Skip to main content

......

उसके होने का गंध उसके नाभि से फूटती है लेकिन शब्द कहां से फूटते हैं? यूं ही विशाल पुस्तक मेले में अनजाने से बुक स्टाल पर बाएं से आठवीं शेल्फ में अमुक किताब का होना कि जहां दुकानदार भी नहीं उम्मीद करता हो कि पाठक यहां देखेगा सो वहां किताबों का सा भ्रम देता कुछ भी रख दो। 

स्टाल पर कोने में ग्रे कालीन पर उन शब्दों से गुज़रते हुए जाने क्यों लगता रहा कि उसके लिखे जाने से पहले वे शब्द हमारे ज़हन में महफूज थे और किसी ने सेंध मार कर यह निकाली है। पढ़ना कई बार वही सुहाता जो हम पहले से जान रहे होते हैं।

यह सोचना भी बहुत सुखद लगता कि हमारे शब्द साझे हैं। दिमाग से सरसरा कर फिसलते हुए उनकी उंगलियों के बीच फंसे कलम से कैसे किसी काग़ज़ पर वे आकार लेते होंगे? क्या 'द' वैसा ही होता होगा जैसा उनके दिमाग में उपजा था, या कि उनकी उंगलियों ने उसे सफहे पर रोपते हुए कोई कलाकारी कर डाली थी। उनका लिखा 'ज' भी आह कितना आत्मीय! पहचाने से शब्द जिन्हें बीच के बरस में कहीं भूल आए थे और उस भूलने की याद भर आती रही। यों ही अनायास वो पढ़ना छोड़ उन उंगलियों का ख्याल करने लगता हूं जो सर्फ से धोए जाने के बाद हल्की हल्की रूखी लगती है। 

क्या उनका लिखना भी संगीत संयोजन के नियमों में बंधा है। क्या वे भी हर शब्द तीन ताल पर गिन कर, कभी कोई मीटर पकड़ कर लिखते हैं? 

अच्छा है कि कई सवालों के जवाब नहीं सो उनके व्यक्तित्व के प्रेम में पागल मुझ जैसी प्रेमिका रंगमंच पर गोल गोल बेसुध घूमती नज़र आती है।

अपार किताबों में भी वर्णमाला के खांचे में ही बंधी हर रचना मगर कैसे चीन्ह लेता है हमारा हृदय उन्हीं में से कुछ खास शब्दों को। क्यों लगता ऐसा कि वे जो अक्षर लिखते तो हमारे दिल पर नर्म नर्म रूई के फाहे गिरते। क्यों लगता ऐसा कि किसी कोई आदमी न सही तो राह चलते किसी जानवर के ही गले लगते फफक पड़ने की संतुष्टि मिलती? क्यों लगता ऐसा कि हमारे बीच की दूरी को भी हज़ार मील की दूरी और अनियमित कालखंड के फासले भी पट जाते? क्यों लगता ऐसा कि वे गर सामने ही होते तो अपनी धड़कन संयत कर उनकी हथेली बड़े इत्मीनान से अपने उभारों पर रख लेती ?

शब्दों की हल्की हल्की ऊष्मा, अक्षरों के आंच, वाक्यों में छुपी अदरकी स्वाद। मां ने जो कभी रूला रूला कर, गर्दन गिलास में गोत कर जबरन पिलाया, क्यों आज उसी का स्वाद जिह्वा पर छाया?

Comments

Post a Comment

Post a 'Comment'

Popular posts from this blog

मूक सिनेमा का दौर

दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियां   महाराष्ट्र   तक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता में   हीरालाल सेन और जमशेद जी मदन   भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में   प्रदर्शित   होकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों में   प्रदर्शित   करें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारा   निर्देशित   फिल्म ' बिल्म मंगल '   तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहला   प्रदर्शन   नवम्बर , 1919 में हुआ।   जमदेश जी मदन ( 1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।   वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंने  ...

विलंबित ताल

हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है। आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है। जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है। बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है। पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है। कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है। बारिश अपने ब...

आँखों में कैद चंद मंज़र

दृश्य -1 एग्जामिनेशन होल में, किसी सवाल का जवाब सोचते हुए कनपटी से पसीने की एक धारा फूटती है... टप! कान के नीचे गिरती है. सवाल बदल जाता है. "गर्मी से निकली पसीने की बूँद ठंढी क्यों होती हैं?" दृश्य -2 बेरोजगारों ने बेंचों पर मां-बहन की गालियाँ लिख कर खुन्नस निकाली है... गिनता हूँ 1-2-3-4-... उफ्फ्फ ! अनगिनत हैं दोनों तरफ... बाहर गांधी मैदान में, 'बहन जी' की रैली है... हर खम्भे पर हाथी है. दृश्य -3 "तुम्हारी कंवारी पीठ पर के रोयें हिरन जैसे सुनहरे हैं" अगली बेंच पर बैठी श्वेता को जब मैं यह कहता हूँ तो वो दुपट्टे का पर्दा दोनों कांधों पर खींच लेती है. कभी फुर्सत में तुम्हें  "एक सौ सोलह चाँद की रातें, एक तुम्हारे काँधे का तिल" का मतलब समझाऊंगा... मैं सोचता हूँ. दृश्य -4 बाहर निकलता हूँ...आसमान में मटमैले बादल छाए हैं... गंगा शहरवालों से उकताकर तीन किलोमीटर पीछे चली गयी है. मैंने इतनी परती ज़मीन बरसों बाद देखी है... मुझे गुमां होता है कि मैं राजा अशोक हूँ और हवा मेरे कान में कहती है " बादशाह! यह पाटलिपुत्र की सरज़मीन आपकी हुकूमत का हिस्...