Skip to main content

बिलबिलाया घूमा करता है नेवला


और चूहे बिल्ली की तरह हम दूसरे पर टूट पड़े। अपने अपने दायरे की सारी बातें भूलकर। वो क्षण सिर्फ मेरा था, वो क्षण सिर्फ उसका था। कभी मैं उसकी बाहों में था तो कभी वो मेरे आगोश में थी। हमले ज़ारी थे। वो बदहवाश सी थी और मैं केवल उसे जीत लेना चाहता था। उसके बदन के खड़े हो गए सारे सुनहले भूरे रोएं को सहलाकर शांत कर देना चाहता था। उसकी गोरी गुदाज बाहों पर च्यूटी काटना जैसे एक नीली तितली का कुछ क्षण के लिए उग कर मिट जाना। हम दोनों ने अपनी पूरी इसमें ताकत झोंक रखी थी। यहां हारना भी जीतना था। यह हिंसा भी बाप से मार खाने की तरह अधिकार सुख था। ऐसा लगता था जैसे मैं नगरपालिका द्वारा लगवाया गया टूटा नल होउं जो अब टूट गया है और वो झुग्गी झोपड़ी में रहने वाली स्थानीय निवासी जिसे मानसिक असुरक्षा इतना सताता है मानो पानी अब तीन चार दिन नहीं आने वाला सो वह पति के खाली किए जा चुके शराब की बोतलों तक में पानी भर रही हो। वह भी मुझको वैसे ही बरत रही थी जैसे मैं फिर उसे नहीं मिलने वाला। हम दोनों एक दूसरे को रौंद रहे थे। वो जांघें जो मेरी हसरत थे आज उस पर मेरी उंगलियां वहां मचल रही थी। उसकी पीठ दोपहर में नदी किनारे की पत्थर हो आई थी जिस पर प्यासी मछलियां मारे प्यास के पटपटाकर अपना मुंह रगड़ते मरती हैं।

मैं अक्सर सोचता कि कैसे उसका पति उसे संभालता होगा। बहुत सारी लड़कियों को टूट कर प्यार उसका पति नहीं सिर्फ उसके आशिक ही कर सकते हैं। कहां चूम पाता होगा उसका पति पूरी तरह उसे। क्षणिक इंटेंसिटी और अमर इंटेंसिटी में बेपनाह फर्क होता है।

उसकी आंखें पत्थर की हो आई थीं। पलकें जों खुल और बंद हो रही थी तो लगता वे मानो नीले कंचे हों जो इस तरह घूम रहे हों जैसे किसी ने अमानिका उंगली से उसे साधा हो। चन्न से वो अपनी ही जगह पर घूमती रही हो।  वो भरी भरी जांघें जो चूड़ीदार पाजामें में समंदर के हिलोरें जैसे लगती और जिसके बारे में चंद पल सोचते ही लगता मैं कपड़े उतार कर पानी में गले तक खड़ा हूं। सांसे बाधित हो जाती। लगता हवा की जगह पानी ही श्वासोच्छवास बन गई है। पानी की सांस ले रहा हूं पानी ही छोड़ रहा हूं। और पानी हिलोरें मारती शार्क की तरह पूरी ताकत से मेरे ऊपर एक भरपूर ताकतवर प्रहार करने वाली है। एक वार और काम तमाम। एक डर मिला रोमांच।

वे होंठ जिसे मैं अपने तनहाई के पलों में सोचा करता कि काश कभी मौका लगे तो इन होठों को इसी मुद्रा में चूम सकूं। या फिर कितना अच्छा होता अगर इसके होंठों का कटाव हमेशा ही ऐसा होता।

वे मोटे ओठ जो बनैले फूलों के बीच रहकर खिले हुए गुलाबों की तरह हो आए हैं जो लाॅन में बेदखल हैं जहां बाथरूम के फटे हुए पाईपों से पानी टपकता रहता है, खिड़की के उन छज्जों को फाड़कर जहां पीपल के पौधे उग आते हैं, जहां औरतें इस्तेमाल की हुई सेनेटरी नैपकिन फेंकती हैं, जिन जगहों के देखभाल माली नहीं करता। घर में ही वर्जित स्थल।

और पूरी तरह जब वो मेरी गिरफ्त में आई, जब उसपर आसमान बनकर मैं छा गया। घना बादल बनकर उस धरा पर मैं घुमड़ घुमड़ कर बरसने ही वाला था कि उसने मेरा नाम पुकारा। सागर... सागर.... सागर.... मेरे अच्छे सागर.... सिर्फ मेरे सागर। ऐसा कहते हुए उसकी उंगलियां कभी मेरे कानों के पीछे होती कभी मेरे बालों में, आँखों में स्नेह के महीन-महीन रेशमी धागे लिए हुए। 

सहसा मुझे एहसास हुआ, अब एक ऐसी लड़की जिसे किसी बात की जल्दी नहीं है. जो मेरी है सदियों से, वहीँ है, वहीँ तो है हमेशा से, उसे कहीं भी तो नहीं जाना है। लगा बदन के समंदर में डूबने से कहीं गजब है प्रेम भरे संबोधन में डूबना। एक थकी, लरज़ी हुई, आप पर हारी हुई आवाज़। चीनी की भारी चाशनी में सूखे और खोखले मैदे की तरह डुबकी लगाते तुम।

यकीन हुआ कि हमें एक पतली, कोमल, मादा आवाज़ आवाज़ की तलब होती है जो हमार सारे जटिलताओं और तकलीफों को सोख ले। जिसे सुनकर सारी थकान किसी पके हुए घाव से मवाद की तरह बह निकले।
तब जब उसके उभार एकदम सामने हों, जिंदा और गुदगुदे, फड़फड़ाते, किसी हवादार दिन नाव के भरे भरे पाल सरीखे। जिसकी चाहत में कई रातें ज़ाया की गई हो। हस्तमैथुन करने की तमन्ना हो मगर दिमाग में ज़ारी लड़ाई के बायस वो सफल न हो पाएं। जिसकी आंखों की लहक के आगे वो निस्तेज हो जाए। जो जब वहां से उठ कर जाए तो उसके स्पर्श तक फरेब लगे मगर सबूत सिर्फ इतना हो कि बिस्तर पर चार पांच सौंधे सौंधे उसके सीधे टूटे हुए बाल हों। जिसके चले जाने के बाद लगे क्या कोई आया भी था मेरे जीवन में?

वो खुन्क-खुन्क हाथ..... जो हाथ में हो तो लगे कि झूठे हैं, वो पारदर्शी शीशे सा बदन जिससे गुज़रे तो लगे कि सपना हो। वो आंखों में जानी जानी सी छवि जिसे जितना जीते जाएं झूठ की शंका बढ़ती जाए।

कई बार लगता है प्रेम सिर्फ एक मंच भर है जहां बाकी सभी किरदार झूठे हैं और बस हमें ही एकल प्रस्तुति देनी है।

क्या होता है आखिर संभोग, समंदर, जीवन और प्रेम में ? लील ही तो लिया जाना।

Comments

Popular posts from this blog

समानांतर सिनेमा

            आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, “ अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है ” . युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने ‘ बिराज बहू ’ , ‘ देवदास ’ , ‘ सुजाता ’ और ‘ बंदिनी ’ जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं . ‘ दो बीघा ज़मीन ’ को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था “ इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष्टि से देखता है, यह बड़ी अजीब बात

विलंबित ताल

हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है। आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है। जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है। बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है। पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है। कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है। बारिश अपने ब

मूक सिनेमा का दौर

दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियां   महाराष्ट्र   तक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता में   हीरालाल सेन और जमशेद जी मदन   भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में   प्रदर्शित   होकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों में   प्रदर्शित   करें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारा   निर्देशित   फिल्म ' बिल्म मंगल '   तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहला   प्रदर्शन   नवम्बर , 1919 में हुआ।   जमदेश जी मदन ( 1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।   वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंने   कलकत्ता का पहला सिनेमाघर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस   बनाया। यह सिनेमाघर आ