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समसामयिकी



मैं जिससे भी इन दिनों टकराता हूं पाता हूं कि सबने एक तरह से घुटने टेक दिए हैं। वे बहादुर सिर्फ अपने मसलों पर बन रहे हैं। सबकी पहली और आखिरी प्राथमिकता अपना परिवार भर है। देशभक्ति भी अब एक फ्रीलांसिंग नौकरी की तरह हो गई है। संवेदनहीनता और पलायनवाद तो थी अब कहीं न कहीं लोगों ने अपने अंदर ही जैसे गिव अप कर दिया है। 

एक काॅपीराइटर होने के नाते, काम के बदले ही सही अपने क्लाइंटों से पैसे पाने के एवज में खुद को गुनहगार मानता हूं। सीधे सीधे शब्दों में मुझे यह समझौता लगता है। जिसके लिए कोई एक्सक्यूज नहीं है। 

दरअसल दिल अब कुछ भी नहीं बहलाता। अंदर की लेयर का जागता आदमी मर गया है। और जो ऊपर गतिमान दिखता है वो बस एक व्यसनी शिकारी है, मौके की तलाश में। मुझे अच्छा मौका मिल जाए, मुझे अच्छी नौकरी मिल जाए, मुझे अच्छा प्रेम मिल जाए। सब कुछ मैं, मेरा, मुझे आधारित। 

हम सब एक फ्लैट वाली घरफोड़ू औरत की तरह हुए जा रहे हैं। चुप्पा, कोना दाबने वाला। मेरी बाल्टी, मेरा मग, मेरा पर्दा, मेरा बिजली बिल, मेरा गैस सिलिंडर वाला। न न करते हुए भी, हम पूरा विद्यार्थी जीवन यह प्रण दोहराते रहे कि हमारा देश एक समाजवादी देश है। रेत में सर धंसाए शुर्तरमुर्ग की तरह हम रटते रहे और समाजवादी भारत को पूंजीवादी भारत में बदलने के गवाह बनते रहे। 

हमें रोजी रोटी से फुर्सत नहीं, हमें अपने परिवार की सुविधा से फुर्सत नहीं, बच्चों के इंजीनियरिंग काॅलेज की फीस से फुर्सत नहीं, दलाली खाने से फुर्सत नहीं। रेल और हवाई यात्रा की कन्फर्म सीट से फुर्सत नहीं। होटल की रिज़्र्वड कमरे से फुर्सत नहीं। दरअसल फुर्सत इतनी थी कि हमने यह सब रोग पाल लिया। 

कुछ हो जाता है। जुझारू जीते जागते उठ जाते हैं। विद्वता को पूजने वाला हमारे में कुलबर्गी मारे जाते हैं। देश बच्चों के शव समुद्र तट पर बह आते हैं। जिंदा परमिशन नहीं मिलती तो वे मर कर दस्तक दे रहे हैं। 

साइड इफेक्ट है इस तरह के लिखने का भी। हमारे उम्मीदों को लगभग 30 सालों से हवा नहीं लगी है। 
पूरा देश 1857 की क्रांति की तरह विफल हो रहा है। 

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