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मेरी कलाई पर घडी मत बांधो, अपने कहे में वक्त को बाँधा करते हैं हम

चिंता की कोई बात नहीं। उल्टी नहीं हुई बस थोड़ा सा मुंह खुला किया और चुल्लू भर नमकीन पानी निकला। और निकल कर भी रूका कहां ? बिस्तर ने फटाफट सोख लिया। ये प्यास भी बड़ी संक्रामक चीज़ होती है बाबू। मेरी जिंदगी की तरह ही मेरे बिस्तर और तकिए तक प्यासे हैं ये आंसू तो आंसू मेरी नींद तक सोख लेते हैं। कुछ भी यहां नहीं टिकता। हमने कितनी रातें साथ गुज़ारी मगर ये हसरत ही रह गई कि तुम्हारे जाने के बाद भी तुम्हारे देह की गंध इसमें बसी रहे और मैं तुम्हारे होने को, तुम्हारे बदन की खूशबू से मालूम कर सकूं। मुझे लगा करे कि जैसे एक अंधे को किसी लम्बी टहनी का सहारा मिला है मैं तुम्हारे रोम रूपी हरेक कांटों को टटोलता चलूं। कितनी ही पी ली आज लेकिन अंदर की खराश मिट नहीं रही। लगता है दिल की दीवार पर किसी मौकापरस्त बिल्ली ने अपने पिछले पंजों से खुरच कर चंद निशान छोड़े हैं।
हां अब मैं अपने दिल को देख पा रहा हूं। नाजी सैनिकों की देखरेख में काम करता किसी यहूदी सा, हाड़ तोड़ मेहनत करता, कोयले खदान में भागता, किसी दवाई के कारखाने में तैयार शीशियों पर लगतार लेबल लगाता। जून महीने में कुंए का जलस्तर कम देख रात में ही खेत को सींचने का जिम्मा लिए। पुनः हरेक मेड़ से टकराता, ढलानों की तरफ बहता, कोई मजबूर जीवन। सस्ते बाज़ारों में शाम तलक हाथ पर लटकाया गए पुराने कपड़ों का गठ्ठर बेच डालने का निर्णय। अनथक। दिल। इस क्षण कितना दयनीय! असहाय। कोई सहारे की उंगली लटकाओ तो बच्चे की तरह थोड़ी ढ़ीली सी पकड़ से उस सहारे को अपनी नर्म उंगलियों से घेर भर ले।


मैंने आज नशे में अक्षर बना कर तुम्हारा नाम भर लिखने की कोशिश की है। लेकिन तुम न भीड़ में मेरी थी और न अकेलेपन में। मैं हर सुबह जब वो काग़ज़ देखता हूं तो बस एक जिग जैक लाइन भर मिलता है जैसे मेरे ही धड़कनों का ग्राफ हो। ये अमूर्त चीज़ बनाने वाले ने क्यों नहीं देखी ? या फिर अगर देखी भी तो क्यों महसूसने भर को छोड़ दिया?


उसको कहो, जिंदगी के अखाड़े में यूं हरेक बात पर भरी बोतल का इनाम न दिया करे। मैं हर बार वो दांव बस इसलिए खेल जाता हूं कि मुझे उसमें जवान होती लड़की दिख जाती है, जिसके बाल स्टेप कट में कटे हैं और जिसने अपने मैरून रंग की लम्बी स्कर्ट के नीचे कुछ नहीं पहन रखा है। जानबूझ कर ही न? मेरे बदन से उतना ही पसीना गिरने लगता है। ये कौन सा अक्स उभरता है जिसका गुरूत्व इतना ज्यादा है, जो अपने नाभिक में ही भारी लगती है? ये कौन है यार जिसके चारों तरफ हम चक्कर लगाते रहते हैं?


आसमान से समंदर क्यों नहीं बरसता ? तलवों से शराब क्यों नहीं रिसती ? सिर में एक कान की जगह खिड़की क्यों नहीं है ? टूटे हुए दिल में कोई सीढ़ीघर क्यों नहीं होता ? ये झूठा ढोल पीट पीट कर किसने अफवाह उड़ाई कि प्यार करने के बाद मैं चैन से रह लूंगा?


प्राॅब्लम ये है कि दिल एक चूर चूर हो चुका आईना है जिसको अब सीमित दायरे में रखने की हम रात दिन कोशिश करते रहते हैं। वहां ये खुद में ही चुभन का बायस बनती है। कोई न कोई सिरा इस शिकायत के साथ बैठा मिलता है कि सर मैं ठीक से नहीं हूं, मुझे किसी और कैम्प में भेजो। आह ! मेरा दिल भी क्या चीज़ है फिलस्तीन का समर्थक या कश्मीरी पंडित? अपने ही देश में शरणार्थी !

Comments

  1. बहन ने घडी दी तो मुंह से बेसाख्ता "शीर्षक" निकला

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  2. अपने ही घर बेगाने, वक्त से बँधे...

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  3. दिल के नए पर्यायवाची, ढेर सारे प्रश्न, सहारे की अंगुली और सोचालय की कारीगरी ...

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  4. आपके शीर्षक अच्छे होते हैं हमेशा, ये भी अच्छा सा है

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  5. मैंने आज नशे में अक्षर बना कर तुम्हारा नाम भर लिखने की कोशिश की है। लेकिन तुम न भीड़ में मेरी थी और न अकेलेपन में। मैं हर सुबह जब वो काग़ज़ देखता हूं तो बस एक जिग जैक लाइन भर मिलता है जैसे मेरे ही धड़कनों का ग्राफ हो। ये अमूर्त चीज़ बनाने वाले ने क्यों नहीं देखी ?
    *पाब्लो नेरूदा के बतौर जाने जाने से बढ़कर क्या कोई ख़्बत है इस जीवन में?
    *'फिर कभी' से 'कभी नहीं' बेहतर नहीं है क्या ?
    *तितली उस लिपी को आख़िर कब तक पढ़ती है जो मक्खियों ने उसके पंख पर लिखी है ?
    -पाब्लो नेरूदा
    _______________________________________

    वैसे आपने दी शिनडलर'स लिस्ट देखी है, क्यूंकि आपके दिल के हाल उसमें एक्सक्लूजिवली प्रोजेक्ट किया है. :-)

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