पहचान मांगते हैं। सब मैं ही हूं, मुझसे ही सब है। फिर मैं कह हूं? वो मैं कौन था जो शराब पीता है ? क्या मैं शराबी हूं ? नशे में फिर यह कौन झूम रहा है ? क्या मुझे व्यसन है? क्या इस आदत को धिक्कार भेजा जाए ? 
योगगुरू साक्षात् हो जाते हैं -

श्रीभगवानुवाच - इसलिए हे अर्जुन ! तू इस धरती पर जीवन का कारण जान। सहस्त्रों वर्षों से यहां जो इहलोकवासी कर्म कर रहे हैं, उन्हें करते रहना होगा। जो दुनिया इस भरम में जी रही है कि यहां सब कुछ एक दिन बदल जाएगा वो नहीं होने वाला। क्योंकि अगर वो हो गया तो मानव का औचित्य ही क्या रहेगा ? मैंने उन्हें इसलिए रचा क्योंकि अपनी परिस्थितियों में वो क्या बेहतर कर पाते हैं यह देख सकूं। यह जो अधिकार, शोषण, डर, असभ्यता, आंसू, खुशी, भेदभाव और कत्र्तव्यों की लड़ी है वो निर्बाध चलता रहेगा। यही लड़ाई इस पृथ्वी पर के जीवन की आत्मा है। यह क्षेत्रविशेष में शरीर जरूर बदलेगी पर हर क्षेत्र हर रूप में मूलतः यही लड़ाई उपस्थित ही रहेगी। अत: हे पार्थ तू मुक्तिबोध की कविता 'क्योंकि जो है उससे बेहतर चाहिए' को मूल मान संघर्ष करता जा।

अज्ञान में आनंद उभरता है, आज की मुक्ति मिलती है। 

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥
भावार्थ :  अर्जुन बोले. हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा॥73॥

Comments

  1. उत्सव :

    http://www.youtube.com/watch?v=m6R4uEBjVdE&feature=related

    ReplyDelete
  2. पीना और लिखना बादशाहत की निशानी है।

    सहमत, अभी आधे बादशाह ही सही।

    ReplyDelete
  3. आपकी स्वीकारोक्ति , आपकी व्याख्या , आपका दृष्टिकोण ... कई आयाम देते हैं और कई कोणों पर लगता है कि सत्य यही है

    ReplyDelete
  4. @ फिर क्यों इंसान इतने मुगालते में जीता है ?

    सागर जो मुग्लाते में जीत हैं, वो पीते नहीं है... और जो पीते नहीं है जो जीते भी नहीं है...

    बाकि तुम्हारी पोस्ट एक बिम्ब बना गयी हैं रोयल स्टेज की ... सर बुरा मत मानना... समय हो गया है... और बोले तो पोस्ट धाँसू है.

    ReplyDelete
  5. पहली बार कहीं पर मैंने पीने को इतना खूबसूरत देखा है. वाह!

    मेरा निबंध पढ़िए, बहुत दिनों बाद हिंदी में लिखने का प्रयास किया है.
    बिगड़ा हुआ - A Confession http://moneymakingboy.blogspot.com/2011/11/bigda-hua-confession.html

    ReplyDelete
  6. जो पिये वो शराबी, जो ना पिये उसमें क्या है खराबी?

    ReplyDelete

Post a Comment

Post a 'Comment'

Popular posts from this blog

कुछ खयाल

चाय के कप से भाप उठ रही है। एक गर्म गर्म तरल मिश्रण जो अभी अभी केतली से उतार कर इस कप में छानी गई है, यह एक प्रतीक्षा है, अकुलाहट है और मिलन भी। गले लगने से ठीक पहले की कसमसाहट। वे बातें जो कई गुनाहों को पीछे छोड़ कर भी हम कर जाते हैं। हमारे हस्ताक्षर हमेशा अस्पष्ट होते हैं जिन्हें हर कोई नहीं पढ़ सकता। जो इक्के दुक्के पढ़ सकते हैं वे जानते हैं कि हम उम्र और इस सामान्य जीवन से परे हैं। कई जगहों पर हम छूट गए हुए होते हैं। दरअसल हम कहीं कोई सामान नहीं भूलते, सामान की शक्ल में अपनी कुछ पहचान छोड़ आते हैं। इस रूप में हम न जाने कितनी बार और कहां कहां छूटते हैं। इन्हीं छूटी हुई चीज़ों के बारे में जब हम याद करते हैं तो हमें एक फीका सा बेस्वाद अफसोस हमें हर बार संघनित कर जाता है। तब हमें हमारी उम्र याद आती है। गांव का एक कमरे की याद आती है और हमारा रूप उसी कमरे की दीवार सा लगता है, जिस कमरे में बार बार चूल्हा जला है और दीवारों के माथे पर धुंए की हल्की काली परत फैल फैल कर और फैल गई है। कहीं कहीं एक सामान से दूसरे सामान के बीच मकड़ी का महीन महीन जाला भी दिखता है जो इसी ख्याल की तरह रह रह की हिलता हुआ...

विलंबित ताल

हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है। आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है। जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है। बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है। पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है। कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है। बारिश अपने ब...

व्यावसायिक सिनेमा

   स्वतंत्रता आंदोलन के दौड में फिल्मकारों ने भी अपने-अपने स्तर पर इस आंदोलन को समर्थन देने का प्रयास किया. तब तक देश में सिने दर्शकों का एक परिपक्व वर्ग तैयार हो चुका था. मनोरंजन और संगीत प्रधान फिल्मों के उस दौड में भी देशभक्ति पूर्ण सार्थक फिल्में बनीं.                         स्वतंत्रता के ठीक बाद फिल्मकारों की एक नयी पीढ़ी सामने आई. इसमें राजकपूर, गुरुदत्त, देवानंद, चेतन आनंद एक तरफ तो थे वी. शांताराम, विमल राय, सत्यजीत राय, मृणाल सेन और हृषिकेश मुखर्जी, गुलज़ार और दूसरे फिल्मकारों का अपना नजरिया था. चेतन आनंद की ‘ नीचा नगर ’ , सत्यजीत राय की ‘ पथेर पांचाली ’ और राजकपूर की ‘ आवारा ’ जैसी फिल्मों की मार्फ़त अलग-अलग धाराएँ भारतीय सिनेमा को समृद्ध  करती रहीं . बंगाल का सिनेमा यथार्थ की धरती पर खड़ा था तो मुंबई और मद्रास का सीधे मनोरंजन प्रधान था. बॉक्स ऑफिस की सफलता मुंबई के फिल्मकारों का पहला ध्येय बना और इसी फेर में उन्होंने सपनों का एक नया संसार ...